विकास 'अंजान'’s Reviews > Nagarvadhuyen Akhbar Nahi Padhtin > Status Update
विकास 'अंजान'
is on page 50 of 112
उसकी हँसी से चिढ़कर उसने पूछा,'तुम्हें यहाँ डर नहीं लगता। इन लोगों को पता चल गया तो?'
वह हँसती जा रही थी, उसने नदी के उस पार क्षितिज तक फैले बालू का सूना विस्तार दिखाते हुए कहा,'जिन्हें पता चल गया है, वे लड़कियों के साथ उस पार रेती में कहीं पड़े हुए हैं और वे किसी से नहीं कहने जाएंगे...अलबत्ता हल्के होकर हम लोगों को हटाने के लिए और जोर से हर हर महादेव चिल्लाएँगे।...'
— Mar 02, 2017 01:01AM
वह हँसती जा रही थी, उसने नदी के उस पार क्षितिज तक फैले बालू का सूना विस्तार दिखाते हुए कहा,'जिन्हें पता चल गया है, वे लड़कियों के साथ उस पार रेती में कहीं पड़े हुए हैं और वे किसी से नहीं कहने जाएंगे...अलबत्ता हल्के होकर हम लोगों को हटाने के लिए और जोर से हर हर महादेव चिल्लाएँगे।...'
Like flag
विकास’s Previous Updates
विकास 'अंजान'
is on page 97 of 112
उस दुनिया को जाती सड़क एक बेहतरीन कहानी है. दिल के किसी हिस्से को इसने छू दिया है.
अगली कहानी आर जे साहब का रेडियो है और इसे खत्म करने के बाद मैं इस कहानी संग्रह को दुबारा पढूंगा.
— Mar 14, 2017 06:31AM
अगली कहानी आर जे साहब का रेडियो है और इसे खत्म करने के बाद मैं इस कहानी संग्रह को दुबारा पढूंगा.
विकास 'अंजान'
is on page 82 of 112
एक दूसरे को देखकर वे बिना बात के हँस पड़ते थे। रहस्य, विश्वास, रह-रहकर पलटती उत्तेजना और शोखी के दबाव से अनायास फूट पड़ने वाली उन्मुक्त हँसी। वे महानगर के सबसे उन्मुक्त प्रेमी थे, जिन्हें न कार पार्क करने की जगह खोजनी थी, न तो रेस्तराँ में मीनू को बेवजह घूरने का तनाव झेलना था और न ही किसी पार्क में भूखी-खुफिया आँखों से बचने की चिंता करनी थी।
— Mar 13, 2017 06:08AM
विकास 'अंजान'
is on page 77 of 112
उनके भारी दरवाजों की दरारों से घायल लोकगीत रह-रहकर निकलते और राजधानी के आधुनिक बाज़ारों में बेमकसद भटकते रहते। ज्यादातर ट्रैफिक में गाड़ियों के टायरों के नीचे आकर कुचलकर या धुएं में घुटकर मर जाते। कुछ बेहद कोमल थे जो सड़कों के किनारे ठिठके खड़े रहते, कभी कभार लोग उन्हें अपने साथ उठकर घर भी ले जाते थे।
— Mar 07, 2017 04:47PM
विकास 'अंजान'
is on page 64 of 112
ये एकदम नई और मजेदार चटनियाँ थीं जो लड़कों की जीभ पर तुरन्त चढ़ गईं। लड़कियों के लिए वे किसी काम की नहीं थी। घर में गाने पर बड़े धमकाते और ढिठाई करने पर एक आध चटकन भी लगा देते। ये चटनियाँ घर वालों से छिपाकर पाले गए पिल्लों जैसी कोई चीज़ थीं, जिन्हें बच्चे हमेशा अपने सीने से लगाए रखते थे।
— Mar 07, 2017 05:32AM
विकास 'अंजान'
is on page 62 of 112
दंगा भेजियो मौला ! 3.5/5
कहानी याथार्थ से परे लगती है या मैं अपने आप को दिलासा दे रहा हूँ. खैर, इस विषय में काफी सोचा जाना बाकी है.
अगली कहानी :
लोक कवि का बिरहा
— Mar 03, 2017 05:49AM
कहानी याथार्थ से परे लगती है या मैं अपने आप को दिलासा दे रहा हूँ. खैर, इस विषय में काफी सोचा जाना बाकी है.
अगली कहानी :
लोक कवि का बिरहा
विकास 'अंजान'
is on page 56 of 112
नगरवधुएँ अखबार नहीं पढ़ती हैं 5/5
अगली कहानी:
दंगा भेजियो मौला
— Mar 02, 2017 06:33AM
अगली कहानी:
दंगा भेजियो मौला
विकास 'अंजान'
is on page 17 of 112
नौकरशाही और धर्म का यह सम्बन्ध अरहर और चने के पौधों जैसा अन्योनाश्रित है। दोनों ही एक दूसरे को पोषण, समृद्धि और जीवन देते हैं
— Feb 27, 2017 08:54PM

