Sharmishtha Quotes

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Vishnu Sakharam Khandekar
“कहाँ थी मैं? इन्द्रलोक के नंदनवन में? मंदाकिनी में बहती आई हरसिंगार की सेज पर? मलयगिरि से चलने वाली शीतल सुगंधित पवन के झकोरों पर? या विश्व के अज्ञात सौंदर्य की खोज में निकले किसी महाकवि की नौका में?”
Vishnu Sakharam Khandekar, Yayati: A Classic Tale of Lust

Vishnu Sakharam Khandekar
“विविधता ही इस जीवन की देह है। परस्पर विरोधी बातें ही उसकी आत्मा हैं। जीवन का रस उसका आनंद उसका सम्मोहन उसकी आत्मा...इसी विविधता में है, विरोध में है।”
Vishnu Sakharam Khandekar, Yayati: A Classic Tale of Lust

Vishnu Sakharam Khandekar
“स्त्री के शरीर और पुरुष के शरीर में स्त्री और पुरुष के मन में, स्त्री और पुरुष के जीवन में, कितना अन्तर होता है! पुरुष अमूर्त के पीछे सहज दौड़ता है। इसीलिए उसे कीर्ति, आत्मा, पराक्रम, परमेश्वर आदि बातों में तुरन्त आकर्षण लगने लगता है! किन्तु स्त्री इन बातों पर आसानी से मोहित नहीं होती। उसे प्रीति, पति, संतान, सेवा, घर, गृहस्थी आदि मूर्त बातों का अधिक आकर्षण होता है। वह संयम बरतती है त्याग भी करती है किन्तु वह सब मूर्त बातों के लिए! उसे अमूर्त के प्रति उतना लगाव नहीं होता जितना पुरुष को। अपना सर्वस्व देकर पूजने के लिए अपने आँसुओं का अभिषेक करने के लिए स्त्री को एक मूर्ति की आवश्यकता हुआ करती है। पुरुष स्वभावतः आकाश का पुजारी है! स्त्री को धरती की पूजा अधिक प्यारी है!”
Vishnu Sakharam Khandekar, Yayati: A Classic Tale of Lust

Vishnu Sakharam Khandekar
“इसी वनवास में मैं यह भी जान पाई कि ॠषि-मुनि वन में जाकर तपस्या क्यों किया करते है। निसर्ग और मानव का नाता अनादि अनंत है। ये दोनाें मानो जुड़वाँ भाई हैं। इसीलिए निसर्ग के सान्निध्य में जीवन अपनी सारी सच्चाइयाँ लेकर हमारे सामने प्रकट हो जाता है। मानव यह समझने लगता है कि जीवन की असली शक्ति क्या है और उसकी सही-सही मर्यादाएं क्या हैं। मानव निसर्ग से दूर हो जाता है तो उसका जीवन एकांगी होने लगता है। उस कृत्रिम और एकांगी जीवन में उसकी कल्पनाएं, भावनाएं, वासनाएं सब अवास्तविक और विकृत बन जाती हैं। वो तो मेरा सौभाग्य था जो अभागिन होते हुए भी मैं यहाँ आई और जीवन की जड़ में जो सत्य हुआ करता है उसका दर्शन कर सकी।”
Vishnu Sakharam Khandekar, Yayati: A Classic Tale of Lust

Vishnu Sakharam Khandekar
“दासी के हाथ होते हैं, पाँव होते हैं किन्तु मुँह नहीं होता! और मन? वह तो होता ही नहीं!”
Vishnu Sakharam Khandekar, Yayati: A Classic Tale of Lust