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“सरदार,'' गांधीजी ने कहा, ''अल्पमत हमेशा असुरक्षा के भाव का अनुभव करता है। आप उनकी परिस्थिति के बारे में सहानुभूतिपूर्वक सोचकर मुस्लिमों की ओर नहीं हो सकते?'' ''यह कैसे संभव है, बापू? तीस साल तक आपके चरणों में बैठकर जिस न्याय एवं नीति को सीखा है, उसमें कहीं भी हिंदू पक्ष या मुस्लिम पक्ष का पाठ नहीं सीखा।'' इतना कहकर सरदार ने नजर फेर ली।”
― Mahamanav Sardar (Hindi)
― Mahamanav Sardar (Hindi)
“गांधीजी ने सरदार से कहा भी था—''सरदार, देश के अल्पमत की यदि यह सोच है कि उन्हें इस देश में न्याय प्राप्त नहीं हो रहा और उनकी रक्षा नहीं की जाती, तो उसे मैं हमारी असफलता ही मानता हूँ।'' ''बापू, जो लोग कल तक पाकिस्तान की माँग कर रहे थे वे रातोरात इस देश के वफादार हो जाएँ, इस बात को देश के अन्य करोड़ों लोग स्वीकार नहीं कर सकते।”
― Mahamanav Sardar (Hindi)
― Mahamanav Sardar (Hindi)
“भव्यता विस्तार और कद के अधीन नहीं होती,”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“आकाश, पृथ्वी तथा सर्व दिशाओं में व्याप्त रुद्र, मरुत, आदित्य, वारुत और सिद्ध सर्व को समेटते हुए—जिस प्रकार नदियों के प्रवाह सागर की ओर बहते हैं, उस प्रकार समग्र मनुष्यलोक को उस आकृति में एकरूप होते हुए...”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“शतधन्वा को मारकर कृष्ण ने उसे हथिया लिया; और इस अमूल्य धनराशि में से उसे बलराम को हिस्सा न देना पड़े, इसलिए उसने मणि कहीं छिपा दी। बलराम और समग्र यादवगण को कृष्ण अँधेरे में रखना चाहता है क्या?”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“अर्जुन! आत्मप्रशंसा आत्मविलोपन के बराबर ही है। जिस प्रकार बड़े बंधु को कुवचन कहकर उसका वध किया, उसी प्रकार अब तू आत्मप्रशंसा करके विलोपन का प्रायश्चित्त कर ले।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“महायुद्ध के अंतिम दिन आपने जिस रथ से मुझे पहले उतारा, उस रथ से आप ही प्रथम उतर गए होते तो...तो यह कठिन घड़ी आज मेरे सामने न होती। शस्त्रास्त्रों के कारण पहले से ही धधक रहा रथ तब पलक झपकते ही भस्म हो गया था। मैं भी उस ज्वाला के साथ ही भस्म हो गया होता”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“बकुल पुष्पों की भाँति कुम्हलाई हुई-सी स्मृति पर आपने अभी जल का जो छिड़काव किया उससे स्मृति पंखुडि़याँ फिर खिल उठी हैं। उसकी सुगंध फिर हवा में महक उठी”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“कुरुक्षेत्र के उस प्रभात में जो हुआ, उसे कितना समय बीता होगा, उद्धव?’’ अश्वत्थामा ने अचानक ही पूछा। उसकी आँखों में चमक आई। ‘‘तात, तीन हजार वर्ष की अवधि पूरी होने में अब कितने वर्ष और शेष रह गए हैं?”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“राधा नंद के साले रायन की पत्नी थी और रायन कृष्ण के मामा थे। यह माना जाता है कि राधा उम्र में कृष्ण से काफी बड़ी थी। किंतु राधा को रूपक रूप में ही स्वीकार करके दूसरी रीति से उसकी गणना की गई है। इसमें कृष्ण की रासलीला मुख्य है। रास मंडल का अर्थ राशि मंडल किया गया है। ये राशियाँ नक्षत्र ही हैं। इन नक्षत्रों की कुल संख्या सत्ताईस है और इस राशि मंडल में—नक्षत्रों के ठीक मध्य में विशाखा नक्षत्र की गणना होती है। नक्षत्रों की गिनती कृतिका से शुरू होती है और बराबर चौदहवाँ नक्षत्र विशाखा है। इस विशाखा का एक नाम ‘राधा’ है और इस हिसाब से राशि मंडल में—कृष्ण के रास मंडल में बराबर राधा आती है। आकाशीय तत्त्वों के साथ तुलना करके राधा के समझने का यह आभास केवल बौद्धिक चमक जैसा लगता है।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“देहधारी के लिए इस परम सत्य को समझने का कदाचित् यही मौका है। देहधारी स्वयं में कोई निर्माण नहीं है, अर्जुन, वह मात्र निमित्त है! देह द्वारा प्रकट सत्य मात्र उस क्षण का सत्य होता है। उस सत्य को, उस क्षण प्राप्त करने में जो पीछे रह जाते हैं, उनके लिए फिर नया सत्य प्रकट होता है। सत्य की यही प्रक्रिया है जो शाश्वत है, वत्स!”