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Start by following हजारी प्रसाद द्विवेदी.
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“चिन्ता में निमग्न मनुष्य अन्धा होता है।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“कांचनार-पुष्पों से नगरप्रान्त की वनस्थली लहक उठी थी”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“मामूली वस्त्र की पृष्ठभूमि में उनकी शोभा-सम्पत्ति शतगुण समृद्धिशालिनी दिख रही थी।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“आर्य, नारायण मनुष्य के बाहर तो नहीं रहते हैं न? तुम प्रसन्न हो, तो निश्चय ही नारायण प्रसन्न हैं। तुम नारायण के ही तो रूप हो, आर्य!”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“प्रत्यग्रस्नान ने उसकी कान्ति निखार दी थी। उसने घनमेचक केशपाश कपोलदेश को घेरकर सुशोभित हो रहे थे। पीत कौशेय वस्त्र से लिपटी हुई उसकी अंगयष्टि सुवर्ण शलाका के समान मनोहर दिख रही थी।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“त्रिपुरभैरवी, तुम्हारी लीला अपरम्पार है। काल, नियति, राग, विद्या और कला माया के कंचुक हैं; पर सत्य हैं। इन्हें अतिक्रमण कौन कर सकता है? त्रिपुरसुन्दरी की लीला है!”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“वैश्वानर? सम्पूर्ण विश्व का रूप ही नर-रूप में आराध्य है। खंड-दृष्टि से नहीं, पूर्ण-दृष्टि से देखना ही वैश्वानर की उपासना है।”
― अनामदास का पोथा
― अनामदास का पोथा
“आँखें एक विचित्र आनन्द-ज्योति से प्रदीप्त हो उठीं।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“मानव-देह केवल दंड भोगने के लिए नहीं बनी है, आर्य! यह विधाता की सर्वोत्तम सृष्टि है। यह नारायण का पवित्र मन्दिर है। पहले इस बात को समझ गई होती, तो इतना परिताप नहीं भोगना पड़ता। गुरु ने मुझे अब यह रहस्य समझा दिया है। मैं जिसे अपने जीवन का सबसे बड़ा कलुष समझती थी, वही मेरा सबसे बड़ा सत्य है। क्यों नहीं मनुष्य अपने सत्य को अपना देवता समझ लेता, आर्य?”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“यह प्रमाद है आर्य, कि यह शरीर नरक का साधन है। यही बैकुंठ है। इसी को आश्रय करके नारायण अपनी आनन्दलीला प्रकट कर रहे हैं। आनन्द से ही यह भुवन-मंडल उद्भासित है। आनन्द से ही विधाता ने सृष्टि उत्पन्न की है। आनन्द ही उसका उद्गम है, आनन्द ही उसका लक्ष्य है। लीला के सिवा इस सृष्टि का और क्या प्रयोजन हो सकता”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“मेघ-गम्भीर स्वर”
― बाणभट्ट की आत्मकथा
― बाणभट्ट की आत्मकथा
“मनोगमा पाँचों नाड़ियाँ अब पूर्ण स्वस्थ हैं। यह देख, कल्पिका है, इससे संकल्प होता है; यह विकल्पिका है, इससे मन में विकल्प होते हैं; यह स्थीवा है, इसमें जड़ता आती है; यह मूर्च्छना है, इससे मूर्च्छा होती है; और यह मन्या है, इससे मननशक्ति प्राप्त होती है। भट्ट की स्थीवा कमजोर है। अब ठीक हो जाएगी।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“अन्त तक निवात-निष्कम्प दीपशिखा की भाँति हाथ जोड़े बैठी रही। बड़ी देर तक यह भजन चलता रहा। अन्तिम कार्य सुचरिता का गान था। आहा, संगीत की ऐसी शीतल मन्दाकिनी भी इस मर्त्यलोक में है! समस्त जनमंडली जड़ की भाँति, स्तब्ध की भाँति चुपचाप उस मधुर धारा में स्नान कर रही थी।