जोगी ही बन जाएँ मगर

अंगुली की मुद्रिका, कानों के कर्णफूल, गले का हार, जेब में रखा बटुआ और साथ चलने वाला हमें अत्यधिक प्रिय ही रहते हैं।
हम ही उनको चुनते हैं। अनेक बार नई मुद्रिका की ओर हमारा ध्यान जाता है। उसे दूसरी अंगुलियां बार-बार स्पर्श करके देखती है। गले मे बंधे हार का आभास होता रहता है। जेब को नया बटुआ अपने होने का संदेश देता रहता है। नए साथी की ओर बारम्बार हमारा ध्यान जाता है। उसके पास होने भर से सिहरन, लज्जा, मादकता जैसी अनुभूतियाँ हमारे भीतर अग्निशिखा की तरह लहराती रहती है।
समय के अल्पांश में मुद्रिका, कर्णफूल, हार और साथी हमारा हिस्सा हो जाते हैं। हम इस तरह उनके अभ्यस्त हो जाते हैं कि उनका होना ही भूल जाते हैं। कभी सहसा चौंकते हैं कि मुद्रिका है या नहीं। गले को स्पर्श कर पता करते हैं कि हार वहीं है न। कर्णफूल को स्पर्श कर आराम में आते हैं। साथी को असमय अपने पास न पाकर विचलित हो जाते हैं। भय के छोटे-छोटे टुकड़े हमें छूते हैं और सिहरन भर कर चले जाते हैं।

एक दिवस। मुद्रिका की याद नहीं रहती। कर्णफूल, हार और वह सब जिसे हमने चुना था। उसके होने की अनुभूति मिट जाती है। जेब में पड़ा बटुआ चुभना बंद हो जाता है। पास में बैठे साथी को सोचने पर भी कुछ नहीं होता। उसके छू लेने पर भी वह स्पर्श जो हमें ज्वाला की तरह नृत्य में धकेल सके, गायब रहता है। सब कुछ का होना, न होने जैसा हो जाता है।
हमें आभास ही नहीं होता कि मुद्रिका पहनी है। कर्णफूल सजे हैं। हार दमक रहा है। बटुआ भरा-भरा जेब में रखा है। वो यहीं है, मेरे पास।
मुद्रिका, कर्णफूल, हार और बटुआ हमारे जीवन को आसान करने वाली वस्तुएं हैं। ये जीवन व्यापार में एक प्रकार का बीमा है। कहीं किसी कठिनाई में काम आती हैं। हमारा साथी जब साथ होता है तब एक आश्वस्ति साथ चलती है। हमारे पास मन बांटने को एक ठीया होता है लेकिन फिर किस प्रकार ऐसा हो जाता है कि इन अनमोल वस्तुओं और सम्बन्ध को हमारी चेतना इस प्रकार अंगीकार करती है कि उनका होना ही बिसरा देती है।
इनका होना कितना महत्वपूर्ण है। ये कोई भी समझ सकता है। किंतु प्रभायुक्त मुद्रिका, सौंदर्यवान कर्णफूल, अनमोल हार, धन से भरा बटुआ और योग्य साथी पर अक्सर चोर दृष्टि पड़ती ही है। हर कोई इन सबको पाना ही चाहता है। इनके पीछे कितने लोग लगे हैं, ये हम कभी जान नहीं पाते हैं। इनको बचाने के लिए हम अपना क्या गंवा सकते हैं, सोचना कठिन है।
इब्ने इंशा साहब कहते हैं कूचे को तेरे छोड़कर जोगी बन जाएँ मगर तो क्या साधु बन जाएं। त्याग दें कीमती, सुंदर वस्तएं। त्याग दें सुंदर योग्य साथी। या हठी होकर इन सबकी सुरक्षा के लिए रात और दिन अर्पित कर दें?
जीवन हर हाल में कठिन ही नहीं दुश्वार भी है। * * *
इक गांठ समझ नहीं आती कि आगे और दिखने लगती हैं। चीयर्स।
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Published on October 24, 2017 08:00
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Kishore Chaudhary
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