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Harsh Ranjan Harsh Ranjan > Quotes

 

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“-ये मम्मी के लिये।- मोहित ने दूसरा पैकेट बच्चे को दिया और बच्चा उसे लेकर सुधा के पास आया।

-ये सब छोड! ये तो आनी जानी चीज है। तू बना रह बस।- कलीग ने कहा।

-मुझे पता है कि मुझे कुछ नहीं होगा। मेरी जरूरत है अभी।- मोहित ने सुधा की तरफ देखकर कहा।

सुधा को लगा कि उसे किसीने तमाचा मारा हो। वो कमरे में नहीं गयी। मोहित को लेकर वो वापस आते वक्त रास्ते भर यही सोचती रही कि ना तो सच्ची प्रेमिका बनकर वो जान दे सकी और ना तो अच्छी पत्नी बनकर घर की रौनक। वो असफल स्त्री बनकर रह गयी है और साथ ही बर्बाद करने की एक मशीन जिसने सोनू की जान ली और मोहित की वो खुशियाँ जिसकी कामना उसने शादी के वक्त की होगी।

एक पहाड सा टूटा था नजर के आगे से जिसके दूसरी तरफ मोहित घायल पडा हुआ था। उसे लगा कि एक बार फिर से उसे जीता जा चुका है।

