तनहा पड़ी, बरबाद हुई चीज़ें
उजड़े घर के पास से गुज़रते हुए एक सिहरन सी होती थी. कोई जादू का घेरा था, कोई सम्मोहक छाया थी, दिल धड़क के रह जाता था. दूर निकल आने पर अक्सर देखा करता था उसे मुड़कर.
कौन फूंकता है मंतर उनके अंदर से
किसकी परछाइयाँ बुलाती रहती हैं.
आह! ये तनहा पड़ी, बरबाद हुई चीज़ें.
* * *
शीशे के पार पानी हो तो चेहरा साफ़ देखा जा सकता है वरना सब फ़ैल जाता है दूर दूर तक
कभी अगर बाद बरसों के
तुम पढो अपने इस लम्हे के बारे में
तो पढ़कर चौंक उठोगे।
इतिहास में दर्ज़ तुम को पढ़कर
संभव है तुम्हारा विश्वास उठ जाये
दुनिया भी लग सकती है ना काबिल ए यक़ीन।
इसलिए कि जो हम कर रहे हैं
उसे ठीक वैसा ही दर्ज़ नहीं कर रहा इतिहास।
जो लोग खेल रहे थे दिलों से
वे बाद सदियों के तवारीख़ के पन्नों में
वे पाए गए मामूली जगलर।
उनके हाथों में जो नाज़ुक चीज़ें थीं
उन्हें देखकर असल में कुछ कमजोर लोगों को
हुआ था धोखा कि वे दिल से खेलते होंगे।
सब जानते हैं
दिल से असल में कोई खेल ही नहीं सकता है
दिल पर किसी का काबू ही नहीं
इसलिए हमारा अपना दिल ही खेलता है हमारे साथ।
दिल से किसी तानाशाह और शैतान ने
कभी नहीं चली कोई चाल
कि उनके कठोर दिल पर
कोमल नाज़ुक दिली रेशों की
रफ़ुगिरी के वाकये बेहिसाब मौजूद हैं।
इतिहास पर शक मत करना
कि इस वक़्त तुम सोच रहे हो मुझे
जबकि इतिहास में लिखा जाएगा
एक बेढब बात कहते हुए मैं सिर्फ तुम्ही को सोच रहा था।
सिर्फ तुम्ही को सोच रहा था
दिल की बात जाने कहाँ से कैसे चली आई बीच में।
* * *
वो हम जिससे मिले थे वो उससे मिलना न था , मुलाकातों के ब्योरे अलग अलग हैं
कभी हम मिलें अचानक
तब हमारे बीच से गुज़र चुकी हों
इंतज़ार और ख़यालों में बीती अनेक शामें।
हम क्या वैसे ही भर लेंगे एक दूजे को बाँहों में
जैसी कभी कभी चाहना हुआ करती थी
कई बार हमने लिखी अर्ज़ियाँ कि ऐसा हो पाए।
क्या हम खड़े रहेंगे एक निश्चित दूरी पर
जैसे जानते तो हों मगर मरासिम कुछ न हो
एक ज़रा सी दूरी भी न कर पायें तय।
जिन दिनों अपने प्रिय पत्थरों
फूलों, रास्तों, चिड़ियों, टूटते हुए पत्तों से पूछा था
कि अगर ऐसा हुआ तो क्या वैसा होगा।
और कभी अचानक हम मिलें
पाएं कि स्मृति में बड़ा किया था जिन अहसासों को
असल में वे गुज़र चुके वक़्त की स्मृति भर ही रहे।
सोचो ये हादसा कितना बड़ा ठहरे
किसी के जाने के जिस दुःख को हम असहनीय समझते हैं
उसकी जगह हमारे सामने खड़ा हो हमारा ही कोई अजनबी की तरह।
मोहब्बत कुर्बान है सबकुछ तुम्हारे आगे
इसके सिवा कुछ पक्का नहीं तुम्हारे बारे में
कि तुम्हारे बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।
* * *
दोपहर की धूप भरने लगी है एक ठन्डे उजास से। बेरियाँ लद रही हैं कच्चे हरे बेर से। रेगिस्तान पर उतरने को हैं विलायती परिंदे। विषधर और शोर मचाने वाले छोटे जीवों ने कर ली है तैयारी बिलों में दुबक जाने की। निर्बाध प्रेम के लिए यही बेहतर मौसम है।
* * *
ये वाटरकलर पेंटिंग सिंध सूबे के मशहूर कलाकार अली अब्बास साहब की है.
