दो झपकी के ख़याल में

शाम जाने कैसी बीते? हो सकता है सात बजे तक आने वाले धुंधलके के बाद गरमी छंट जाये. हलकी ठंडी हवा चलने लगे. गरम दिन में यही एक ख़याल ऐसा था, जिसके भरोसे मैंने तत्काल में रिजर्वेशन लिया और स्लिपर कोच में चढ़ गया. पिछले दस एक रोज़ से वायरल बुखार था. आधी रात या भरी दोपहर में बुखार अचानक से आता. बदन तपने लगता और फिर नीम बेहोशी छाने लगती. दवा लो तो कुछ देर बाद पसीना होता और भीग कर मैं जाग जाता था. ऐसे में लगता नहीं था कि जयपुर की यात्रा कर सकूंगा. इसलिए पहले टिकट न ली. क्या कभी हम इस तरह कुछ स्थगित कर सकते हैं? 
शिथिल मन और थकन से भरा बदन कहता है- जाने दो. जो जिस तरह बीतता है बीते. निश्चेष्ट पड़े रहो. जैसे भोर के बाद बड़े वाला उल्लू पड़ा होता है. उसे कुछ दीखता नहीं है. वह उड़कर सुरक्षित जगह नहीं जा सकता है. मगर ऐसा भी नहीं है कि वह जीना नहीं चाहता है. रौशनी ने उससे रास्ता छीन लिया है. इसी तरह बुखार में हम करना बहुत कुछ चाहते हैं. लेकिन ये करना सम्भव नहीं होता. इसलिए उसी उल्लू की तरह रौशनी के अँधेरे में ठोकरे खाते हुए अपने अनुकूल समय की प्रतीक्षा करते हैं. 
शाम को चलने वाली रेल से उतनी उम्मीद ही की जा सकती है, जितना किसी के वादे पर भरोसा करना. 
मैं अपने आस-पास बैठे लोगों से परिचय नहीं करता हूँ. मैं उनके यात्रा प्रयोजन से अनभिग्य ही रहना चाहता हूँ. मैं चाहता हूँ कि कुछ छूटे हुए ब्लॉग पढ़ लूं. मगर रेल के शोर खिडकियों से आती धूल, यात्रियों की ऊँची आवाज़, चाय वालों का आना जाना, मुझे ब्लॉग पढने नहीं देता. मैं फेसबुक देखता रहता हूँ. एक पोस्ट, एक तस्वीर एक कोई अजनबी चेहरा. 
जैसे रेल आगे बढती जाती है. यात्री आपसी सम्बन्ध में बंधने लगते हैं. वे चेहरों और हावभाव से पहचान गढ़ते हैं. वे अजनबियत को खोने लगते हैं. उनमें एक भाव जागता है कि हम साथ सफ़र कर रहे हैं, साथी हैं. आहिस्ता से सब सामान्य होने लगता है. बदन की अकड़, सख्त ठहरी हुई ऑंखें, सीधे रखे हुए पाँव. अक्सर दो तीन घंटे के सफ़र में यात्री एक दूजे के इस तरह से अपने हो जाते हैं कि सामान की हिफाज़त के लिए कह कर रेल कोच से बाहर चले जाते हैं. 
ज़िन्दगी भी ऐसी ही नहीं? पहली मुलाकात में सख्त, अकड़ी और चुप. बाद में आहिस्ता से वह हमारे कन्धों पर सवार हो जाती है. हम जीने की जगह जीने का बोझ ढ़ोने लगते हैं. हर समय इसी हिफाज़त में लग जाते हैं कि जिंदगी को कुछ हो न जाए. इसलिए खिड़की से बाहर की दुनिया में झांकते हुए जिस तरह सामान पर नज़र रखते हैं, वैसे ही ज़िन्दगी के साथ पेश आते हैं. एक ऐसा सामान जो खो ही जाना है, उसी की हिफाज़त में जीते जाना. 
मेरे कूपे के सब यात्री गांधीनगर स्टेशन पर उतरने वाले हैं. 
रात ठंडी हो जाती है. मौसम में लू की हलकी सी चुभन बाकी रह जाती है. एक बेडशीट बिछाए हुए करवटें लेते जाना और सोचना कि महीनों बाद घर जाने पर साफ़ सफाई में पूरा दिन ही गुज़र जायेगा. शायद इसीलिए कई बार कुछ रिश्ते लौटने से डरते हैं. कहाँ से बुहारेगे, कहाँ से फटकेंगे, किस तरह बारीक गर्द को धोयेंगे. 
जिस तरह छूटा हुआ घर पूरी तरह कभी खत्म नहीं होता. वैसे ही न लौटने पर भी रिश्ते तो रहते ही हैं.  
एक छोटा सा ख्वाब अचानक टूटता है. रेलगाड़ी चलकर रुक गयी है. मैं फिर से करवट लेता हूँ, दिन के उजाले में फंसे उल्लू की तरह. कि जहाँ, जब जाना होगा, जाएगी ज़िन्दगी. चुप लेटे रहो. रात के खत्म होने तक दो झपकी ले लो.* * *
[Painting courtesy ; Natalie Graham]
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Published on April 20, 2017 10:54
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Kishore Chaudhary
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