उस ओट में
बाहर तेज़ हवा चलने लगी. कूलर के पंखे से उदास आवाज़ आने लगी. जैसे एक अविराम रुदन. कूलर के पंखे की आवाज़ में घुला हुआ.
आवाज़ें मुसाफिर होती हैं. वे अपने रास्ते चलती रहती हैं. मन जब खाली होता है तो उनको अपने पास बुला लेता है. कभी मन के भीतर की उदासी बड़ी उदासी की ओर खिंचने लगती हैं. कभी हम मुस्कराने लगते हैं. मुस्कान की एक हल्की सी छवि बनती है और ठहर जाती है. उस पल लगता है जीवन में बोझ ही नहीं है. हम ख़ुद को नितांत अकेला पाते हैं. अकेला मगर चिंतामुक्त. लेकिन आतिशबाज़ बिस्तर से उठकर बैठ गया.
कूलर से अब भी किसी के रोने की आवाज़ आ रही थी. चप्पल पाँव में डाले और दरवाज़ा खोलकर बाहर गली में देखा. दो घर दूर कुत्ते हूक से हूक मिला रहे थे. दरवाजे की जाली को पकड़े खड़े हुए देखा कि ठीक सामने पहाड़ी की चोटी के बाईं ओर चाँद था. चौथ का चाँद रहा होगा.
अचानक बरसों पुरानी याद आई- "चौथ का चाँद देखना अच्छा नहीं होता."
"हाँ तीज के चाँद पर मोटापा चढ़ आता है न इसलिए"
खिल खिल कर बहती हंसी की स्मृति रेत पर लहरें उकेरने लगीं. कितना प्यार होता है न? उससे नहीं था. उसने कहा था- "तुम मुझसे प्यार नहीं करते." उसको जवाब दिया था- "तुम सब जानती हो" इस पर हाथ में हाथ डाले हुए उसने पूछा- "इस रिश्ते को फिर क्या कहेंगे?"
"पोटाश बम."
बचपन की हंसी अतीत के धूल भरे रास्तों पर दौड़ती हुई आई. हंसी जैसे कोई अंधड़ था. स्याह, धूसर, उजला या फिर हलकी छाँव बुनता हुआ अंधड़.
एक ओट उनको देख रही थी. ओट ने दोनों को अपनी ओर खींच लिया. गरम दोपहर में तपती सड़क पर सूनापन था. उनके बीच की नज़दीकी ने ओट के पीछे से बाहर झाँका. कोई नहीं था. शायद हवा रुक गयी थी. वे पसीने से भीग रहे थे. कपड़ों के भीतर हल्की ठंड उतरने लगी थी. भाप होते पानी की तरह वे अदृश्य हो ही चुके थे कि एक चिड़िया तेज़ी से आई और वे चौंक पड़े. पीछा करती दूजी चिड़िया भी आई. उनके पीछे लू का झोंका भी आया. पसीने से भीगे कपड़ों से ठंड की झुरझुरी उतरी.
"क्या हुआ?""जैसे कोई फूलों के भार से लदी शाख थी और अचानक सब फूल एक साथ झरने लगे.""फिर?""फिर लगा कि गुदगदी हो रही है, कुछ था जो हल्का हो रहा है, बेहद हल्का"
उसने एक नज़र सामने देखा और तेज़ कदम ओट से बाहर हो गयी. जैसे कोई नन्हा परिंदा नई नई उड़ान लेकर हवा की बेढब लहरों पर सवार हुआ हो.
वह ओट से बाहर खड़ा था. गली के मोड़ से पहले खाली पड़े अधूरे घर के पास की सीढियों पर धूल पसरी थी. वह बैठ जाना चाहता था. जैसे कोई बहुत थकान हो गयी है या बहुत सुकून आ गया है. या कुछ भी ऐसा कि वह ठहर जाये. आँखें मूंद ले. वह दोपहर की बदन जलाती हवा के बीच बैठ गया. वह उसके पास रुक जाती तो सुन पाती इस आवाज़ को, देख सकती स्याही से भरे धुएं को, महसूस कर सकती कि कानों में एक छोटा सा सन्नाटा लगातार गूँज रहा है.
उसके जाते हुए तेज़ क़दमों से ज़मीन पर हलकी चाप गूँज रही थी. वह चौंक कर आवाज़ सुन रही थी. वह हैरत से देख रही थी कि ज़मीन धड़क रही है.
उस ओट में पोटाश बम उग आये थे. अब वे उसके चप्पलों के तलवों से चिपके थे और हर कदम पर फूटते जा रहे थे. * * *
पोटाश बम कहानी का एक और टुकड़ा.
