एक बार मैं प्रेम के बारे में सोचने लगा। कि प्रेम कैसा दिखता होगा। माने शक्ल सूरत नहीं। उसकी उपस्थिति कैसी होगी। सुंदर और प्रिय नहीं वरन वह है ये कैसे कह जा सकता है।
मुझे याद आया कि प्यास की गहराई अद्भुत होती है। वह जब हमको बांहों में भर लेती है तब आसानी से मरने नहीं देती। पहले पहल तलब होती है। उसके बाद बेचैनी। फिर सूखे होंठ कांपने लगते हैं। आवाज़ खो जाती है। इसके बाद नीम बेहोशी आने लगती है। अंततः प्यास जीत जाती है।
ऐसी प्यास को जो बुझा सके, वैसा ही तो दिखता होगा प्रेम। इसलिए मैंने लिखा कि पानी से भरे हुए चड़स जैसा दिखता है प्रेम। हर हिलकोरे के साथ ज़रा सा हिलता हुआ। हर आहट पर चौंकता हुआ।* * *
तस्वीर - कुछ बरस पहले की एक दोपहर - छोटा भाई महेंद्र आराम करते हुये।
Published on April 11, 2020 19:01