क्या सचमुच !

ख़यालों के टूटते ही, किसी काम के ख़त्म होते ही, मैं जहाँ होता हूँ वहाँ से बाहर जाना चाहता हूँ. अभी वर्डपैड को खोलते ही लगा कि एक बार बाहर चला जाऊं. मैंने चारपाई के नीचे देखा. वहाँ मेरे जूते नहीं थे. मैं अपने जूते थोड़ी देर पहले फर्स्ट फ्लोर पर रख आया था. वहाँ से पतले गुलाबी चप्पल पहन कर चला आया. चारपाई के पास वे ही रखे हैं. क्या मैं इनको पहन कर बाहर नहीं जा सकता? देखता हूँ कि एक चप्पल में टूटन है. वह अंगूठे के नीचे की जगह से चटक गया है. चप्पल को देखने से बाहर आते ही मुझे लगता है कि कहीं बाहर चले जाना चाहिए. 
मेरे भीतर से कोई मुझे उकसाता है. मेरे ही भीतर से कोई मुझे लिए बैठा रहता है. 
कहाँ जाऊँगा? 
पलंग से चार हाथ की दूरी पर रखे फ़ोन से बीप की आवाज़ आई. मैंने समझा कि संदेशा आया है. उसमें लिखा है 'हाई'. पता नहीं लिखा क्या है पर मैंने यही सोचा. मैं फ़ोन तक नहीं जाना चाहता. मेरी हिम्मत नहीं है. अब से थोड़ी देर बाद फिर बीप की आवाज़ आएगी. शायद लिखा होगा 'बिजी?" मैं क्या सचमुच बिजी हूँ? शायद बहुत ज़्यादा. मेरा मन गुंजलक है. मेरे पास जवाब खत्म हो गए हैं. मैं केवल इस जगह से या जहाँ भी रहूँ वहाँ से कही बाहर चले जाना चाहता हूँ. 
मैं फ़ोन को देखता हूँ. एक छोटी संकेतक बत्ती चमक रही है. मैं उसे देखता रहता हूँ. उसके फिर से चमकने का इंतज़ार करने लगता हूँ. बत्ती काफी देर से चमकती है. उसके चमकते ही लगता है कि इंतज़ार पूरा हुआ. फिर से याद आता है कि मैं यहाँ से बाहर जाना चाहता हूँ. 
मैं अपनी गरदन को एक झटके से बाईं तरफ करता हूँ. एक साथ चार-पाँच कट-कट की आवाज़ आती है. मेरी गरदन अकड़ गयी थी. मैं क्या देख रहा था? मैं दफ़्तर के स्टूडियो में इन दिनों बार-बार बुलाया गया. वहां सीलन नहीं थी. गर्माहट थी. मशीनों की गर्माहट. बाहर की ठंडी हवा से ये जगह अच्छी थी. कुछ लोग काम कर रहे थे. मुझे केवल इतना भर बताना था कि काम बन गया या नहीं? 
वे लोग काम कर रहे थे. मैं उनको देखते हुए सोच रहा था कि क्या सचमुच कोई काम कभी बन जाता है? जैसे अगर मैं किसी से मिलना चाहता हूँ. मैं उससे मिल लूँगा. ये एक काम है. ये एक काम मिल लेने पर बन गया है. क्या सचमुच ऐसा कह सकूँगा? नहीं. पक्का नहीं. वह जो मिल लेना होगा, वह और अधिक अधूरा कर देगा. वह काम और अधिक बाकी हो जायेगा. इसलिए काम बन जाना एक भ्रम है. वह असल में काम का और ख़राब हो जाना है. 
मैं ये सब और नहीं लिखना चाहता. मैं यहाँ से बाहर जाना चाहता हूँ. मैं कहता हूँ कि मेरा फ़ोन ऑटो आंसर मोड़ पर आ जाये. वह सबको जवाब देने लगे कि सर्दी इतनी ज़्यादा है और लिहाफों की छुअन के सम्मोहन खो गए हैं.  
हम क्यों किसी के प्यार में नहीं पड़ जाते. इतने सारे तो लोग हैं? 
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Published on December 14, 2017 07:09
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Kishore Chaudhary
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