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“ज़िन्दगी फिर चलेगी और फिर किस्से बुनेगी और फिर किसी भटकते लम्हे में एक दिन यह कलम पिरो लेगी सारी कहानियों को एक धागे में | फिर अफ़साने बनेंगे, फिर कुछ शेर, काग़ज़ पर सवार हो, पल भर का सुकूं बांटने निकलेंगे | फिर किसी कोहरे भरी सहर में आग जलेगी गुज़रे वक़्त की और ठिठुरते से जमा हो जायेंगे हम सारे, ज़िन्दगी से रूबरू होने, कहते :
"कोई क़िस्सा सुना ऐ ज़िंदगी ,
आँखें ख़ाली...सांसें हताश हैं ! "
...की यह लफ़्ज़ों का कारवां तब तक है, जब तक की सांसों का | सांस चलते फिर मिलेंगे.....अलविदा”
― Waqt Theharta Hai (Poetry Book 1)
"कोई क़िस्सा सुना ऐ ज़िंदगी ,
आँखें ख़ाली...सांसें हताश हैं ! "
...की यह लफ़्ज़ों का कारवां तब तक है, जब तक की सांसों का | सांस चलते फिर मिलेंगे.....अलविदा”
― Waqt Theharta Hai (Poetry Book 1)
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