सामने मोहित आधी नींद में बिस्तर पर बडबडा रहा है। सुधा उसे एकटक देख रही है। ऐसा लग रहा है कि उसकी जिंदगी ने उसे खींचा हो इस दिशा की तरफ। अचानक वो मोहित के पास आयी और उसके ललाट पर हाथ रखा। मोहित की आँखें खुल गयी। आज की रात स्वीकारने की रात है और पहली बार बेड पर मुश्किल से लेटे मोहित के आगे सुधा ने अपना दुपट्टा कतरा-कतरा ढुलकाया, रौशनी कम हुई और बिजली सा चमक उठा सुधा का शरीर। कांच रौशनी से खेलता रहा, टुकडे होने के बाद भी और ये उसकी कीमत है।”
Harsh Ranjan, Daur tha, Gujar gaya...
“एक कप चाय!
चाय लेकर वह उसी तरह सरकता हुआ फिर उसी पिछली जगह वापस आ गया। उसके दिमाग मे कुछ चित्र घूम रहे थे… बिखरे हुए से कमरे में बैठा मुस्कुरा रहा आशुतोष, उसकी बनाई कच्ची-पक्की, बासी, सड़ी, गली रोटियां जिसे वो बेहद शौक से खा रहा है। दूसरी तरफ रौशन थी जिसके लैपटाप के कैमरा रॉल फोल्डर मे बीसीयों सेल्फीज भरी पड़ी थी, उसके आफिस का शोर एक तरफ था दूसरी तरफ बिना चेहरे वाले कई लोग थे जो चारों तरफ से उसे घेरे जा रहे थे। वही उसके पास खड़ी रिमझिम मुस्कुरा रही थी।
इस अनुभूतियों की भीड़ में अमृता कैसे पीछे छूट सकती थी। उसे लगा कि वो अभी-अभी अपनी उसी प्यारी सी मुस्कुराहट के साथ सामने आ खड़ी होगी और कहेगी कि भगवान तुम्हें वो सब दे और खूब दे जो मैं तुम्हें न दे सकी। ठीक उसी तरह जिस तरह भगवान ने उसे वो सब कुछ दिया और खूब दिया जो तब दीपक उसे नहीं दे सका। दीपक अचानक ही कह उठता है कि तुमसे तो अपना दुपट्टा तक नहीं संभाला जाता था…
….अब परिवार संभाल रही हूँ, है ना!
अमृता अपनी बेटी को फिर से दीपक को पकड़ाती है और दीपक शरमा जाता है, और वो श्रद्धा बन जाती है जो अपनी माँ के लिए रोती हुई हाथ में एक गुड़िया पकड़े वीणा की तरफ हाथ हिलाकर उसे टाटा कह रही है।
इस भीड़ मे खड़ा दीपक अपने आप को बहुत छोटा समझने लगा था, उसने मुड़कर देखा बढ़ रहा शोर असल में एक चक्की का था, जो पीछे वहीं तेजी से गेहुँ पीसता जा रहा था। उसने अपने चारों ओर देखा। हवा भी तेज चल रही थी और बारिश भी तेज हो रही थी।
“….आज भींगकर जाऊँगा घर!” उसने कहते हुए चाय की चुस्की ली और बारिश में उतर पड़ा।”
Harsh Ranjan, Saavan Ki Ek Saanjh
“नाश्ता तो तुमने किया नहीं और अब चाय के वक्त बाहर…”
संभवतः यही कहने के लिए वह पीछे.पीछे आ रही थी पर दरवाजा पार करते.करते रूक गई। आज इतनी देर में उसके शरीर, उसके दिमाग के साथ पता नहीं क्या-क्या हो गया जो उसे बिल्कुल से तोड़ गया। उसने दूसरे कमरे का रूख किया और दरवाजा बंद कर लिया। उसे लगा कि शायद यहाँ उसे पर्याप्त एकांत मिलेगा पर जैसे कि अचानक ही आंधियाँ चलने लगीं एक भीड़ सौ कोलाहल हजारों शब्द, बेशब्द, अर्थ, बेअर्थ, बेतरतीब हँसी, फंदे, फंदे, छोटे-बड़े, हर तरफ से घेरे, कितना तिरस्कार हर बार हर बार सबपर अमित की वही अजीब नजरें, वही अजीब मुस्कुराहट, उसे लगा कि यह सब उसके टुकड़े-टुकड़े शरीर और मन को धूल की तरह बिखने लगे हैं। उसकी समझ में तब कुछ और नहीं आया, बस जैसे कि सहारे के लिए हाथ हर चीज़ को टटोलते हैं, उसकी नज़र के सामने वही कुछ टूटी और कुछ साबुत चूड़ियाँ आईं। उसने कुछ को मुट्ठियों में दाबा जैसे कि उसे अपनी पकड़ पर भरोसा नहीं हो और तेज कदमों से अमित वाले कमरे में गई। वह अभी नहीं आया था। सिमी ने चूड़ियाँ के छोटे.छोटे टुकड़े कर किए और किसी अनजानी शक्ति के वशीभूत होकर उसने उन टुकड़ों को बिछावन पर बिखेर दिया।
