असंयत उद्विग्न

आप कभी नहीं समझ पाएंगे कि आसान क्या है और मुश्किल क्या? इस दुनिया में सबकुछ अपनी न्यूनता और आधिक्य के साथ गुण-दोष में परिवर्तित होता रहता है। इधर कई रोज़ से आसमान में बादल हैं। सूरज दिखा नहीं। पूरे राजस्थान में बरसात किसी नवेले प्रिय की तरह बरस रही है। कुछ एक टुकड़े जो सूखे हैं, बादलों की छतरी उन पर भी बनी हुई है। रेगिस्तान तपता हुआ कितना कड़ा लगता है। पानी ही जीवन की इकलौती ज़रूरत जान पड़ती है। जहाँ तक आप देख पाते हैं, केवल सूखा और तपिश दिखाई देती है। इधर जब बादल आसाम पर डेरा डालते हैं और बिखरने का नाम नहीं लेते तब स्थिति प्रकृति के विपरीत हो जाती है। कैसी आदतें होती है न। सूखे, बियाबान और उजाड़ में जीने की आदत। प्यास, पसीना और तन्हाई की आदत। प्रेम की कामना, प्रतीक्षा और उसके अंत होने की चाहना। लेकिन कभी सब बदल जाता है। सडकों के किनारे काई जमी दिखने लगती है। हरियाली का बारीक अक्स हर तरफ उभर आता है। सीले कमरे, सीले पैराहन, सीले बिस्तर और भीगी भारी स्मृतियां।

सफ़र के टुकड़े पांवों में चुभे रहते हैं। लंबे समय तक कहीं जाने की आदत नहीं होती। कभी यात्रा पर यात्रा आमंत्रित करती रहती है। नए पुराने शहरों में, बीते हुए रिश्तों और नए चेहरों की आमद में हम कहीं पीछे छूट गए होते हैं मगर खुद को वर्तमान तक खींचने की जुगत लगाते रहते हैं। कॉफी हाउस, मॉल्स, बड़े शोरूम्स के आगे के अविराम चलते बरामदे। देखे भाले रेलवे स्टेशन, मेट्रो, बसें, कैब्स। सब कुछ मिलकर किसी नयी सर्जना की भूमि तो बनाते हैं लेकिन सर्जक जीवन के इस कारवां में कहीं थककर बैठ चुका होता है। बारिश किस तरह गिरती है, ये लिखने वाला मन गायब रहता है।

बस इसी तरह शायद सबका जीवन चलता होगा।

कुछ एक किताबें पास में हैं। मैं रोज़ दो सौ पन्ने की औसत गति से उनका पठन करता हूँ। किसी एक सिटिंग में साठ-सत्तर पन्ने पढ़ते हुए अकसर कुछ एक पैरा, कुछ एक पंक्तियां लौटकर पुनः पढ़नी पड़ती है। मुझे याद है कि मेरा पढ़ना कभी तेज़ कदम रहा ही नहीं। मैं तीन सौ पन्ने पढ़कर थक जाता था। कुछ रोज़ पहले रेल यात्रा में एक उपन्यास को बाड़मेर से रेक के छूटते ही निकाला था। वे डेढ़ सौ पन्ने पढ़ने में मुझे ढाई- तीन घंटे लगे। उपन्यास का प्रवाह तो अद्भुत था ही शब्दों का आकार भी बड़ा था। कितना के पूरा होते ही ख़याल आया कि ये शायद बीस एक हज़ार शब्द रहे होंगे। मेरे एक सहयात्री ने दूजे से कहा- इनकी किताब पूरी होने वाली है। इसके बाद शायिका को खोलते हैं। मुझे ख़ुशी हुई कि पढ़ते हुए व्यक्ति को लोग परेशान नहीं करने का मन रखते हैं।

कल एक छूटी हुई किताब हाथ लगी। दो एक महीने पहले उसके आठ नौ पन्ने पढ़े थे। वो किताब इस तरह छूट गयी जैसे अजाने जीवन का कोई काम छूट जाता है। एक लघु उपन्यास है। सादा लिफ़ाफ़ा। इसके लेखक हैं, मोती नन्दी। मोती बाँग्ला का उच्चारण है। हिंदी में उनको मति नंदी लिखा गया है।

प्रियव्रत का जीवन एक छद्म आवरण में गुज़र रहा है। वह असल पहचान को छुपाये हुए जीता है। जीवन के छब्बीस बरस। प्रियव्रत ने मज़बूरी में एक छद्म नाम से नौकरी हासिल की थी। नौकरी दिलाने वाला छब्बीस सालों तक भयादोहन करता है। एक रोज़ प्रियव्रत का बचपन के दोस्त की बेटी निरुपमा से मिलना होता है। नीरू छद्म आवरण पर तेजाब की तरह गिरती है। कहानी पढ़ते हुए, कोलकाता का शहरी ढब, ट्रामें, सस्ते जीवन, गिरते मूल्य और परपीड़ा से बेखबर उदास जीवन सामने से गुज़रता रहता है। मैं इस उपन्यास को सुबह और शाम दो बैठक में पूरा करता हूँ। मैं कुछ एक कहानियां और उपन्यास पहले पन्ने से आगे नहीं पढ़ पाता हूं। लेकिन सादा लिफ़ाफ़ा की अद्भुत शैली और कथानक का प्रवाह मुझे परमानन्द तो नहीं मगर आनंद की ओर ले जाता है।

तुम्हें मालूम है एक रोज़ छद्म आवरण में ढका हुआ सब कुछ बाहर की दुनिया के सामने आ जाता है।

अभी मैंने अपनी किताबों के बीच से लेव टॉलस्टॉय की लंबी कहानी खोज निकली है। सुखी दम्पत्ति। मुझे इस कहानी की याद कुछ रोज़ से थी। सर्गेई, मरिया और कात्या याद थे। मालूम है इस कहानी में पात्रों के आचरण और कथन के बीच के बारीक परदे, हलकी स्याही और नमक सी गलन रुक रुक कर पढ़ने पर मजबूर करती है। हम बार-बार किन्ही कहानियों को क्यों पढ़ते हैं? मुझे नहीं मालूम मगर मैं नयी कहानियां भी खूब पढता हूँ। पिछले दिनों नरेश सक्सेना और उपासना झा की कुछ कहानियां पढ़ीं। कुछ एक कहानियां सुखी करती हैं। उनके भीतर रचे बिछोह में गहरा जीवन होता है।

"तुम खेलना चाहते हो, बेशक खेलो। लेकिन मेरे साथ मत खेलो। मैं यहाँ किसी और वजह से हूँ।" सुखी दाम्पत्य। टॉलस्टॉय।

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Published on August 11, 2016 02:08
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Kishore Chaudhary
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