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Kamleshwar Kamleshwar > Quotes

 

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“इतिहास का विश्लेषण, उसकी सामाजिक व्याख्या मनुष्य कि घृणा को तर्क से शमित करती है, पर अतीत तर्क कि पद्धति को स्वीकार नहीं करता, वह केवल आंशिक सत्यो को स्मृति की कहानियो में बदल देता है और उसे सदियों जीवित रखता है .”
― Kamleshwar
tags: wisdom
“कुछ अनकहे धुंधले-से अक्स स्मृतियों में उलझे रह जाते हैं, जो न घटते हैं न बढ़ते हैं। बस, पानी के दाग़ की तरह वजूद के लिबास पर नक्श हो जाते हैं।”
― Kamleshwar, कितने पाकिस्तान
“तुम कितनी मौत दे सकते हो ! वह कितनी मौत उठा सकता है ! जब तक दूसरा जीवित रहता है, पहला नहीं जीतता। मौत ही जय-पराजय को तय करती है।”
― Kamleshwar, कितने पाकिस्तान
“जो सनातन है, वह अब तक सनातन क्यों है, इसके गर्भ में यह अकाट्‌य सत्य मौजूद है कि जो परिवर्तनशील नहीं है, वह सनातन हो ही नहीं सकता!”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“इस सभ्यता ने माँ की कोख से जन्मे जीवन और अनुभव की कोख से जन्मे सत्य को ही स्वीकारा है...यही इसकी शक्ति है और जीवित रहने का रहस्य भी! फिल्म संस्कृति भी इसी संस्कृति की एक विकृत और विकारग्रस्त देन है।”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“सागर के चिपचिपे पानी में नहाने के बाद साफ़ पानी से नहाता है पर फिर भी सागर में दुबारा नहाने से परहेज़ नहीं करता...”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“सन्तरित-सत्य हर व्यक्ति के जीवन का सत्य है। यह सन्तरण ही जीवन का यथार्थ है और अनुभव का अक्षय कोष! जीवन में शायद कुरूप तो कुछ भी नहीं होता! वह कुरूप बन जाता है स्थितियों और परिस्थतियों के कारण...अंकुशहीन इच्छाओं के दौड़ते घोड़ों के कारण...मुश्किल यही है कोई न तो सपनों के बिना जी पाता है और न सपनों के साथ...सपने का सत्य यही है कि वे विसर्जित नहीं होते! सपनों से इच्छाएँ जन्म लेती हैं और इच्छाओं से आचरण...जब किसी का सापेक्ष सपना दूसरे के सापेक्ष सपने से टकराता है तो विस्फोट होता है और क्षत-विक्षत भावनाओं के शव बिखर जाते हैं, और भीतर का मनोजगत तब क़ब्रिस्तान बन जाता है। सन्तरित सत्य ही लगातार परिवर्तित होते यथार्थ का कारण है और अपने यथार्थ और अपने समय और माहौल के यथार्थ से आंख मिलाकर ही कोई पथ प्रशस्त हो पाता है।”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“–गरीबी और भूख की कोई नस्ल नहीं होती !”
― Kamleshwar, कितने पाकिस्तान
“यह एक अजीब ही खेल था”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“अज्ञेय के सारे वैचारिक बंधु “कांग्रेस फ़ॉर कल्चरल फ़्रीडम” के सक्रिय कार्यकर्त्ता थे। इन्हीं में प्रभाकर पाध्ये थे, “हिम्मत” (अंग्रेज़ी पत्रिका) के सम्पादक राजमोहन गाँधी थे, जस्टिस तारकुण्डे और नाथवानी थे और इन्हीं में शामिल थीं–लोहिया जी की साध्वी साहित्यिक सधवाएं!”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“मात्र आर्थिक पूँजीवाद ही अपने चरित्र-दोष के कारण अंधी गली में नहीं पहुँच चुका है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पूँजीवाद भी अंधे कुत्ते की तरह आर्थिक पूँजीवाद की सुरक्षा के लिए उसकी गली में भौंक रहा है!”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“भूख मारक है, पर ग्लानि भूख से ज़्यादा मारक है...”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“प्रतिबद्धता एक शपथ है। और वही शपथ उसे वापस खींचकर ला रही थी।”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“वह मार्क्सवाद का विद्यार्थी और समाजवाद का समर्थक था। वह पूँजीवादी व्यवस्था की प्रतियोगिता में पड़ने और लड़ने के लिए अभिशप्त था।”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“दूसरी आज़ादी’ में आज़ादी निरपेक्ष है या सापेक्ष? तय यह होना था कि आज़ादी सबकी है या मात्र साम्प्रदायिक शक्तियों और उनका साथ देने वाले अवसरवादियों और समझौता-परस्तों की है, या कि उन करोड़ों लोगों की जो प्रतिवाद का हक़” नहीं छोड़ना चाहते? एक दौर था जब क़ानूनी आपात्काल लागू था। अब दूसरा दौर था–सवर्ण-सामन्ती हिन्दू आपात्काल लागू था!”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“ज़िन्दगी का एहसास तो देगी! उस सन्नाटे को तो तोड़ेगी ...