अमित अभी तैयार होकर बाहर नहीं आया था। सिमी बिल्कुल से बेदम होकर पलंग से सिर टिकाकर जमीन पर बैठ गई।
बाहर की हलचल में अभी-अभी भाभी की आवाज सुनाई पड़ी थी, शायद वह अब… अब दरवाजा खटखटाएँगी।
सिमी उठकर खड़ी हुई।
भाभी ने दरवाजा खटखटाया- ‘सिमी!’
सिमी ने जवाब दिया और मुड़कर देखा तो दूसरे तरफ से अमित की आहट भी आ रही थी। उसकी नज़र बिछावन पर पड़ी चूड़ियों पर गई और वह दरवाजे की तरफ बढ़ी तो लगा जैसे कि आवाज आयी कुछ टूटने की सी … या टूटने की उस चरम सीमा से सवाल पूछते गुजरने सी। उसने इसे जानकर भी अनजाना कर दिया- ‘हाँ, आ रही हूँ!”
Harsh Ranjan, Ek Aag Ka Dariya
“-ध्यान से देखो, पहचानते हो?
मेरा इशारा यहाँ की छोटी सी -किंतु बेजान नहीं – इस सड़क की तरफ था …..यहाँ पर चलने वाले लोगों की सीधी-साधी चाल …..सड़क किनारे मंदिर में बज रही घंटियाँ ….सालों से खड़ा बरगद और उस पर लपेटी अनगिनत डोरियाँ….. निश्चल कोमल और पवित्र खिल-खिलाहटें ….अपनी इमानदार हाटें …..यहाँ की भोली-भाली उमंग ….अपने मिट्टी की गंध ….
हम दोनों गंगा के किनारे चले गये।
उमड़ते-घुमड़ते काले-काले मेघ….निश्चल और निर्मल गंगा…दूर तक फैलता कल-कल का स्वर….बहती ठंढ़ी हवाएँ ….तट पर की हलचल….
इस दृश्य ने जैसे हमें बाँध लिया था।
सामने से सावन की धूम-धाम जैसे धीरे-धीरे अपनी ओर बढ़ती आ रही थी।
-ये है अपना उत्सव!- मैंने कहा और आनंद के पास किनारे पर ही बैठ गया।
वह भी काफी देर से स्थिर बैठा, इस दृश्य को देखता रहा। दूर आकाश में काले-काले मेघ छा चुके थे और फिर जोरदार बारिश शुरू हो गयी। मौसम बिल्कुल ठंडा हो गया और चारों ओर सोंधी-सोंधी गंध फैल गयी।
काफी देर की चुप्पी के बाद उसने मुझसे कहा- ऐसा लगता है कि कहीं इन्हीं में खो जाऊँ! …..कहीं मिल जाऊँ ….
आज शायद उसने पहली बार अपने अंधेरे कमरे से निकलकर इस दुनिया को देखा था।
मेरे मन में एक संतोष सा हुआ और आँखों में आँसू आ गये -इसके लिए इन्हें भी तो यहाँ रखना होगा …इसी पवित्रता के साथ …इतनी ही गरिमा से ….
मैं फिर वापस आ गया।”
Harsh Ranjan, Zindagi Zero Mile
“- क्या बात है भईया आजकल अपनी क्लास की कम और गैर क्लास की लड़कियां पर आपका ज्यादा ध्यान है? - तुम किसके बारे में कह रहे हो? - एक ही तो है! - हर्ष ने कहा - मिस इंडिया! - असल बात मैं बताता हूँ! - वर्द्धन ने कहा - वो इस बार मैट्रिक की परीक्षा दे रही है। इसी में मैं उसकी मदद कर रहा हूँ। - भईया के पास तो फोन नंबर भी है उसका। - हर्ष ने मुस्कुराकर कहा। ​मैंने हसरत भरी निगाहों से उसे देखा। - नहीं! सोचो भी मत! - वर्द्धन साफ मुकर गया। - आप जो कहेंगे मैं सो करूँगा। - तमंचा सटा दोगे तो भी नहीं। - वर्द्धन ने कहा - खुद उससे पूछो। दे देती है नंबर तो अच्छी बात है। मुझे पहली बार अपने ‘मैं’ होने पर अफसोस हुआ और उसके ‘वो’ होने से ईर्ष्या हुई। क्लास में वो हर्ष की थी, क्लास से बाहर वो वर्द्धन की थी और घर लौटते वक्त मेरी ....... नहीं! मैं ऐसा नहीं कह सकता। ​मैं भारी चिंता में जी रहा था। कहाँ मेरी पैसेंजर ट्रेन और कहाँ नेहा की राजधानी एक्सप्रेस। मैं उसकी गति से गति कैसे