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“Love thy neighbor as thyself because you are your neighbor. It is illusion that makes you think that your neighbor is someone other than yourself. ”
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“It is not God that is worshipped but the authority that claims to speak in His name. Sin becomes disobedience to authority not violation of integrity.”
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“It is the intense spirituality of India, and not any great political structure or social organisation that it has developed, that has enabled it to resist the ravages of time and the accidents of history.”
― Indian Philosophy: Volume I
― Indian Philosophy: Volume I
“The main function of a university is not to grant degrees and diplomas, but to develop the university spirit and advance learning. The former is impossible without corporate life, the latter without honours and post-graduate”
― Foundation of Civilisation: Ideas and Ideals
― Foundation of Civilisation: Ideas and Ideals
“The idea of Plato that philosophers must be the rulers and directors of society is practiced in India.”
― Indian Philosophy: Volume I
― Indian Philosophy: Volume I
“The complete use of pure reason brings us finally from physical to metaphysical knowledge. But the concepts of metaphysical knowledge do not in themselves fully satisfy the demand of our integral being. They are indeed entirely satisfactory to the pure reason itself, because they are the very stuff of its own existence. But our nature sees things through two eyes always, for it views them doubly as idea and as fact and therefore every concept is incomplete for us and to a part of our nature almost unreal until it becomes an experience.”
― A Sourcebook in Indian Philosophy
― A Sourcebook in Indian Philosophy
“Discontent with the actual is the necessary precondition of every moral change and spiritual rebirth.”
― Indian Philosophy: Volume I
― Indian Philosophy: Volume I
“anubhavāvasānameva vidyā phalam. The fruit of knowledge, the fruit of vidyā is anubhava.”
― Foundation of Civilisation: Ideas and Ideals
― Foundation of Civilisation: Ideas and Ideals
“In the nature of things a priesthood is always demoralizing.”
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“प्रार्थना सत्य का अन्वेषण है, जिसके लिए चेतना के उत्थान द्वारा अंतःस्थित अज्ञात में प्रवेश करना होता है।”
― Upnishadon Ka Sandesh
― Upnishadon Ka Sandesh
“आध्यात्मिक सिद्धि उपासना56 और नैतिक जीवन से प्राप्त होती है।”
― Upnishadon Ka Sandesh
― Upnishadon Ka Sandesh
“देह के साथ आत्मा का सम्बन्ध उसका जन्म कहलाता है एवं उससे अलग हो जाने का नाममृत्यु है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“वरुण, जो भारतीयों और ईरानियों, दोनों का देवता है, सूर्य के मार्ग और ऋतुओं के क्रम का नियामक है। वह जगत् को व्यवस्थित रखता है तथा सत्य और व्यवस्था का, जो मानव-जाति के लिए अनिवार्य है, मूर्तरूप है। वह नैतिक नियमों का रक्षक है और पापियों को दंड देता है।”
― Upnishadon Ka Sandesh
― Upnishadon Ka Sandesh
“आर्षज्ञान ऋषियों की अन्तर्दृष्टि है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“सर्वोच्च सत्य वह है जो संसार को पूर्ण रूप से समझने की महत्त्वपूर्ण तार्किक आवश्यकता की पूर्ति कर सके।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“एक प्रलोभन के प्रतिरोध से जो बल प्राप्त होता है, उससे हमें दूसरे प्रलोभन पर विजय पाने में सहायता मिलती है।”
― Upnishadon Ka Sandesh
― Upnishadon Ka Sandesh
“सत्य ब्रह्म या आत्मा है।”
― Upnishadon Ka Sandesh
― Upnishadon Ka Sandesh
“मन का आत्मा के साथ संयोग भी प्रत्येक प्रकार के ज्ञान में सामान्य मध्यवर्ती कारण है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“व्यापक विचार पहले चेतना में प्रकट नहीं होते। ज्ञान अनिश्चित से निश्चित की ओर बढ़ता है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“स्वात्मसत्त्व’ को आत्मनिर्भर अस्तित्व कहा है जो समस्त अस्तित्व से स्वतन्त्र है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“अंतःप्रेरणा एक संयुक्त प्रक्रिया है और मनुष्य की ध्यानावस्था तथा ईश्वरप्रदत्त दिव्यज्ञान उसके दो पक्ष हैं।”