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“राजनीति भुजंग से भी अधिक कुटिल है, असिधारा से भी अधिक दुर्गम है, विद्युत-शिखा से भी अधिक चंचल है।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“अगर विशाल ऐश्वर्य देखकर मैं अभिभूत न हो गया होता, तो निश्चय ही इसका उपयुक्त उत्तर देता। वस्तुतः जब मैं बाहर निकल आया, तो मेरे मन में हजार-हजार उत्तर उद्भूत और विलीन होने लगे। मैं अपने विष से आप ही दीर्घकाल तक जलता रहा। मुझे उस समय अपने प्राणों की कोई परवा नहीं थी; परन्तु फिर भी ऐसा उत्तर नहीं दे सका, जो उचित कहा जा सकता है; जो महाराजाधिराज को यह अनुभव करा देता कि महाराजा होने मात्र से किसी को किसी के विषय में अनर्गल विचार रखने का अधिकार नहीं हो जाता।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“इस बार मेरा आवारा मन मुँहजोर घोड़े की तरह लगाम से विद्रोह कर उठा।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“वासुदेव उस नीलकमल-माला की-सी दृष्टि से बँधकर प्रसन्न हुए।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“सपुष्पा चन्द्रमल्लिका”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“महामाया ने स्नेहपूर्वक कहा, “ना रे, ना! मैं विघ्नों की पूजा का ही तो तप कर रही हूँ। विघ्न ही तो मेरे उपास्य हैं। तेरे शास्त्रों के अनुसार तू भी तो एक विघ्न ही है। विधाता ने विघ्न के रूप में ही तो सुन्दरियों की सृष्टि की थी।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“रंग मैला था; परन्तु आँखों में अपूर्व माधुर्य था। अधरों पर स्वाभाविक हँसी खिलानेवाला वह धर्म, जिसे सौन्दर्यशास्त्री ‘राग’ कहते हैं, इस गम्भीर मुख-श्री में भी प्रत्यक्ष हो रहा था। उसकी प्रत्येक अंग-भंगिमा से भक्ति की लहर तरंगित हो रही थी; पर अनाड़ी भी समझ सकता था कि वह ‘छायावती’ रही होगी, क्योंकि उसकी प्रत्येक गति से वक्रिमता और परिपाटी-विहित शिष्टाचार प्रकट हो रहे थे। सहृदय लोग जिस रंजक गुण को ‘सौभाग्य’ कहते हैं, जो पुष्प-स्थित परिमल के समान रसिक भ्रमरों का आन्तरिक और प्राकृतिक वशीकरण धर्म है, वह सुचरिता के अपने हिस्से पड़ा था। शोभा और कान्ति उसके प्रत्येक अंग से निखर रही थी और प्रत्येक पदविक्षेप में औदार्य बिखर रहा था।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“जिस प्रकार निर्वाण-प्राप्त अग्नि तृण, काष्ठ आदि ईंधनों को नहीं ग्रहण करती, उसी प्रकार लोक-हितकारी भगवान् भी कुछ परिग्रहण नहीं करते। परन्तु जिस प्रकार महाराज, ईंधनहीन अग्नि के निर्वाण-प्राप्त होने पर मनुष्यगण अपने-अपने उद्यम से अग्नि उत्पन्न करके अपना-अपना कार्य सिद्ध करते हैं, उसी प्रकार देव और मनुष्यगण परिनिर्वाण-प्राप्त तथागत के धातुरत्नों से स्तूपादि निर्माण करके शीलादि का अनुष्ठान करते हैं और सम्पत्तित्रय प्राप्त करते हैं। इस प्रकार महाराज, यद्यपि तथागत कुछ भी ग्रहण नहीं करते, तथापि उनके उद्देश्य से निवेदित पूजा सफल होती है, अबन्ध्य होती है!”