कौन फूंकता है मंतर उनके अंदर से
किसकी परछाइयाँ बुलाती रहती हैं.
आह! ये तनहा पड़ी, बरबाद हुई चीज़ें.
* * *
शीशे के पार पानी हो तो चेहरा साफ़ देखा जा सकता है वरना सब फ़ैल जाता है दूर दूर तक
कभी अगर बाद बरसों के
तुम पढो अपने इस लम्हे के बारे में
तो पढ़कर चौंक उठोगे।
इतिहास में दर्ज़ तुम को पढ़कर
संभव है तुम्हारा विश्वास उठ जाये
दुनिया भी लग सकती है ना काबिल ए यक़ीन।
इसलिए कि जो हम कर रहे हैं
उसे ठीक वैसा ही दर्ज़ नहीं कर रहा इतिहास।
जो लोग खेल रहे थे दिलों से
वे बाद सदियों के तवारीख़ के पन्नों में
वे पाए गए मामूली जगलर।
उनके हाथों में जो नाज़ुक चीज़ें थीं
उन्हें देखकर असल में कुछ कमजोर लोगों को
हुआ था धोखा कि वे दिल से खेलते होंगे।
सब जानते हैं
दिल से असल में कोई खेल ही नहीं सकता है
दिल पर किसी का काबू ही नहीं
इसलिए हमारा अपना दिल ही खेलता है हमारे साथ।
दिल से किसी तानाशाह और शैतान ने
कभी नहीं चली कोई चाल
कि उनके कठोर दिल पर
कोमल नाज़ुक दिली रेशों की
रफ़ुगिरी के वाकये बेहिसाब मौजूद हैं।
इतिहास पर शक मत करना
कि इस वक़्त तुम सोच रहे हो मुझे
जबकि इतिहास में लिखा जाएगा
एक बेढब बात कहते हुए मैं सिर्फ तुम्ही को सोच रहा था।
सिर्फ तुम्ही को सोच रहा था
दिल की बात जाने कहाँ से कैसे चली आई बीच में।
* * *
वो हम जिससे मिले थे वो उससे मिलना न था , मुलाकातों के ब्योरे अलग अलग हैं
कभी हम मिलें अचानक
तब हमारे बीच से गुज़र चुकी हों
इंतज़ार और ख़यालों में बीती अनेक शामें।
हम क्या वैसे ही भर लेंगे एक दूजे को बाँहों में
जैसी कभी कभी चाहना हुआ करती थी
कई बार हमने लिखी अर्ज़ियाँ कि ऐसा हो पाए।
क्या हम खड़े रहेंगे एक निश्चित दूरी पर
जैसे जानते तो हों मगर मरासिम कुछ न हो
एक ज़रा सी दूरी भी न कर पायें तय।
जिन दिनों अपने प्रिय पत्थरों
फूलों, रास्तों, चिड़ियों, टूटते हुए पत्तों से पूछा था
कि अगर ऐसा हुआ तो क्या वैसा होगा।
और कभी अचानक हम मिलें
पाएं कि स्मृति में बड़ा किया था जिन अहसासों को
असल में वे गुज़र चुके वक़्त की स्मृति भर ही रहे।
सोचो ये हादसा कितना बड़ा ठहरे
किसी के जाने के जिस दुःख को हम असहनीय समझते हैं
उसकी जगह हमारे सामने खड़ा हो हमारा ही कोई अजनबी की तरह।
मोहब्बत कुर्बान है सबकुछ तुम्हारे आगे
इसके सिवा कुछ पक्का नहीं तुम्हारे बारे में
कि तुम्हारे बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।
* * *
दोपहर की धूप भरने लगी है एक ठन्डे उजास से। बेरियाँ लद रही हैं कच्चे हरे बेर से। रेगिस्तान पर उतरने को हैं विलायती परिंदे। विषधर और शोर मचाने वाले छोटे जीवों ने कर ली है तैयारी बिलों में दुबक जाने की। निर्बाध प्रेम के लिए यही बेहतर मौसम है।
* * *
ये वाटरकलर पेंटिंग सिंध सूबे के मशहूर कलाकार अली अब्बास साहब की है.
Published on October 28, 2014 21:20
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