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विकास 'अंजान'
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भैया भोला भाला है। वह ऐसी बातें नहीं ताड़ पाता। लेकिन मैं बहुत जल्द समझ गई थी कि पिताजी और माँ में जो 'रोमांस' रहा है - मैं उसे अपने हृदय में रचा बसा चुकी हूँ। कुछ और बड़ी हो जाने पर उन दोनों को एक साथ देखने पर यही जान पड़ता कि यह तो मानो सिनेमावाली रोमांटिक और हिट जोड़ी है।
बातों में अहंभाव, हँसी-मजाक के दौरान रोशनी की चिलक, और आँखों की पुतलियाँ नचाकर मतलब जता देना - यह सब मैं बहुत पहले ही जान गयी थीं।
Jan 06, 2018 04:29AM
लीला चिरन्तन

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विकास 'अंजान'
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मन को अब तक पहचान पाया है कोई भला! मन जैसी चीज कभी किसी के हाथ लगी भी है?
और इसीलिए लोग, जैसा भी है चलते जाते हैं। मन-वन की अनदेखी करते हुए, 'सुख' पाने के लिए संसार बसाते जाते हैं।
Jan 07, 2018 05:09PM
लीला चिरन्तन


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