मिलाऊँ, इसी चिंता में मैं जिया जा रहा था। हो सकता है कि कल वर्द्धन और नेहा एक ही कॉलेज में पढ़ने लगें। ऐसे में क्या होगा? मैं तो सीनियर्स की बराबरी नहीं कर सकता। मुझे लगने लगा कि मैं छोटा हूँ। इस छोटेपन के एहसास ने मुझे बड़ा रूलाया। खुद से बड़ी लड़की से प्यार करना कभी-कभी बड़ा कष्ट देता है। मुझे लगा कि मुझे नेहा का प्यार .......... प्यार बड़ी चीज है, कहें तो ध्यान पाने के लिये कम से कम वर्द्धन जैसा होना था, मतलब दो क्लास सीनियर और उम्र में”
Harsh Ranjan, Sankshipt
“गुंजन ने प्रभात को बुलाया था। दोनों बातें एक साथ हुई। हस्पताल में मंजू पड़ी थी और प्रभात वहाँ से निकल पड़ा। इतने दिनों बाद गुंजन…उसे लगा था कि वो अब नहीं आयेगी। उसके सामने थे उसके फलैट के वही रास्ते! वही मोड़। गुंजन ने उसे देखकर आँखें बंद कर ली थी! ऐसा लगा जैसे डर गयी हो। वह खुद भी पहचान में नहीं आ रही थी। इन कमरों में उसे हमेशा लाल कपड़ों में देखा जाता था! माथे पर सिंदूर और हाथों में ढेर सारी चूड़ियाँ पर आज…ऐसा लग रहा है जैसे कि कोई सन्यासिन…
-वो तो मैं बनना चाहती थी और बार-बार मैंने आपको भी उसी तरह बदलने की कोशिश की पर मुझे ही झुकना पड़ा।
प्रभात ने कमरे में एक शक्ति की अनुभूति की जो संभवतः उसकी ही थी और कमरे का माहौल हर बार से बिल्कुल बदला हुआ था। ये कमरा उसकी बाहरी जिन्दगी के उन क्षणों का प्रतिबिम्ब होता था जो कि वो आपने साथ गुजरती थी।
गुंजन की आँखों की चमक अलग थी और उसमें एक सादापन नजर आ रहा था जो कि उसमें कभी नहीं देखा गया था।
वह कह नहीं पायी पर उसकी आँखों में वो शक्ति जैसे कि उभरी हो। वह प्रभात के उस दूसरे चेहरे से वह उसका शरीर माँग रही थी।
गुंजन को मंजू के बारे में पता था। … मंजू! … उसका दर्द … उसकी गोद में अब एक छोटा सा बच्चा था! बहुत प्यारा बच्चा … उसकी आँखें …….उसकी नाक …. उसका मुँह…. उसका चेहरा ……. चेहरा!
प्रभात ने उस दूसरे चेहरे को ढूंढ़ा पर शायद उस बच्चे ने उसकी गोद में आने के बाद चुपके से उसे उतार लिया था।
प्रभात ने उस बच्चे को उतारकर वापस मंजू की गोद में दे दिया। मंजू की आँखों में खुशी थी। उसका चेहरा प्रभात को गुंजन के चेहरे से मिलता लग रहा था! जिसे वह अभी-अभी देखकर यहाँ आया है।
वहाँ गुंजन भी मुस्करा रही थी और यहाँ मंजू भी। प्रभात के पास जैसे कि अब कोई भी चेहरा नहीं बचा था। उस बच्चे ने उसके सिर पर से एक भारी बोझ उतार दिया। वह चुपचाप बाहर चला गया।
उसे काफी दिनों बाद उस शरीर को देखने का मौका मिला था जिसके दर्द को वह बहुत दिनों से केवल अनुभव ही कर पा रहा था।
उसने अपने आप को टटोला! लगा कि उसके दोनों चेहरों के बाद अब यहाँ केवल घाव थे। हर एक से पस और खून रिस रहा था।
उसकी कूबड़ी परछाई ने उसका पीछा करना छोड़ दिया था और उसका मन खुद उसे हल्का लग रहा था। उसे लगा कि जैसे अब कोई उलझन नहीं! कोई काम नहीं ….
उसने अपनी धीरे – धीरे थमती हुई नसें टटोली …… आस-पास गुजर रहे लोग जैसे हल्के – फुल्के ;अपने अपने हिसाब से चेहरे उसे पहनाते रहे और वो अपने घायल! थके बीमार शरीर को समेटकर चुपचाप सड़क के एक किनारे पर बैठ गया।”
Harsh Ranjan, Sankshipt
“संकेत निकल गया। तीज ने सब को पुकारकर कहा- लड़के लड़की को मिला दिया तो अब मूसलचंद क्यों बने हो? चलो सब बाहर!

