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विकास 'अंजान'
विकास 'अंजान' is on page 57 of 104
मैं किस तरह धीरे-धीरे परिवार के क्षेत्र के लिए प्रभावहीन बनता जा रहा हूँ, यह अनुभव मेरे भीतर बिंधता जा रहा था। इस पर मानो मैंने घर से खुलकर बाहर ही रहना चाहा। अनुभव हुआ कि घर और बाहर सच ही दो हैं और पुरुष का क्षेत्र बाहर है। वही उसके लिए आह्वाहन है, वही आश्वासन। जो घर में अपने को बंधन में पाता है,बाहर वही खुल जाता है। तब जैसे मुझे याद हुआ कि पारिवारिक भी कैसे सामाजिक में बाधा-रूप हो सकता है।
Jan 30, 2019 05:12PM
मुक्तिबोध

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विकास’s Previous Updates

विकास 'अंजान'
विकास 'अंजान' is on page 9 of 104
असहाय शिशु-से बने पति से अधिक पत्नी को और क्या चाहिए?और ऐसे क्षण पति मानो पत्नी के लिए सर्वस्व हो उठता है।
Jan 26, 2019 09:43PM
मुक्तिबोध


विकास 'अंजान'
विकास 'अंजान' is on page 7 of 104
मुझे उस मुख पर चिंता एकदम बुरी नहीं लगी। सचमुच इधर पत्नीत्व की संस्था में मुझे अर्थ प्रतीत होने लगा है। पत्नी बच्चों की माता हो सकती है, पर उमर आने पर उसकी गहरी वत्सलता पति को प्राप्त होती है; अर्थात विवाह का सार वय की नवीनता में नहीं मिला, अब अधिकता में मिल रहा है।
Jan 26, 2019 09:41PM
मुक्तिबोध


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