LikeComment
आवाज़ें मुसाफिर होती हैं. वे अपने रास्ते चलती रहती हैं. मन जब खाली होता है तो उनको अपने पास बुला लेता है. कभी मन के भीतर की उदासी बड़ी उदासी की ओर खिंचने लगती हैं. कभी हम मुस्कराने लगते हैं. मुस्कान की एक हल्की सी छवि बनती है और ठहर जाती है. उस पल लगता है जीवन में बोझ ही नहीं है. हम ख़ुद को नितांत अकेला पाते हैं. अकेला मगर चिंतामुक्त. लेकिन आतिशबाज़ बिस्तर से उठकर बैठ गया.
कूलर से अब भी किसी के रोने की आवाज़ आ रही थी. चप्पल पाँव में डाले और दरवाज़ा खोलकर बाहर गली में देखा. दो घर दूर कुत्ते हूक से हूक मिला रहे थे. दरवाजे की जाली को पकड़े खड़े हुए देखा कि ठीक सामने पहाड़ी की चोटी के बाईं ओर चाँद था. चौथ का चाँद रहा होगा.
अचानक बरसों पुरानी याद आई- "चौथ का चाँद देखना अच्छा नहीं होता."
"हाँ तीज के चाँद पर मोटापा चढ़ आता है न इसलिए"
खिल खिल कर बहती हंसी की स्मृति रेत पर लहरें उकेरने लगीं. कितना प्यार होता है न? उससे नहीं था. उसने कहा था- "तुम मुझसे प्यार नहीं करते." उसको जवाब दिया था- "तुम सब जानती हो" इस पर हाथ में हाथ डाले हुए उसने पूछा- "इस रिश्ते को फिर क्या कहेंगे?"
"पोटाश बम."
बचपन की हंसी अतीत के धूल भरे रास्तों पर दौड़ती हुई आई. हंसी जैसे कोई अंधड़ था. स्याह, धूसर, उजला या फिर हलकी छाँव बुनता हुआ अंधड़.
एक ओट उनको देख रही थी. ओट ने दोनों को अपनी ओर खींच लिया. गरम दोपहर में तपती सड़क पर सूनापन था. उनके बीच की नज़दीकी ने ओट के पीछे से बाहर झाँका. कोई नहीं था. शायद हवा रुक गयी थी. वे पसीने से भीग रहे थे. कपड़ों के भीतर हल्की ठंड उतरने लगी थी. भाप होते पानी की तरह वे अदृश्य हो ही चुके थे कि एक चिड़िया तेज़ी से आई और वे चौंक पड़े. पीछा करती दूजी चिड़िया भी आई. उनके पीछे लू का झोंका भी आया. पसीने से भीगे कपड़ों से ठंड की झुरझुरी उतरी.
"क्या हुआ?""जैसे कोई फूलों के भार से लदी शाख थी और अचानक सब फूल एक साथ झरने लगे.""फिर?""फिर लगा कि गुदगदी हो रही है, कुछ था जो हल्का हो रहा है, बेहद हल्का"
उसने एक नज़र सामने देखा और तेज़ कदम ओट से बाहर हो गयी. जैसे कोई नन्हा परिंदा नई नई उड़ान लेकर हवा की बेढब लहरों पर सवार हुआ हो.
वह ओट से बाहर खड़ा था. गली के मोड़ से पहले खाली पड़े अधूरे घर के पास की सीढियों पर धूल पसरी थी. वह बैठ जाना चाहता था. जैसे कोई बहुत थकान हो गयी है या बहुत सुकून आ गया है. या कुछ भी ऐसा कि वह ठहर जाये. आँखें मूंद ले. वह दोपहर की बदन जलाती हवा के बीच बैठ गया. वह उसके पास रुक जाती तो सुन पाती इस आवाज़ को, देख सकती स्याही से भरे धुएं को, महसूस कर सकती कि कानों में एक छोटा सा सन्नाटा लगातार गूँज रहा है.
उसके जाते हुए तेज़ क़दमों से ज़मीन पर हलकी चाप गूँज रही थी. वह चौंक कर आवाज़ सुन रही थी. वह हैरत से देख रही थी कि ज़मीन धड़क रही है.
उस ओट में पोटाश बम उग आये थे. अब वे उसके चप्पलों के तलवों से चिपके थे और हर कदम पर फूटते जा रहे थे. * * *
पोटाश बम कहानी का एक और टुकड़ा.
LikeComment
Published on April 28, 2018 01:15
No comments have been added yet.
Kishore Chaudhary's Blog
- Kishore Chaudhary's profile
- 16 followers
Kishore Chaudhary isn't a Goodreads Author
(yet),
but they
do have a blog,
so here are some recent posts imported from
their feed.

