छत पर बैठी उदास शाम
छत के पास बची होंगीकितने गीतों की कतरनें
कितनी ही रूमान भरी करवटें।
दुछत्ती पर पड़ी रेत सोचती रहती है।
* * *
बाहों में पड़ी बाँहों को
उखड़ी हुई साँसों को
तारों को देखती आँखों को।
कितना भूल पाती होंगी छतें?
छत के कोने में पड़ी रेत ने बहुत बार सोचा।
* * *
क्या कभी गुमसुम हो जाती है
या फिर कभी मुसकुराती है, छत?
रेत का बहुत मन था कि पूछे
मगर वह ठिठक गयी।
जाने छत की खुशी कैसी निकले
जाने उसकी उदासी कैसी हो?
* * *
सर्द मौसम की आती हुई रातों में
गरम दिनों की ढलती हुई सुबहों में
लिहाफ़ों से आती सरगोशी पर
क्या छत ने कभी कान दिये थे?
ये सोचकर सहसा
रेत के कान लाल हो जाते हैं।
* * *
बहुत उदास शाम थी
बहुत देर छत पर बैठी रही।
बहुत उदास छत है, यही सोच कर।
रेत ने सोचा
पक्का यही बात है।
* * *
तन्हा और लंबे सन्नाटे से भरी छतें
आपस में क्या बातें करती होंगी?
यही जानने
रेत कभी इस छत जाती, कभी उस छत।
* * *
कभी किसी शाम
छत पर अनार झड़ने लगते
रेत सोचती रहती
कि आज छत ने क्या सुन लिया है?
* * *
मन छत की तरह चुप, तन्हा और ठहरा रहता है। रेत की तरह बिखरता और सिमटता जाता है। आवाज़ के भंवर पड़ते हैं तो कितनी तस्वीरें बनने लगती हैं। ठंडी हवा से सिहरन होने लगती है, बेचैनी में लरज़िश घुल जाती है और कुछ नहीं।
एक तवील शाम, रुकी हुई रात, न ख़त्म होने वाली दोपहर के सिरों पर रखी, साँसों का इंतज़ार ज़रूर एक खुशी है।
तुम ही छत हो, तुम ही रेत हो। मैं भी।
* * *
Published on March 13, 2020 20:00
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