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Sanjay Choubey
“दमयंती जी, पहाड़ी दिल के सच्चे और अक्ल के खोटे. अब इस अक्ल के खोटे को नमकीन चाय पिला दीजिये.’ ​शर्माती हुई दमयंती ने कहा था, “आप अक्ल के खोटे क्यों होंगे, अक्ल के खोटे तो हम जैसे पहाड़ी होते हैं.” थोड़ी देर की नोक-झोक में पता नहीं चला और लोलाब घाटी की रूमानी हवाओं का जादू चल गया, जिसमें अक्ल के खोटे व दिल के सच्चे दो पहाड़ी खो गये. ​दोनों पहाड़ी पौने दो महीने लोलाब घाटी में खोये रहे.”
Sanjay Choubey, Betarteeb Panne

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