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Mannu Bhandari Mannu Bhandari > Quotes

 

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“जो ज़िंदगी को इतना प्यार करता हो...अपनी ही नहीं, हर किसी की ज़िंदगी को...वह आत्महत्या करेगा? नहीं साहब, नहीं...नहीं! उसे मारा गया है!’ ‘पर किसने मारा? क्यों मारा?”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“क्योंकि वह ज़िंदा था! ज़िंदा रहने का मतलब समझते हैं न आप?”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“आवेश उसका सिसकियों में बदल जाता है और गर्जना कराह में।”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“सहमते मन से सब अपनी-अपनी कुर्सियों के पाए सहलाने लगे!”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“मौन साधक की तरह स्थिर बैठे रहे–शांत, अविचलित और निर्विकार।”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“लोगों के बीच ही नहीं, लोगों के मन में जगह बनाना ही असली उद्देश्य”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“उसकी आँखों के डोरों में फिर सुर्ख़ी उभर आई,”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“लोगों के घर, ज़मीन और गाय-बैल ही रेहन नहीं रखे हुए हैं जोरावर और सरपंच के यहाँ, उनकी आवाज़ और जबान तक बंधक रखी हुई है।”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“आदमी जब अपनी सीमा और सामर्थ्य को भूलकर कामना करने लगे तो समझ लो, पतन की दिशा में उसका क़दम बढ़ गया।”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“मन में जैसे धीरे-धीरे कोई कराह रहा”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“बस समझ लीजिए सर, हम सब लोगों के ज़िंदा रहने पर प्रश्नचिन्ह लगाकर वह मर गया”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“अपनी पनीली आँखें ज़मीन में गाड़ दीं।”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“एक ख़ास तरह की तुर्शी और तेज़ी आ गई उसके मिज़ाज में।”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“ऊँचे क़िस्म की घाघ और घुन्नी चीज”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“नज़रें ज़मीन पर और मन गड्‌ढे में।”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“व्यवहार में ऐसा संतुलन-संयम बड़ी साधना से ही आता है”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“मत टसुए बहा, हरामज़ादी! मेरे भीतर सुलगती आग इन आँसुओं से ठंडी हो गई तो सबकी तरह ज़नख़ा हो जाऊँगा मैं भी।”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“धोती के नीचे सभी नंगे और ससुरी इस राजनीति में तो धोती के बाहर भी नंगे।”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“नहीं ससुरों का।”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“कहाँ से होगी दूसरी क्रांति और कौन करेगा उस क्रांति को”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“इससे तो साले कुछ कर देते।”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“साथ चलना है तो भाई, ज़बान पर लगाम और व्यवहार में ठहराव चाहिए...”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“आत्मा के साथ बलात्कार करने की व्यथा क्या होती”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“इंसानियत की खाद पर ही कुर्सी के पाए अच्छी तरह जमते हैं।”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“ओस-भीगी दूब पर घूमने से केवल नेत्रों की ज्योति ही नहीं बढ़ती, मन-मस्तिष्क में भी ऐसी तरावट आती है कि सारा दिन आदमी तनाव-मुक्त होकर काम कर सकता है। मन शांत, चित्त प्रफुल्लित!”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“आस्था से कही बात और आस्था से किया काम दूसरे तक न पहुँचे, यह हो ही नहीं”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“स्वर में आवेश क़तई नहीं होता, पर इस हद तक का ठंडापन कि सुननेवाला जम जाए पूरी तरह।”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“और जो ज़िंदा हैं, वे अब जी नहीं सकते अपने इस देश में। मार दिए जाते हैं, कुत्ते की मौत!”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“आँखों की कोरों से दो बूँदें ढुलककर झुर्रियों में ही बिला गईं।”
― Mannu Bhandari, महाभोज
“उम्मीद की डोर से बँधा हुआ आदमी भी बहुत कुछ कर गुज़रता है कभी-कभी!”
― Mannu Bhandari, महाभोज

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