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विकास 'अंजान'
विकास 'अंजान' is on page 42 of 144
मिनी ने समझ लिया कि पति को लेकर उसके अपने मन में ही विरक्ति नहीं है, सारा परिवार ही उस व्यक्ति के प्रति विरक्त और उदासीन है। वह एक तरह से निश्चिन्त हो गई। कम-से-कम पति की सेवा करने या उससे अनुरक्त होने का आग्रह या प्रयत्न इधर से कोई नहीं करने जा रहा है। उसके पति से अलग रहने की बात से परिवार में परेशानी या चिंता किसी को नहीं है...अगर कुछ है तो सन्तोष और प्रसन्नता।
Apr 04, 2017 06:49PM
स्वामी

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विकास’s Previous Updates

विकास 'अंजान'
विकास 'अंजान' is on page 99 of 144
उपन्यास खत्म। अब अगला शरत बाबू की वो कहानी जिसको आधार रखकर इस उपन्यास को लिखा गया था।

उपन्यास की समाप्ति के बाद केवल एक ही प्रश्न मन में उठ रहा है। घनश्याम बनना क्या मुमकिन है? अगर होगा भी तो बहुत मुश्किल होगा। हम केवल बनने का प्रयत्न ही कर सकते हैं। बन कोई विरला ही पायेगा
Apr 06, 2017 02:57AM
स्वामी


विकास 'अंजान'
विकास 'अंजान' is on page 68 of 144
जो कल्पनाएँ कुछ देर पहले उसके तन-मन को पुलकित कर रही थीं, वे ही अब सौ-सौ दंश बनकर उसका मन छलनी किए दे रही हैं। अपने ही हाथों खिंची हुई दीवारों के बीच उसका मन बुरी तरह छटपटाने लगा। उसकी असली सुहागरात भी आँसुओं के बीच ही बीती थी, आज जिस सुहागरात की कल्पना की, उसकी परिणति भी आँसुओं में ही हुई। पर उस दिन विरक्ति और वितृष्णा से उसका मन भरा हुआ था और आज आकांक्षा और अपेक्षा से।
Apr 05, 2017 06:50AM
स्वामी


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