कि कुछ नहीं था, न कुछ रहेगा.
उस वक़्त परछाइयाँ ज्यादा लम्बी न थी. शाम मगर एक बेहद खूबसूरत रंग में सड़कों, दरख्तों, मकानों की छतों पर उतर आई थी. इस्कॉन मंदिर से हरे रामा हरे कृष्णा के स्वर बिखरते हुए दूर दूर तक फ़ैल रहे थे. धनाढ्य भक्तों की महंगी कारों का आना अभी शुरू न हुआ था. घर की बालकनी तक आते कृष्णा-कृष्णा, रामा-रामा के सुरीले लयबद्ध पाठ को सुनते हुए मुझे लगा कि वे अभी आ जायेंगे. नयेपन की आभा से भरे हुए. सुगन्धित वस्त्र पहने हुए उन देसी गोरे लोगों की आँखों में चमक भर आएगी. वे कार के डैशबोर्ड पर रखे पीले और गुलाबी फूलों की मादक गंध के ऊपर से शीशे के पार खड़े देव को हाथ जोड़कर ध्यानमग्न हो जायेंगे. छठे छठे माले के घर की बालकनी को लोहे के जाल से ढका हुआ है. उसी जाली को थामे हुए अंगुलियाँ चुप उलझी रहती हैं. हरे रामा हरे कृष्णा हवा के झोंकों के साथ कहीं उड़ जाते हैं. स्मृति में कुमार गंधर्व की आवाज़ में नियत अंतराल पर प्रवाहपूर्ण किन्तु साधना की उच्चतम स्थिरता से भरे सुर छूकर गुज़रते हैं. उड़ जायेगा हंस अकेला, जगदर्शन का मेला...
देखो केसी!
वह क्या रंग है? ये इतना सुन्दर कोलाज किसने रचा है? ख़यालों के बेतरतीब सिलसिले में लम्बी सड़क से होता हुआ कोई दाखिल हो जाता है. शाम है. इन छुट्टियों की आखिरी सुकून वाली शाम. बालकनी में बेमक़सद खड़े हुए सड़क के किनारों पर अविचल खड़े दरख्तों की तस्वीर जहाँ तक देखी जा सके वहां तक देखते हुए. सड़क पर एक धुंधला सा रंग करीब आता जाता है. धुंधलेपन से पहले स्याह रंग दिखाई पड़ता है फिर करीब आने पर चमकता हुआ सलेटी रंग. दोनों रंगों का मेल कितना सम्मोहक है. सम्मोहक होने से आगे जादुई होने तक जाता हुआ. काला और सलेटी.
दो किताबें बालकनी के कोने में स्टूल पर पड़ी हुईं. मोपासा का फ़्रांस. घास, नदी का किनारा, टूटी छत वाली बिसरा दी गयी झोंपड़ी, परिंदे, नाव, मछलियाँ, चुप्पी और एक बारूद से भरी बन्दूक. ये सब मेरे पास बैठे हुए, उस रंगों के कोलाज को देखते रहते हैं. मैं पूछता हूँ- ये काले और सलेटी रंग का कोलाज जो इधर बढ़ा आ रहा है अगर कोई परिंदा होता तो क्या तुम मार गिराते? बन्दूक क्या तुम्हारी नाल इतनी ही सीधी रहती. अँगुलियों क्या तुम दबा देती ट्रिगर? आह जिस जादू का अभी आग़ाज़ हुआ है, क्या वह यहीं खत्म हो सकता था?
अचानक मन पर उदासी आती है. क्या-क्या न हुआ खत्म.
सड़क के बाएं छोर पर दुकानों की लम्बी कतार है. ऐसी दुकानें जो अब तक कभी खुली ही नहीं. जो भविष्य में खोली जाएगी. जिन पर दुकानदार होंगे, ग्राहक होंगे और सौदे होंगे. अभी वहां धूल बुहार कर एक लड़का पानी छिड़क गया है. नए ज़माने के सबसे बड़े मुनाफे वाले ज़मीनों के कारोबार के सौदागर शाम भर कुर्सियां लगाये बैठे रहेंगे और फिर अपनी बड़ी कारों में सड़क पार चले जायेंगे. उन्हीं खाली पड़ी कुर्सियों से पहले एक कच्चा सा पेड़ है. उतना ही ऊँचा जितना कि पानीपूरी बेचने वाले का ठेला. एक दिन जब ये बहुत बड़ा हो जायेगा तब इस पेड़ के नीचे अनेक चीज़ें समा जाएगी. जैसे उम्र बढ़ने के साथ दुखों को सहने की, उन्हें अपने पास बसाये रखने की जगह बढती जाती है.