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“भगवान् तथागत का धर्म अन्धश्रद्वा पर प्रतिष्ठित नहीं है। वह युक्ति और विचार का अविरोधी है इसीलिए वह सद्धर्म है।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“वराहमिहिर की बात याद आती रही और मैं उनकी सहृदयता पर मुग्ध हुए बिना नहीं रहा। उन्होंने ठीक ही कहा है, स्त्रियाँ ही रत्नों को भूषित करती हैं, रत्न स्त्रियों को क्या भूषित करेंगे! स्त्रियाँ तो रत्न के बिना भी मनोहारिणी होती हैं; परन्तु स्त्री का अंग-संग पाए बिना रत्न किसी का मन हरण नहीं करते।1 आज यदि आचार्य वराहमिहिर यहाँ उपस्थित होते, तो और भी आगे बढ़कर कहते—धर्म-कर्म, भक्ति-ज्ञान, शान्ति-सौमनस्य कुछ भी नारी का संस्पर्श पाए बिना मनोहर नहीं होते—नारी-देह वह स्पर्श-मणि है, जो प्रत्येक ईंट-पत्थर को सोना बना देती है।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“शास्ता (बुद्ध) दस सहस्र लोगों पर मृदु-मधुर वायु के समान मैत्री-रूप में बहते रहे। जिस प्रकार प्रचंड वायु बह जाने के बाद उपरत-उपशान्त हो जाती है, वैसे ही महाराज, भगवान् भी निर्वाण को प्राप्त हो गए। जिस प्रकार महाराज, तापग्रस्त प्राणी व्यजन के सहारे वायु को फिर से ले आकर अपना ताप शमन करते हैं, उसी प्रकार महाराज, देवता और मनुष्य भगवान् के शरीर-धातु की सहायता से शीलादि का अनुष्ठान करके अपना भव-ताप दूर करते हैं। इस प्रकार महाराज, यद्यपि तथागत कुछ भी ग्रहण नहीं करते, तथापि उनके उद्देश्य से निवेदित पूजा सफल होती है, अबन्ध्य होती है।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“विधाता का कैसा विरूप विधान है! कितनी कोमल देह-लता है और कैसी भारी अनुभाव-सम्पत्ति है! कितना मृदुल हृदय है और कितनी कठोर तपश्चर्या है!”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“वह मूर्तिमती भक्ति की भाँति, विग्रहवती शोभा की भाँति, प्रत्यक्ष आविर्भूत लक्ष्मी की भाँति और अनुरागवती सन्ध्या की भाँति हृदय को एक अपूर्व रस से सिक्त कर रही थी।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“सारा शरीर ही छन्दों से बना था। उसके वस्त्र, उसके पदविक्षेप, उसका कंठस्वर, उसकी दृष्टि—सबकुछ छन्दोमय थे। उसके इस वाक्य में भी वीणा का-सा झंकार था।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“नारीहीन तपस्या संसार की भद्दी भूल है। यह धर्म-कर्म का विशाल आयोजन, सैन्य-संगठन और राज्य-व्यवस्थापन सब फेन-बुद्बुद की भाँति विलुप्त हो जाएँगे; क्योंकि नारी का इसमें सहयोग नहीं है। यह सारा ठाठ-बाट संसार में केवल अशान्ति पैदा करेगा।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“भेड़ियों के समान निर्घृण और चींटियों से भी अधिक संघबद्ध प्रत्यन्त-दस्यु सीमान्त पर फिर एकत्र हो रहे हैं।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha
“फाटक से राजमार्ग तक गोमय से उपलिप्त भूमि खटिकचूर्ण की अभिराम मंडलिकाओं से सुशोभित थी। चौखट के ऊपर क्षीर-सागरशायी नारायण की मूर्ति उत्कीर्ण थी और उसे घेरकर एक मनोहर मालतीमाला सुन्दर ढंग से टँगी हुई थी। पार्श्वों में छोटी-छोटी वेदिकाओं पर मंगल-कलश सुसज्जित थे और मकान के ऊपर सौभाग्यपताका लहरा रही थी।”
― Banbhatt Ki Aatmakatha
― Banbhatt Ki Aatmakatha




