श्रीयुत भुवनेश्वर प्रसाद, जो इस दुनिय में कुछ दिन रहे रचा, और फिर गायब हो गए। न जाने कब और किन अंधेरों उजालों मे जागते-सोते उन्होंने अपनी रचनाऍं लिखीं। श्रीयुत् भुवनेश्वर प्रसाद जिन्होंने अपनी लेखकीय आजादी को पूरी दबंगई और आत्मसम्मान से अपने सुनसानों में ओढ़ा-बिछाया,बरता और बिना किसी समझौतेके बुझ गए। श्रीयुत भुवनेश्वर प्रसाद का निर्वाण एक कला है, जिसकी कोई मिसाल नहीं। और होनी भी नहीं चाहिए। - भूमिका से
— Oct 18, 2014 10:21PM
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