मतलब कभी ढूंडा था मैंने यूहीं कांटों के रसतों पे चलते चलते,
नाक में दम कर रखा था ये दिल जखमों पे नमक मलते मलते,
बोला यूहीं नहीं मिल गया तुझे सुकून उन नटखट रातों की बातों में,
और यूहीं नहीं बच गया था तू उन बातों से भरी मुलाकातों में।
अब इतना ना बौखलाते जा तू भीख के सरहदों पे रेंगते हुए,
इतना भी होता अककड तो घरवालों को … Read the rest
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Published on August 27, 2018 05:26