बेपरवाह जीना



दालान और मुंडेरों पर परिंदों के कुछ पंख गिरे रहते हैं. जैसे वे छोड़ गए हों अपने होने की चिट्ठी. लेकिन तुम सबसे अच्छे निकले कि जाते-जाते सब रिश्ते भी बुहार ले गए.

जाने से पहले कुछ देर तक 
तुम रुके होवोगे खिड़की के पास.

ऐसा लगता है.
* * *

शाखों से बिछड़े पत्ते
हो सकता है
मिट्टी के दीवाने हों।
* * *


रेखाएं जब मिटी तो कुछ नई बन गई
रंग कितने भी उतरे कुछ नए आ ही गए।
* * *

बंद खिड़कियों की कतार में आखिरी खिड़की खुली रहती है। जब भी इन खिड़कियों के पास से निकलता हूँ तो कबाड़ की तरह पड़ा एक चरखा दिखाई देता है। मैं सोचता हूँ कि शायद और भी चरखे होंगे। चरखे अनुपयोगी और उदासीन पड़े हैं। एक रोज़ इसी तरह हर कोई चलन से बाहर हो जाता है। लेकिन जीवन रास्ता तलाश लेता है कि भवन की छत की मुंडेर से एक पौधा उग आता है।
जीवन कितना अद्भुत है कि कभी लाख जतन किये फलता नहीं और कभी बेपरवाह खिलता जाता है। बगीचे सूख जाते हैं, जंगल अपनी मौज में बढ़ता है।

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Published on October 26, 2017 03:20
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Kishore Chaudhary
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