सब गारत हों

कविता एक उपकरण है, दिशासूचक यन्त्र है, एक चिकित्सा है, मगर सबसे बढ़कर कविता जिजीविषा है. कुछ बेवजह की बातें ताकि जीए जाएँ.

न सोया न जागा
न बैठा न ठहरा
मिट्टी की मूरत सा मन
सदा तन्हा सदा इकहरा
कभी सिरहाने
तो कभी सुदूर तारों पर
कभी पैताने
कूदता फिरता बावरा सा मन।

कई बार जागता
अनगिनत शीशों के घर में
और औचक खो जाता है इस डर में
कि अब तक
निकल गयी होगी दुनिया, जाने कितनी दूर
दूर बहुत दूर।

मगर सांझ पड़े उसी काम पर मन
वही तारे, वही समंदर, वही रेत का बिछावन।

अनमना बावरा ये अजाना मन।
* * *

सुख मुसाफ़िर की दीवड़ी का पानी था
उड़ता ही गया
दुःख मोजड़ी में लगे कांटे थे चुभते ही रहे.
* * *

आखिर हम ठुकरा दें
अपनी ही समझाइश
लौट आयें खुद के पास।

चाँद की पतली फांक को देखते हुए
खोज लें एक तारा सर के ठीक ऊपर।

कोई आवाज़
गुज़रे छूकर
नसीहतें, तकरीरें, सलाहें
सब गारत हों।

मेरी जाँ हर तरफ आये
आये किसी बेड़ी के टूटने की आवाज़ आये।
* * *
[Painting Moon Kiss courtesy ; Nick Fedaeff]

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Published on September 27, 2014 20:50
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Kishore Chaudhary
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