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Shaikhul Hassan
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जितनी भी कविताओं में मैंने बादल का ज़िक्र किया है वो बादल और कहीं का नहीं, ख़्वाजाबाग़ का ही है। हर पात्र जिसका नाम तितली रखा था, वो वही है जिसकी तस्वीर अंत में मैंने अपने घर के आँगन की टूटी हुई दीवार के नीचे दफ़्न कर दी थी। हर बार चाय कहने में ख़्वाजाबाग़ में चार बजे वाली माँ के हाथ की चाय याद आती थी। घर की खुशबू में बहुत बड़ा हिस्सा कश्मीर का है। क्या इन सारी चीज़ों को दफ़्न किया जा सकता है ?
— Jun 30, 2026 04:39AM
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