― Upnishadon Ka Sandesh
― Upnishadon Ka Sandesh
“जिस प्रकार विश्व की प्रेरणा और हलचल के नीचे ब्रह्म शाश्वत शांति है, उसी प्रकार व्यक्ति की चेतन शक्तियों के नीचे मूलभूत सत्य, मानव आत्मा की अंतर्भूमि आत्मा है। विचार और प्रयत्न के धरातल के नीचे हमारे जीवन की एक चरम गहराई है। आत्मा ‘जीव’ का अतिसत्य है। छांदोग्य उपनिषद् में एक कथा है कि देव और असुर, दोनों आत्म के सच्चे स्वरूप को जानने की इच्छा से प्रजापति के पास जाते है।”
― Upnishadon Ka Sandesh
― Upnishadon Ka Sandesh
“आत्मा की यथार्थसत्ता का ज्ञान प्रत्यक्ष द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है। उसके अनुसार 'मैं रूपभाव का प्रमेय पदार्थ आत्मा है।415 भिन्न—भिन्न बोधों की प्रत्यभिज्ञा ‘मेरी' के रूप में होना यह सिद्ध करता है कि आत्मा की सत्ता निरन्तर विद्यमान रहती है।416 जब कोई पुरुष किसी पदार्थ—विशेष को जानना अथवा समझना चाहता है तो वह पहले सोचता है कि यह क्या हो सकता है और उसे इस रूप में जानता है कि यह अमुक प्रकार का है। यह जानने की क्रिया उसी एक कर्ता की है जिसने जानने की इच्छा की थी, और पीछे का विचार भी उसी कर्ता का है। इस प्रकार यह ज्ञान उसी एक कर्ता की उपस्थिति का संकेत करता है और यही आत्मा है।417 हम उन पदार्थों का स्मरण करते हैं जिनका बोध हमें पहले हुआ हो।418 जब कोई किसी पदार्थ को देखता है, उससे आकृष्ट होता है तथा उसे प्राप्त करने की चेष्टा करता है, तो इस सब भिन्न—भिन्न क्रियाओं का आधार वही एक सामान्य सत्ता है जिसे हम आत्मा के नाम से जानते हैं।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“ईश्वर की स्तुति के लिए उस पर कुछ आरोपित करने से अच्छा यह है कि उसमें से कुछ हटा लिया जाए। विशेष से सामान्य की ओर ऊपर उठते हुए हम सभी कुछ उसमें से हटा लेते हैं, जिससे कि सभी ज्ञेय चीज़ों के भीतर और नीचे जो अज्ञेय छिपा है उसे हम अनावृत रूप से जान सकें। और तब हमें अस्तित्व से परे का वह अंधकार दिखाई देता है जो समस्त प्राकृतिक प्रकाश के नीचे छिपा है।”
― Upnishadon Ka Sandesh
― Upnishadon Ka Sandesh
“प्रशस्तपाद के ग्रन्थ के आधार पर निर्मित एक वैशेषिक पुस्तक चन्द्रकृत दशपदार्थशास्त्र है, जो चीनी भाषा में अनूदित होकर सुरक्षित है। (648 ई.) किन्तु भारत की विचारधारा के विकास पर इसका प्रभाव नहीं हुआ।16 रावणभाष्य तथा भारद्वाजवृत्ति,17 जिन्हें वैशेषिक की टीकाएं बताया जाता है, उपलब्ध नहीं हैं। प्रशस्तपाद के ग्रन्थ पर चार टीकाएं लिखी गई हैं जो ये हैं—व्योमशेखर कृत ‘व्योमवती’, श्रीधरकृत ‘न्यायकन्दली’, उदयनकृत ‘किरणावली’ (दसवीं शताब्दी) और श्रीवत्सकृत ‘लीलावती’18 (ग्यारहवीं शताब्दी)। अन्य तीनों की अपेक्षा व्योमवर्ती पूर्ववर्ती है।19 श्रीधर की न्यायकन्दली 991 ई. में लिखी गई और टीकाकार कुमारिल, मण्डन तथा धर्मोत्तर के विचारों से परिचित है। लीलावती तथा किरणावली सम्भवतः न्यायकन्दली के तुरन्त बाद लिखी गईं।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“सनातन मिश्रित उदारता ही भारतीय संस्कृति व सभ्यता की सफलता का प्रधान रहस्य है।”
― Bhartiya Darshan-I
― Bhartiya Darshan-I
“अनुभवों या उनके सुरक्षित विवरणों पर विचार करके उन्हें एक युक्तियुक्त पद्धति में परिवर्तित कर देते हैं तो हमें ‘स्मृति’ प्राप्त होती है।”
― Upnishadon Ka Sandesh
― Upnishadon Ka Sandesh
“हम शरीर, जीवन और मन की मात्र एक फुहार नहीं है जो एक विशुद्ध आत्मा के–ऐसी आत्मा के, जो हमें किसी भी तरह प्रभावित नहीं करती–पर्दे पर फेंक दी गई है। इस फुहार के पीछे हमारी सत्ता की स्थायी शक्ति है जिसमें से असीम आत्मा अपने-आपको व्यक्त करती है।”
― Upnishadon Ka Sandesh
― Upnishadon Ka Sandesh
“परमात्मा पर निर्भर होते हुए भी वह जीव के अहं को बाह्य प्रतीत होता है, और उसके अज्ञान का स्रोत है। जल रूपहीन असत् का प्रतिनिधि है, जिसमें कि अंधकार से ढका वह दिव्य पड़ा रहता है। इस प्रकार हमें परम निरपेक्ष, अपने को सीमित करने की शक्ति, सीमित आत्म का आविर्भाव और अनात्म, जल, अंधकार, पराप्रकृति प्राप्त होते हैं। अगाध गर्त अनात्म है–मात्र क्षमता, केवल अमूर्त, जो समस्त विकास-क्रम का आधार है। आत्मचेतन सत्ता इस पर अपने रूपों या विचारों की छाप डालकर इसे अस्तित्व प्रदान करती है। अव्यक्त और असीमित आत्मचेतन ईश्वर से सीमाएं प्राप्त करता है।”
― Upnishadon Ka Sandesh
― Upnishadon Ka Sandesh
“सविकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान चेतना की एक व्यवह्त, भेद—प्रदर्शक एवं सम्बन्ध—निर्देशक अवस्था है जिसमें आत्मसात्करण और विभेदीकरण के परिणाम भी समाविष्ट हैं। यह व्यक्त, मूर्तरूप और निश्चित ज्ञान है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II