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“गदायुद्ध में प्रतिस्पर्धी भीम को परास्त करने की एक योजना के एक भाग के रूप में दुर्योधन जो अभ्यास करता था, उसके लिए उसने भीम का पूरी तरह मिलता-जुलता वह पुतला बनवाया था। भीम को वह परास्त तो नहीं कर सका, उलटे वह पुतला ही भीम का जीवन-रक्षक बन गया। इसे कैसा न्याय कहा जाए! धृतराष्ट्र का नकटापन तो देखो। भीम के पुतले को भीम मानकर कुचल डालने के बाद उसने विलाप शुरू किया।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“यदुनंदन! अब तो पुत्र-पौत्रों, पत्नी आदि में मन इतना डूब गया है कि ऐसा विचार भी नहीं किया जा सकता है।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“जिस पुत्र ने परशुराम को भी परास्त किया, जिसने समग्र सृष्टि के राजाओं को परास्त करके तीन कन्याओं का हरण किया था, ऐसा नरश्रेष्ठ शिखंडी जैसे नपुंसक के कारण मृत्यु को प्राप्त हुआ, यह देखकर मेरा कलेजा विदीर्ण हो जाता है। उनके अंत का निमित्त शिखंडी बने, यह वक्रता मैं सहन नहीं कर सकती।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“अश्वों के पास शब्द नहीं हैं, भाई, किंतु उनमें भाव भी नहीं होंगे,”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“बद्रीनाथ की यह प्रतिमा पारसमणि की थी। पारसमणि का स्पर्श पाकर कोई भी वस्तु सुवर्ण की हो जाती है। उद्धव को लगा, हिमालय के ये पतितपावन शीत शिखर, बर्फ से ढके नहीं थे वरन् सुवर्ण से”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“धर्म-विषयक वाक्य सुनकर युधिष्ठिर क्रोध में नहीं आते, उलटे वह इन वाक्यों की मधुशाला में बह जाते हैं”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“वास्तव में, द्रौपदी को देखते ही चारों भाइयों के मुख पर जो लालसा प्रकट हुई थी, वह फूट का कारण न बने, इसलिए ही उसे साझा पत्नी का स्थान दिया गया हो,”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“पुरानी आँखों से नई नगरी के दर्शन किए।”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“व्यक्ति पर हुआ अन्याय चाहे जितना निष्ठुर हो, तब भी किसी सामर्थ्यवान् व्यक्ति को अपना एकाधिकार स्थापित करने का अधिकार नहीं मिल जाता!”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“विष्णुपुराण के पाँचवें अंश के तेरहवें अध्याय में इस रासलीला का वर्णन आता है। कृष्ण की बाँसुरी को सुनकर ये कन्याएँ अपने-अपने घर छोड़कर उतावली के साथ दौड़ी आती हैं। कोई गोपिका बाँसुरी की लय के अनुरूप गीत गाने लगती है तो कोई ध्यानमग्न होकर कृष्ण को देखती रहती है। कोई कृष्ण के नाम का उच्चारण करके शरमा जाती है तो कोई घर के बाहर निकलते समय बड़ों की नजर पड़ते ही पीछे अंदर दौड़ जाती है। इससे अधिक कोई विलासिता उसमें नहीं है। ‘हरिवंश’ के विष्णुपर्व में जिस रासलीला का वर्णन है, उसमें गोपियाँ चंचल कटाक्ष फेंकती हैं। स्तन से उपसी हुई छाती के साथ कृष्ण को दबाती हैं। इस रासलीला की विलासिता की इतिश्री मात्र इतने उल्लेख से ही हो जाती है। दैहिक संबंधों और स्पर्श-सुख की बात का यहीं प्रवेश होता है। किंतु ‘भागवत’ इससे कहीं अधिक आगे निकल जाती है। विलास का उसमें खासा विस्तार हुआ है। दशम स्कंध के रास पंचाध्याय में ये स्त्रियाँ पतियों तथा पुत्रों तक को छोड़कर आती हैं। यह वर्णन किया गया है कि कृष्ण इन स्त्रियों से भेंट पड़ते हैं; शरीर को स्पर्श करके, स्तन खींचकर, नख की अणि मारकर वह गोपियों के काम को उत्तेजित करते हैं।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“कृष्ण के चरणों में सिर रखकर राधा फफक उठी थी। और फिर आँसू, उसकी आँखों से कृष्ण के तलवों तक जैसे एक थरथराता तार था—आँसुओं का। राधा से फिर कभी कृष्ण मिले नहीं। ‘‘जरा...!’’ कृष्ण ने बात पूरी की—‘‘अर्जुन से कहना, गोकुल में...गोकुल में राधा को संदेशा भेजे कि कृष्ण की प्रतीक्षा अब व्यर्थ है। बस, इतना ही...अर्जुन से कहना,”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“गीता’ का मूल प्रश्न स्वधर्म है। अर्जुन का स्वधर्म यह था कि प्रवृत्ति युद्ध-विमुख नहीं होती।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“अश्वत्थामा उसे शुभ समाचार देता है—‘पाँच द्रौपदीसुतों और छठे आचार्यघाती धृष्टद्युम्न का हमने वध कर डाला है। अब पांडव पक्ष में पाँच पांडव, छठे कृष्ण और सातवें सात्यकि बचे हैं।’ यह सुनकर दुर्योधन इतने उत्साह में आ जाता है कि वह कहता है—‘जो काम भीष्म, कर्ण अथवा मेरे पिता धृतराष्ट्र ने भी मेरे लिए नहीं किया, ऐसा प्रिय कार्य तुमने किया है। आज मैं अपने को इंद्र के समान समझता हूँ।’ और इतना कहते ही उसने प्राण त्याग दिए।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“वैधव्य के साथ जुड़े हुए अन्य लक्षण—अवस्था, निराशा, प्रौढ़ता, बेचारापन—राधा में तो ऐसा कोई लक्षण नहीं। अरे, यहाँ तक कि राधा तो काल से भी अस्पर्श्य रही है। जैसी वर्षों पहले थी वैसी-की-वैसी स्वस्थ, जवान, चैतन्य से भरपूर और समर्पण में डूबी। यह कैसे संभव हुआ? महाकाल भी क्या कभी रुक जाता है? ‘‘उद्धव...’’ अंधकार को चीरती हुई राधा की आवाज सुनाई दी। उद्धव ने कदम बढ़ाए। कालिंदी-तट पर, खुले आकाश के नीच आकर राधा खड़ी हो गई। ‘‘ये रहे कृष्ण, उद्धव, ये रहे,’’ राधा उद्धव के अभिमुख होकर बोली, ‘‘आप यह आकाश देख रहे हैं न; बहती कालिंदी देख रहे हैं; हवा में लहराते उस तमाल वृक्ष के पत्ते देख रहे हैं—ये सब हैं, और आप कहते हैं कि कृष्ण नहीं? यह कैसे हो सकता है, उद्धव?क्या आप...आप कृष्ण को मात्र पार्थिव देह में ही देख सकते हैं?”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“आचार्यपुत्र! तुम्हें सुदर्शन चक्र ही चाहिए न! इसमें इतनी बड़ी बात क्या है?...इसके लिए तुम्हें अपनी अमोघ शस्त्र-विद्याओं का विक्रय करने की कोई आवश्यकता नहीं। अभी तो मुझे तुम्हारी विद्याओं की कोई जरूरत भी नहीं, जब होगी, तब मैं उसकी व्यवस्था कर लूँगा, वत्स! जाओ, सुदर्शन चक्र इस क्षण से तुम्हारा हुआ। तुम खुशी से उसे यहाँ से ले जाओ,’’ और फिर कुछ रुककर इतना और जोड़ा, ‘‘यदि ले जा सको तो!’’ ‘सुदर्शन चक्र इस क्षण से तुम्हारा है!’—इतना सुनते ही अश्वत्थामा के लिए कुछ सुनना शेष न रहा। वह तो एक उल्लास में डूब-सा गया। कृष्ण के और कोई शब्द उस तक पहुँच नहीं सके—कृष्ण ने एकदम अंत में जो कहा। वह अश्वत्थामा के कान में पड़ा हो तो भी उसने वह सुना नहीं।”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“हिमालय मानव के गर्व का खंडन करता है।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“निर्माण में जय-पराजय दोनों अनिवार्य होते हैं।”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“जिस राधा से कृष्ण गोकुल छोड़ने के बाद फिर कभी नहीं मिले, जिस राधा का कृष्ण ने कभी कोई उल्लेख किसीके सामने नहीं किया, वह राधा, कृष्ण के हृदय में वह राधा इस हद तक बसी थी—आज उद्धव को कितना रोमांच हो रहा था यह जानकर! वह मुग्ध हो गया था कृष्ण के इस रूप पर।”
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
― श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“कंस की हत्या अथवा दुर्योधन को कैद करने की बात एक संकेत है। संकेत के इस पल को जो समझ सकते हैं, वे कृष्ण हैं; जो नहीं समझ सकते, वे धृतराष्ट्र हैं। भविष्य कृष्ण के साथ रहता है; कारण, कृष्ण विशाल धर्म की खातिर प्रकट अधर्म का भी आचरण करते हैं।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna

![Mahamanav Sardar [મહામાનવ સરદાર] Mahamanav Sardar [મહામાનવ સરદાર]](https://i.gr-assets.com/images/S/compressed.photo.goodreads.com/books/1422070822l/24665575._SY160_.jpg)


