जाने कहाँ खिले थे, ईमान के फूल।
हमारा प्रेम तो बेगैरत था
एक कंधा, एक सहारा और एक प्याला
जहाँ मिला, वहीँ बस गया।
अब इस दिल को क्या कहिये?
* * *
कुछ घर जाए, कुछ पराये रिश्ते पिरोये
कई टुकड़े किये दिन के
तब जाकर कहीं बचे रहे ज़िन्दा हर शाम।
कई सारी चीज़ें खड़ी की शाम के दरम्यान।
वरना
पगला जाते देखकर अवसान
जैसे बिना आरती वाले
सूने मंदिर में उतरता है भय।
बदहवास हो जाते सोचकर
ज़िन्दगी की थैली में सुराख़ है
रोज़ टपक जाता है एक दिन।
इसलिए कई जंजाल बना कर
खुद को बचाया आदमी ने, एक जंजाल से।
मेरे पास कोई ठोस वजह नहीं
ये सब लिखने की
मेरे पास सबकुछ तरल है
ह्रदय, अश्रु, जिज्ञासा, स्मृति
और ड्राई डे के दिन बची हुई दो प्याला व्हिस्की।
और शाम बीत रही है राज़ी ख़ुशी।
* * *
चुभ ही जाता है काँटा कोई न कोई
ज़िन्दगी बे काम कभी नहीं रहती।
* * *
[Painting Courtesy; Frank Boyle]
Published on October 02, 2014 18:53