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Adiba
Adiba is 44% done
"मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोइ छीन लेता है,
झपट लेता है अण्टी से!

कभी खीसे से गिर पढ़ता है तो गिरने की
आहट भी नहीं होती,
खरे दिन को भी मैं खोटा समझ के भूल जाता हूं!

गिरेबान से पकड़ के मांगने वाले भी मिलते हैं
“तेरी गुज़री हुई पुश्तों का कर्ज़ा है,
तुझे किश्तें चुकानी हैं–”

बड़ी हसरत है पूरा एक दिन, इक बार मैं
अपने लिये रख लूं

तुम्हारे साथ पूरा एक दिन, बस खर्च करने कि तमन्ना है!"
Jul 16, 2021 01:33AM
Selected Poems

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Adiba
Adiba is 23% done
सलाखों के पीछे पड़े इंकलाबी की आंखों में भी
राख उतरने लगी है |
दहकता हुआ कोयला देर तक जब न फूका गया हो,
तो शोले की आंखें में भी
मोती की सफेदी उतर आती है!
Jul 16, 2021 01:30AM
Selected Poems


Adiba
Adiba is 23% done
"सलाहों के पीछे पड़े इंकलाबी की आंखों में भी
राख उतरने लगी है |
दहकता हुआ कोयला डर तक जब न फुंका गया हो,
तो शोले की आंखें मुझे भी
मोती की सफेदी उतरती है!"
Jul 16, 2021 01:26AM
Selected Poems


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