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“ उन्हें आता है हमारे प्यार पे गुस्सा। हमें उनके गुस्से पे प्यार आता है। " - उर्मिला ( वतन और देश )”
― झूठा सच : वतन और देश [Jhootha Sach: Vatan Aur Desh]
― झूठा सच : वतन और देश [Jhootha Sach: Vatan Aur Desh]
“मन की उग्र इच्छाएँ और व्याकुलताएँ ही मनुष्य के वे संस्कार हैं जो मृत्यु को पीड़ामय बना देते हैं।”
― Divya
― Divya
“उन्हें आता है हमारे प्यार पे गुस्सा। हमें उनके गुस्से पे प्यार आता है। - उर्मिला”
― झूठा सच : वतन और देश [Jhootha Sach: Vatan Aur Desh]
― झूठा सच : वतन और देश [Jhootha Sach: Vatan Aur Desh]
“अलस उदासीनता में, उपेक्षित शुभ्र वस्त्रों से फूटी पड़ती अपने शरीर की कमनीयता के प्रति वह इस प्रकार निरपेक्ष थी जैसे वह उसके वश का विषय नहीं। पल्लव ओष्ठों के क्षीण स्फुरण से उदास मुख पर शिष्टाचार की मुस्कान लाने का प्रयत्न कर, हाथ जोड़”
― Divya
― Divya
“पाये बिना किसी वस्तु का त्याग नहीं किया जा सकता। संसार को कोई पा नहीं सकता, इसलिए उसे कोई त्याग भी नहीं सकता। परिग्रह और त्याग दोनों का प्रयोजन संतोष है। जब तक मन में चिन्ता है, संतोष नहीं।”
― Divya
― Divya
“धर्म पर संकट नहीं आता। केवल धर्म के प्रति विश्वास प्रकट करने वाले जन भयभीत होकर संकट अनुभव करते हैं। धर्म कभी अधिक मनुष्यों के हृदय और विश्वास में स्थान पाता है और कभी कम मनुष्यों के।”
― Divya
― Divya
“निरन्तर प्रयत्न ही जीवन का लक्षण है। जीवन के एक प्रयत्न या एक अंश की विफलता सपूर्ण जीवन की विफलता नहीं”
― Divya
― Divya
“विजय शत्रु का शरीर वश करने में नहीं, उसके मन की भावना को वश करने में है। जैसे तथागत ने देवदत्त के मन को, धर्मघोष ने सम्राट अशोक के मन को और अर्हत नागसेन ने सम्राट मिलिन्द के मन को विजय किया था।”
― Divya
― Divya
“मैं भिक्षु पृथुसेन, सार्वभौम मैत्री का सुख पाकर, आचार्य के प्रति शत्रुता के भाव से रहित होकर भय और चिन्ता से मुक्त हुआ हूँ।”
― Divya
― Divya
“धर्म की रक्षा और संघ के धर्म की रक्षा का महत्व शरणागत को शरण देने में है। इससे संघ का शरीर संकट अनुभव करके भी धर्म की वृद्धि करेगा और शरणागत को त्याग कर संघ को शरीर-रक्षा के मोह से धर्म की हानि होगी।”
― Divya
― Divya
“जीवन का कोई अनुभव स्थायी और चिरंतन नहीं। जीवन की स्थिति समय में हैं और समय प्रवहमान है। प्रवाह में साधु-असाधु, प्रिय-अप्रिय सभी कुछ आता है। प्रवाह का यह क्रम ही सृष्टि और प्रकृति की नित्यता है। जीवन के प्रवाह में एक समय असाधु, अप्रिय अनुभव आया इसलिए उस प्रवाह से विरक्त होकर जीवन की तृषा को तृप्त न करना केवल हठ है।”
― Divya
― Divya
“कला की उस पीठ में पर्व और तिथि के उपलक्ष्य में होने वाला कला का अनुष्ठान केवल रीति की रक्षा मात्र रह गया था; प्राण और उत्साह का उसमें अभाव था।”
― Divya
― Divya
“धन का उपयोग भोग में है। वह उसे किस प्रकार भोगे सुन्दर वस्त्र, आभूषण, भव्य भवन सब कुछ है, परन्तु वे क्या सन्तोष देते हैं? वे जीवन का लक्ष्य नहीं, केवल उपकरण मात्र हैं।”
― Divya
― Divya
“यही है वेश्या के जीवन का विद्रूप! यही है उसकी सफलता, समृद्धि और आत्म-निर्भरता? वेश्या देती है अपना अस्तित्व और पाती है केवल द्रव्य। परन्तु पराश्रिता कुलवधू अपने समर्पण के मूल्य में दूसरे पुरुष को पाती है, किसी दूसरे पर भी अधिकार पाती है।...वेश्या का जीवन मोटी बत्ती और राल मिले तेल से पूर्ण दीपक की, अनुकूल वायु में अति प्रज्वलित लौ की भाँति या उल्कापात की भाँति क्षणिक तीव्र प्रकाश करके शीघ्र ही समाप्त हो जाता है। कुलवधू का जीवन मध्यम प्रकाश से चिरकाल तक टिमटिमाते दीपक की भाँति है। ममता भरी शरण के हाथ, प्रतिकूल परिस्थितियों के झंझावात से उसकी रक्षा करते हैं।”
― Divya
― Divya
“उसकी पीड़ा की पुकार श्रोताओं के हृदय में प्रवेश कर, करुण रस के गीतों के श्लेष की अनुभूति स्थूल सत्य का उग्र रूप ले लेती। नृत्य में उसकी आत्मरति अदृष्टपूर्व थी।”
― Divya
― Divya
“दूसरे के शब्द पर अंधविश्वास करने की अपेक्षा अपनी अनुभूति और तर्क का आश्रय लो? यह जीवन ही सत्य है।”
― Divya
― Divya

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