“वासना के महाद्वार पर यह उसकी पहली दस्तक थी। उसके तमाम संकोच, मन की समस्त वर्जनाएँ, संस्कारों की सब संवेदनाएँ तरह-तरह से उभरी थीं, पर ऐसे में जो ज्वार उठते हैं वे तट के सब शंख-सीपियों को बहा ले जाते हैं...या उन पर रेत की पतली पर्त चढ़ा जाते हैं। और इन आन्तरिक कोलाहल के क्षणों में आदिम वासना अपने ही प्राकृतिक तर्क लेकर आती है...इन तर्कों में शब्द नहीं होते, अर्थ नहीं होते...एकाकार होने के कोई उदात्त लक्षण नहीं होते...रिश्तों के रूपाकार नहीं होते...सिर्फ़ समय की वर्जनाओं को तोड़कर एक कुदरती अंधड़ में बदल जाने की अर्ध-विक्षिप्त स्थिति होती है...मान्यताओं और नैतिकताओं की सारी सड़कें यहाँ समाप्त हो जाती हैं-सिर्फ़ आदिम संवेगों का मांसल सफ़र रह जाता है; एक ऐसा सफ़र, जिसकी मंज़िल तक कोई रास्ता नहीं जाता...वह मंज़िल भी संभ्रम से अधिक कुछ नहीं होती...लेकिन वह संभ्रम अमूर्त नहीं होता...वह बहुत नग्न और ठोस होता है–हिमशिला की तरह रिसता और दहकता हुआ। और तब नितांत अरूप, विरूप और समरूप सदियाँ समय के अन्तराल में एक साथ साँस लेती हें...”
―
Jalti Hui Nadi
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