असल में तुमसे मैं मिला नहीं हूँ
कितनी सी जगह चाहिए थी तुम्हारे पास
कितना सा प्रेम अपेक्षित था। इतनी बड़ी दुनिया में। * * * तुम कपास के भीगे फाहे से होते अनार की छिछली छांव से होते। दिल नमी की तरह रहता ठंड की तरह रहता। बस तुम होते ज़रा-ज़रा। * * * कभी बेढ़ब नींद आ जाती कभी बेवक़्त जागती आंखें। कभी तुम मुस्कुरातेकभी मैं मुस्कुराता।और ख़ुशी, और ज़िन्दगी किसे कहते हैं।* * * कभी दफ़्तर में उनींदे बैठे हुए कभी बेसबब पैदल चलते हुएमैंने तुमको सोचा है। मगर सबको लगा कि मैं उनींदा हूँ, मैं कहीं जा रहा हूँ। * * * कभी कभी मन पड़ा रहा तुम्हारे बाजुओं के घेरे में।कभी ये दूर से देखता रहा तुमको। तुम मिलोगे तो ये बात बताऊंगा तुमको। * * * तुम मुझे नहीं जानते मैं तुम्हें नहीं जानता।मन पगला ये कब जानता है?* * * असल में तुमसे मैं मिला नहीं हूँ। तुम भी मुझे नहीं जानते हो। ये कोई दो और लोग हैं। वे समझते हैं कि बीज का काम पेड़ होना है, उसी तरह हमारा एक दूजे को चूमना और बाहों में भरे खड़े रहना। बाकी सब फज़ूल है। * * *ओह प्यारे केसी तुम दिन को सोया न करो। शाम बेढ़ब बातों से भर जाती है। बातें बेवजह।
Published on August 29, 2020 02:22
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