इस छुअन का कोई नाम है


ज़िन्दगी की उदास सतर में
फिर कोई बुझी-बुझी सी 
लहर 
रात के पहले पहर.
कैसी हवा है न?

लड़के ने कहा- “मौसम बदल गया है. ये हवा ज़रा ठंडी, ज़रा गरम, ज़रा बेख़ुदी से भरी हुई है.” लड़का जब ये बात कह रहा था, पीले फूल रात की स्याही से भर गए थे. बस एक साया था. घनेरा, एक रंग और चुप खड़ा हुआ. किसने सोचा था कि रौशनी के डूब जाने पर रंग अपने पूरे वुजूद में बने रहने के बाद एक स्याही से ढक जायेंगे.
“वह मुझे बुला रहा है” लड़की ने कहा. लड़के को उसकी आवाज़ न सुनाई दी. अक्षरों को पढ़कर ये जानना कठिन था कि उसकी उदासी घनी है या उसकी मज़बूरी. वह उस वक़्त क्या सोच, कर या लिख रही थी, ये ठीक-ठीक जानना असंभव था. वह अपने मन में खोयी थी या किसी से मुखातिब थी, ये कहना एक कयास लगाना भर था. लड़के ने एक उलझी हुई लम्बी सांस भरी और ख़ुद से कहा- “तुम बने रहो उसके लिए, हर हाल में हर समय. फिर भी कुछ छूट गया तो भी तुम सुकून में रहोगे कि तुमने वही जीया जिसका वादा था.”
एक बार उस लड़की ने कहा था कि सब कुछ सरल होना चाहिए. ज़िन्दगी आसान होनी चाहिए. हमें अपना समय, अपनी जगह, अपना मन जीने का हक़ होना चाहिए. मैं जहाँ चाहूँ, जब चाहूँ तब वहां जा सकूँ. क्या हमारा हम पर ही कोई अधिकार नहीं. लड़के ने कहा- “हमने गुलामी चुन ली है. दूसरे गुलाम इसे तोड़ देने की जगह इसे बचाए रखने को वचनबद्ध है.” 

वे लोग ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ आज़ादी एक भयभीत करने वाला विचार था. बंधनों के समाज में सुरक्षा की आश्वस्ति थी.
लड़का नहीं चाहता कि वह लड़की को दुनिया की असलियत के बारे में ज्यादा बताता. दुःख भरे दिनों में किसी स्वप्न को तोड़ना बुरी बात होती है. लड़का अपने हाल के बारे में सोचता था कि वे दोनों किसी चिड़ियाघर में दो अलग पिंजरों में क़ैद जीव थे. वे कभी-कभी एक-दूजे को देख और सुन सकते थे मगर नुमाइश और जरूरत के कारोबार के कारण उन पर बेहिसाब बंदिशें थी. जैसे कभी बाद बरसों के चाँद को ग्रहण लगता है, कभी सूरज और धरती के रास्ते में चाँद के आने से आसमान में हीरे की अंगूठी सी शक्ल बनती है. उसी तरह वे शापित और न दोहराए जा सकने वाले मिलन के गवाह भर हो सकते थे.
लड़के के कहा-“ये ज़िन्दगी है, इसका कोई हल नहीं”
लड़की ने कहा- “हाँ”
इसके बाद एक टूटी हुई चुप्पी बोलती रही. शहर भर में रोशनियों से लेम्पपोस्ट सज गए थे. दीवारों के बीच ठहरी हुई सड़कें अजनबी शक्ल में बदल गयी थी. उस कमरे की खिड़की पर एक भारी परदा था. परदा ऐसे स्थिर था जैसे कोई मरुस्थल ठहर गया हो. उस कमरे तक रुत के बदलने की आहट आई थी या अनदेखी कर दी गयी थी कि ए सी ऑन था. इसके सिवा और वहां जो कुछ था या हो सकता था, वह एक उदासीन परिंदे के पंखों की एक ठहर के साथ आती आवाज़ थी. जैसे अँधेरे में कुछ कहीं अटक गया हो. जैसे किसी उलझी हुई रस्सी में पड़ा हुआ पाँव, ज़रा रुक कर कोई सिरा तलाश करे और फिर नियति के हाथ खुद को छोड़कर शांत हो जाये.
स्याह सलवटें. स्याह छुअन. स्याह बेकसी.
हालाँकि कई बार उसने चेहरे से चादर को हटाया मगर अँधेरा घना था. देखने को कुछ न था और चादर के अंदर और बाहर सांस एक सी आ रही थी. उसने कहा- “शुक्रिया ज़िन्दगी, सलामत रहो”

[काश उसके पास एक फीकी हंसी हुई होती. ये बात इस कहानी का हिस्सा नहीं थी. बस कहीं से मेरे ज़ेहन में दफअतन टपक गयी थी. जाने किसलिए .वैसे उस लड़की का बदन पतले धागे जैसा था ,जब वह दसवीं जमात में पढ़ती थी. उसके ख्वाब पानी जैसे थे तब उसने चाहा कि वह कहीं बह जाये. लड़का जब कॉलेज जाने लगा था, तब उसके पास एक ख्वाब था कि कोई ऐसी ही लड़की कहीं है. अगर वह मिली तो उसका नया नाम रखेगा और उसे नाम से बुलाएगा. इसलिए काश एक फीकी हंसी की जगह उनके पास ज़िन्दगी का एक दिन होता. वे मिलकर सूखे हुए गमलों में कुछ नए पौधे लगा देते और सोचते कि इनपर जल्द ही फूल आयेंगे.]
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[Painting Courtesy : Nik Lamley Brown ]
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Published on November 02, 2015 17:40
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Kishore Chaudhary
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