मन न रफूगर हुआ, न कबाड़ी. जो ख़राब हुआ, जो नाकाम हुआ, जो बोझ हुआ उसे उसी हाल में रहने दिया. न ठीक किया न बीना. मालूम हुआ कि अभी जो मंज़र है, ये अगले पल न होगा. तो क्या करेंगे इसे यहीं रोक कर. जाने दो. इसी सोच में जब मन उकताया तो उसे कहा- उकताए रहो. जब ख़राब हुआ तो कहा- ख़राब रहो. मन टूट गया तो कहा- पड़े रहो टूटे हुए मिट्टी के बर्तन की तरह और एक दिन पूरा मिट्टी हो जाना.
जून का आधा महीना बीत चुका है. मौसम में चुप्पी है. उमस है.
अभी बारिश हो रही होती तो सड़क दूर तक भीग जाती. ज़मीन नया रंग पहन लेती. मौसम ठंडी नमी से भर जाता. तपता हुआ लोहा ठंड से भर उठता. कुछ बूँदें चेहरे पर गिरती. कुछ एक पांवों की अँगुलियों को छूकर बह जाती. फिर क्या होता? मौसम उड़ जाता. ज़मीं अपने पुराने रंग में लौट आती. सड़क सूख जाती. फिर क्या कमी है. मैंने अपनी अंगुलियाँ जाली में फंसाए हुए एक फुहार को महसूस किया. सिगरेट के धुंए की तरह उड़ते बादलों के फाहों को पास से गुज़रते हुए देखा. उनको अपने बदन पर लपेटा. आह ये हल्की सर्द झुरझुरी. ये मौसम. ये भीगी हुई सड़क. और वह स्याह और सलेटी रंग का कोलाज अपनी वापसी पर. जिस रास्ते आया उसी तरफ लौटता हुआ. उसी रास्ते पर जहाँ एक शाम दूर तक टहलते रहे थे. उन दो रंगों में तीसरा रंग आया. लाल रंग. ब्रेक करने से उगा रंग. हाँ आगे सडक नीचे की तरफ है. एक तेज़ ढलान है. वहां से पूरब की ओर मुड़कर वे रंग आहिस्ता-आहिस्ता ओझल होते रहे. निगाहें जहाँ तक उनके साथ जा सकती थी गयी.
अँगुलियों ने ट्रिगर दबाया. धायं. बारूद के छोटे धुएं के पीछे वह रंगों का कोलाज गायब हो गया. हालाँकि वक़्त की गांठ से गिरा एक छोटा सा टुकड़ा था मगर मुकम्मल था. ये एक कहानी थी. अपने लिए अपने साथ बीते लम्हों की कहानी. अचानक किसी को बिना देखे, देख लेने की कहानी. जैसे वह बरसात आई न थी मगर आई ही थी. जो नहीं था मगर था. जो नहीं होगा, वह है.
कि कुछ नहीं था, न कुछ रहेगा.
तुम्हारे पास कितने साल बचे हैं ज़िन्दगी के? तुम वहां क्यों नहीं होते जहाँ होना चाहते हो.
देखो केसी!
वह क्या रंग है? ये इतना सुन्दर कोलाज किसने रचा है? ख़यालों के बेतरतीब सिलसिले में लम्बी सड़क से होता हुआ कोई दाखिल हो जाता है. शाम है. इन छुट्टियों की आखिरी सुकून वाली शाम. बालकनी में बेमक़सद खड़े हुए सड़क के किनारों पर अविचल खड़े दरख्तों की तस्वीर जहाँ तक देखी जा सके वहां तक देखते हुए. सड़क पर एक धुंधला सा रंग करीब आता जाता है. धुंधलेपन से पहले स्याह रंग दिखाई पड़ता है फिर करीब आने पर चमकता हुआ सलेटी रंग. दोनों रंगों का मेल कितना सम्मोहक है. सम्मोहक होने से आगे जादुई होने तक जाता हुआ. काला और सलेटी.
दो किताबें बालकनी के कोने में स्टूल पर पड़ी हुईं. मोपासा का फ़्रांस. घास, नदी का किनारा, टूटी छत वाली बिसरा दी गयी झोंपड़ी, परिंदे, नाव, मछलियाँ, चुप्पी और एक बारूद से भरी बन्दूक. ये सब मेरे पास बैठे हुए, उस रंगों के कोलाज को देखते रहते हैं. मैं पूछता हूँ- ये काले और सलेटी रंग का कोलाज जो इधर बढ़ा आ रहा है अगर कोई परिंदा होता तो क्या तुम मार गिराते? बन्दूक क्या तुम्हारी नाल इतनी ही सीधी रहती. अँगुलियों क्या तुम दबा देती ट्रिगर? आह जिस जादू का अभी आग़ाज़ हुआ है, क्या वह यहीं खत्म हो सकता था?
