मैं रुकती रही हर बार...

रास्ते की धूल
या धूल के रास्ते पर
तुम्हारी अंगुलियों के बीच
अटकी एक उम्मीद
कितनी उम्र पाएगी ?

तुम्हारी शर्ट के
इक कोने मे
दाग की उम्र ना हो उस लम्हे की......
ज़बान पर जीती रहे स्वाद उन होठों का

धूल की बारिशों में
समेट ली है कमीज की बाहें

मैंने छत पर सूखे बाल खोले......
अभी अभी कोई होंठ भिगो गया

उसने कहा कि रुको कहीं बैठ जाते हैं
मैंने कहा ज़रा दूर और
कि काश वो थक जाए और
उसे उठा सकूँ अपनी बाहों में
धूल से भरे रास्ते में ये सबसे अच्छा होता।

मैं रुकती रही हर बार....
हर बार उसका हाथ छू गया .....
मैं दूर हट कर संभलती रही.....
वो पास आता मचलता रहा.

एक साया है ज़िंदगी. थामा नहीं जाता मगर साथ चले. संजोया न जा सके किन्तु खोए भी नहीं. जैसे दीवार से आती कोई खुशबू, सड़क के भीतर सुनाई पड़ती है कोई धड़क, आसमान में अचानक कोई मचल दिखाई देती हो. ऐसे ही सब कुछ सत्य से परे इसलिए है कि हमारा जाना हुआ सत्य बहुत अल्प है. ऐसे ही बचे हुए शब्द उतने ही हैं जितने हमें बरते थे.
 

[Painting Image Courtesy : Jim Oberst]


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Published on September 15, 2014 19:37
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Kishore Chaudhary
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