-जरूर! – सभी दोनों को विश करते हुए बाहर निकले।

-बी क्यू!-तीज ने इशारा किया।

-कोई जरूरत पड़ी तो! – बी क्यू ने बहाना बनाया।

-इन दोनों को एक-दूसरे के अलावा और किसी चीज की जरूरत नहीं है। चलिये! बहानेबाज!

-ओके डीयर।

आज रविवार की इस शाम पूरे परिसर में मेधा थी, करण था और थी अनगिनत दिनों और अनगिनत रातों की कहानियाँ। नजरों नजरों में बात चलती…होंठ हिलते…स्मृतियाँ ताजी होतीं…कुछ याद करते, कुछ भूलते!

समय ने उन्हें आगे बढ़ते हुए आज मिलाया था और सिखाया था कि लोग आयु के एक दौर में सीखते हैं तो दूसरे दौर में जीते हैं। जीते-जीते उन्हें पता चलता है कि स्कूल और कॉलेज से निकलने के बाद भी लोगों को ज़िंदगी भर सीखना होता है और सीखने की ये प्रक्रिया ज़िंदगी के स्कूल में कितनी कठिन होती है और कैसी परीक्षाएँ देनी पड़ती हैं।

ब्लू लैब का ये प्रेरक एकांत, शाम का रंगीन माहौल, मेधा और करण की भावनाएं आपस में गुंथ पड़ती हैं और एक दूसरे की नजर से दुनिया को देखते हुए वो लाला जी को बुलाते हैं। लाला जी बड़ी अदा से चाय रखकर कंधे पर पड़े गमछे में पसीना पोछते हुए वापस जाते हैं। चाय की मीठी चुस्कियों के साथ जीवन के मीठे दौर की शुरुआत करने के लिए वो आज फिर से एक-दूसरे की हथेली थामते हैं। शायद आज कोई फिर से बड़े शहर की चकाचौंध और दमघोंटू माहौल को छोडकर आरा कि सहरसा कि भागलपुर के अपने छोटे से गाँव में वापस आया है और आँगन में लगी खटिया पर बैठकर, रसोई में चूल्हे पर ताव देती अपनी पत्नी को, खेत से लौटकर आ रहे अपने पिता को, ओसरे पर चावल चुनती अपनी माँ को, कमरे में छुपके अपनी भौजी का काजल लगाती अपनी छोटी बहन को, बल्ला-विकेट लेकर खलिहान से खेलकर लौटते अपने भाई को देखकर लंबी सी सांस भरता है, ‘घर में सब ठीक है!”
Harsh Ranjan, Chaay Tumhare Sath: Eeti: ek bihari love story (Chaay Tumhaare Sath Book 2)
“-क्या समझती हो तुम?- करण उसके नजदीक आया और उसे कंधों से धक्का देता दीवार पर ले गया।

-करण!-मेधा ने छूटने की कोशिश की।

-क्या करण!- करण ने आवाज अचानक मीठी की- चलो स्टार्ट करते हैं! देखो न! दूर-दूर तक कोई नहीं है। सिर्फ तुम!- करण ने मेधा के होठों पर उंगली रखी और बोला- सिर्फ मैं!

-करण! छोड़ो!- मेधा कसमसाई- प्लीज! छोड़ो न!

करण धीरे-धीरे उसके चेहरे पर झुकता गया। मेधा की सांसें अनियंत्रित थ, वो सिसकियाँ ले रही थी। करण के होंठ उसके होठों से मिले और करण की पकड़ ढीली पाकर वो अलग हट गयी। करण फिर बढ़ा।

मेधा ने सिसकी भरी और एक थप्पड़ चला दिया करण के गाल पर- प्लीज करण!

-यही आग लगी है न! करण ने मेधा की दोनों बाँहें मरोड़ी और मेधा को फिर से दीवार की तरफ खींच लाया- तुम देखना चाहती हो न!

-मुझे जाने दो प्लीज!

-तुम कहीं नहीं जाओगी!- करण ने उसके मंगटीके को खींचा।

-आह!

-प्यार का कीड़ा कुलबुला रहा है न दिमाग में!- करण ने दूसरे हाथ से उसके केश खींचते हुए कहा- आज ठंडी कर देता हूँ सारी आग!

मेधा की सांसें, उसकी इच्छा-अनिच्छा, उसकी तड़प, उसका दर्द, उसकी सिसकियाँ सभी करण के ताबड़तोड़ चुंबनों में कैद हो गईं। करण को हिसाब नहीं था कि उसने कुछ पलों के गुजरते-गुजरते कितने घाव लगा दिये थे मेधा के शरीर पर, उसके चेहरे के छोटे से छोटे हिस्से को भी वो घायल कर चुका था।

मेधा बेजान सी बेजान दीवार के सहारे बैठ गयी। उसकी आँखों में आंसू थे, उसके चेहरे पर ज्योंकी गहरे-गहरे घाव लगे थे, वो बिलकुल से टूट चुकी थी।

-अच्छी पूजा की तुमने एक लड़की की…करण ने पीछे मुड़कर देखा और फिर नजर फेरकर आगे बढ्ने को हुआ।

-तुम्हें वहाँ से निकलना पड़ेगा करण! थोड़ा पहले या थोड़ा बाद!

करण उसे अनसुना कर गया।

मेधा ने देखा तो वो माँगटीका वहीं, उसके सामने गिरा हुआ था। उसने अपना हाथ बढ़ाया और उसे हथेली पर उठाया। मुट्ठी बंद करते वक़्त उसकी आँखें फिर से छलछला गयी।”
Harsh Ranjan, Chaay tumhare sath : Prarambh: ek bihari love story (Chaay Tumhaare Sath Book 1)

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