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“आत्मा की यथार्थसत्ता का ज्ञान प्रत्यक्ष द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है। उसके अनुसार 'मैं रूपभाव का प्रमेय पदार्थ आत्मा है।415 भिन्न—भिन्न बोधों की प्रत्यभिज्ञा ‘मेरी' के रूप में होना यह सिद्ध करता है कि आत्मा की सत्ता निरन्तर विद्यमान रहती है।416 जब कोई पुरुष किसी पदार्थ—विशेष को जानना अथवा समझना चाहता है तो वह पहले सोचता है कि यह क्या हो सकता है और उसे इस रूप में जानता है कि यह अमुक प्रकार का है। यह जानने की क्रिया उसी एक कर्ता की है जिसने जानने की इच्छा की थी, और पीछे का विचार भी उसी कर्ता का है। इस प्रकार यह ज्ञान उसी एक कर्ता की उपस्थिति का संकेत करता है और यही आत्मा है।417 हम उन पदार्थों का स्मरण करते हैं जिनका बोध हमें पहले हुआ हो।418 जब कोई किसी पदार्थ को देखता है, उससे आकृष्ट होता है तथा उसे प्राप्त करने की चेष्टा करता है, तो इस सब भिन्न—भिन्न क्रियाओं का आधार वही एक सामान्य सत्ता है जिसे हम आत्मा के नाम से जानते हैं।”
―
Bhartiya Darshan-II
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