अचानक मन पर उदासी आती है. क्या-क्या न हुआ खत्म.
सड़क के बाएं छोर पर दुकानों की लम्बी कतार है. ऐसी दुकानें जो अब तक कभी खुली ही नहीं. जो भविष्य में खोली जाएगी. जिन पर दुकानदार होंगे, ग्राहक होंगे और सौदे होंगे. अभी वहां धूल बुहार कर एक लड़का पानी छिड़क गया है. नए ज़माने के सबसे बड़े मुनाफे वाले ज़मीनों के कारोबार के सौदागर शाम भर कुर्सियां लगाये बैठे रहेंगे और फिर अपनी बड़ी कारों में सड़क पार चले जायेंगे. उन्हीं खाली पड़ी कुर्सियों से पहले एक कच्चा सा पेड़ है. उतना ही ऊँचा जितना कि पानीपूरी बेचने वाले का ठेला. एक दिन जब ये बहुत बड़ा हो जायेगा तब इस पेड़ के नीचे अनेक चीज़ें समा जाएगी. जैसे उम्र बढ़ने के साथ दुखों को सहने की, उन्हें अपने पास बसाये रखने की जगह बढती जाती है.
मन न रफूगर हुआ, न कबाड़ी. जो ख़राब हुआ, जो नाकाम हुआ, जो बोझ हुआ उसे उसी हाल में रहने दिया. न ठीक किया न बीना. मालूम हुआ कि अभी जो मंज़र है, ये अगले पल न होगा. तो क्या करेंगे इसे यहीं रोक कर. जाने दो. इसी सोच में जब मन उकताया तो उसे कहा- उकताए रहो. जब ख़राब हुआ तो कहा- ख़राब रहो. मन टूट गया तो कहा- पड़े रहो टूटे हुए मिट्टी के बर्तन की तरह और एक दिन पूरा मिट्टी हो जाना.
जून का आधा महीना बीत चुका है. मौसम में चुप्पी है. उमस है.
अभी बारिश हो रही होती तो सड़क दूर तक भीग जाती. ज़मीन नया रंग पहन लेती. मौसम ठंडी नमी से भर जाता. तपता हुआ लोहा ठंड से भर उठता. कुछ बूँदें चेहरे पर गिरती. कुछ एक पांवों की अँगुलियों को छूकर बह जाती. फिर क्या होता? मौसम उड़ जाता. ज़मीं अपने पुराने रंग में लौट आती. सड़क सूख जाती. फिर क्या कमी है. मैंने अपनी अंगुलियाँ जाली में फंसाए हुए एक फुहार को महसूस किया. सिगरेट के धुंए की तरह उड़ते बादलों के फाहों को पास से गुज़रते हुए देखा. उनको अपने बदन पर लपेटा. आह ये हल्की सर्द झुरझुरी. ये मौसम. ये भीगी हुई सड़क. और वह स्याह और सलेटी रंग का कोलाज अपनी वापसी पर. जिस रास्ते आया उसी तरफ लौटता हुआ. उसी रास्ते पर जहाँ एक शाम दूर तक टहलते रहे थे. उन दो रंगों में तीसरा रंग आया. लाल रंग. ब्रेक करने से उगा रंग. हाँ आगे सडक नीचे की तरफ है. एक तेज़ ढलान है. वहां से पूरब की ओर मुड़कर वे रंग आहिस्ता-आहिस्ता ओझल होते रहे. निगाहें जहाँ तक उनके साथ जा सकती थी गयी.
अँगुलियों ने ट्रिगर दबाया. धायं. बारूद के छोटे धुएं के पीछे वह रंगों का कोलाज गायब हो गया. हालाँकि वक़्त की गांठ से गिरा एक छोटा सा टुकड़ा था मगर मुकम्मल था. ये एक कहानी थी. अपने लिए अपने साथ बीते लम्हों की कहानी. अचानक किसी को बिना देखे, देख लेने की कहानी. जैसे वह बरसात आई न थी मगर आई ही थी. जो नहीं था मगर था. जो नहीं होगा, वह है.
कि कुछ नहीं था, न कुछ रहेगा.
तुम्हारे पास कितने साल बचे हैं ज़िन्दगी के? तुम वहां क्यों नहीं होते जहाँ होना चाहते हो.
Published on June 18, 2015 21:31
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