खुद उससे लड़ेगी पर दुनिया से उसके लिए लड़ेगी... और गायत्री ने अपने अपार धीरज के साथ शादी के बाद यही किया भी।”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“दैहिक सौंदर्य और चपल व्यक्तित्वों के कारण पंजाबी लड़कियाँ एकाएक आकर्षण का केंद्र बन गई थीं। वे ज़्यादा खुली हुई थीं, कुंठाओं से मुक्त थीं, अपने विन्यास में सहज और उन्मुक्त थीं। अपनी भावनाओं में ज्यादा स्वतंत्र थीं और उत्तर भारत की लड़कियों से सौ गुना ज्यादा सुन्दर थीं।...इलाहाबाद की चूलें हिल गई थीं।”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“उन्माद का हर क्षण सारी वर्जनाओं से मुक्त होता”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“परिक्रमा’ सच्चाई, ईमानदारी और निम्न वर्गों के दुःखों और यातनाओं का दस्तावेज़ बन चुका था!”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“यह महत्त्वाकांक्षी लोगों की दुनिया है–यहाँ घर बसाकर महत्त्वाकांक्षायें जन्म नहीं लेती, यहाँ महत्त्वाकांक्षाओं की प्राप्ति के लिए रिश्ते बनाए और घर बसाए जाते हैं...”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“ख़तवाली का निमंत्रण मिलते ही वह पराधीन भी होता था और खुद को क्षुद्र भी पाता था। साथ चलते ही यह एहसास होना कि अब क्या होना है, उसे खुद अपनी नजरों से गिरा देता था...”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“अशोक जैन एक दमित व्यक्तित्व के आदमी हैं। हीनता ग्रंथि और अरबों-खरबों के साम्राज्य के मालिक।”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“उसका सपना स्वप्न-पुरुष का सपना नहीं, वह सुविधा पुरुष का सपना था। वह सुविधा-पुरुष, जो अपने पारिवारिक जीवन के साथ-साथ उसे जीवन के औसत ऐश्वर्य दे सके और बदले में सैक्स सुख का अबाध अधिकार अर्जित कर सके।”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“यह कौन-सी माँ थी? शायद एक सनातन भारतीय माँ, जो इसीलिए सनातन थी, क्योंकि वह परम्परावादी होने के बावजूद सदा और सतत् परिवर्तनशील थी...सनातनता का रहस्य भी यही है! शिव और शक्ति! सनातनता! इससे”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“भारती की प्रतिभा का डंका बजता था, पर कांता की बौद्धिक और रचनात्मक क्षमता से कोई परिचित नहीं था। मात्र शरीर सांस्कृतिक असन्तुलन पैदा करते हैं क्योंकि कोई व्यक्ति बहुत दिनों तक मात्र शरीर के साथ नहीं रह सकता...अन्तत: औरत भी शरीर पर हुए पुरुष के आधिपत्य से घबराने लगती है और मात्र भोग्या होने की नियति से टकराने लगती है। शरीर सैक्स का भी अन्तिम सत्य नहीं है। उद्दीप्त शरीर का सम्मोहन जब तक संवेगों की सांस्कृतिक सन्तुष्टि का पर्याय नहीं बनता, तब तक शरीर शरीर ही रहता है, वह नदी नहीं बनता...वह नदी जो कई स्तरों पर बहती है! जिसकी निचली सतह का पानी चट्टानों को तोड़ता है और खुरदरे पत्थरों को अपने गर्भ में आकार देकर बालू की भीति पर पत्थरों का भरोसेमंद पथ बना देता”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“उन खण्डहरों की तरह रह गई थीं, जिनमें आवाज़ें नहीं गूँजती।”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“वह तो अपने साथ गंगाजल में धुले पवित्र शब्दों को लाया था, या फिर पसीने में नहाए संघर्ष के शब्द उसके पास थे...”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“तब रहकने वाली सीटी बजाकर इंजन भाप के बादल छोड़ता और गाड़ी धक-धक करती चली जाती थी।”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“संस्कारित शब्द से घटिया संवेग और अश्लील अर्थों वाले शब्दों को अपदस्थ करने की...”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi
“पाप की परिपाटीबद्ध वर्जनाओं में आबद्ध परिभाषाओं की परिधि को तोड़ कर भी सैक्स एक स्रोत की तरह फूटता है और पल भर के परम सत्य की प्रगाढ़ प्रतीति देता है...सैक्स का क्षण स्वयं में स्वतंत्र है–समाजातीत, संस्कारातीत और वर्जनातीत। और वर्जित सैक्स का सबसे बड़ा सत्य यही है कि वह तमाम स्वीकृत सामाजिक सत्यों को लाँघ कर स्त्री-पुरुष के संवेदनाहीन आदिम सत्य को स्थापित करता है...”
― Kamleshwar, Jalti Hui Nadi

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अम्मा अम्मा
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