उस रोज़ आप ये भी जान लेते हैं
सर्द दिन की दोपहर में किसी की सलाइयाँ छूट गयी, जीने पर. रिश्तों जैसे जो धागे थे, वे उलझे होते तो सुलझाने के जतन में बिता देते नर्म सुबहें और ठंडी शामें मगर बदनसीबी ये कि वे धागे लगभग टूट चुके हैं. सलाइयों को देखता हूँ तो ख़याल आता है कि आँखें ऊन के गोले हुई होती तो उनमें सलाइयाँ पिरो कर रख देता किसी आले में. रात के बाजूबन्द से
झरती है, ठण्डी हवा।
* * *
सर्द आह थी किसी की
या मौसम का झौंका छूकर गुज़रा था।
* * *
वे सब जो
विपरीत होने का बोध थे,
असल में एक ही चीज़ थे.
* * *
भ्रम
प्रेम का सबसे बड़ा सहारा है.
* * *
अक्सर कोई कहता है
तुम उसे छोड़ क्यों नहीं देते
अक्सर दिल मुस्कुराकर बढ़ जाता है आगे.
जाने क्या बदा है?
* * *
उम्मीद से अच्छा
और उम्मीद से अधिक मारक कुछ नहीं है.
* * *
फूलों के चेहरे से स्याही बुहारती,
भीगी हरी घास पर रोशनी छिड़कती, ओ सुबह!
आ तुझे बाहों में भर लूँ।
* * *
इस बियाबां के दरवाज़े हैं
और सब बंद है. यहाँ कौन आता है?
* * *
उदास किवाड़ों पर
बेचैन मौसमों की दस्तकों में
दिल के एक कोने में
जलता हुआ किसी धुन का अलाव.
और सोचें उसे, जबकि वो, अब वो नहीं है.
* * *
आँखों में कुछ फूल उकेरे हुए दीखते थे
जो असल में थे नहीं
लफ़्ज़ों में कहानियां कही हुई मालूम होती थी
जो असल में थी नहीं.
जैसे पंद्रह दिन में किसी रोज़ चाँद दिखता है
आधे से ज़रा सा ज्यादा मगर वो होता तो उतना ही है
जितना कभी था.
इसी तरह झूठ अपने ऊपर लगा लेता है
हंसी, उदासी और शिकवों का वर्क
आधे से थोड़ा सा ज्यादा थोड़ा कम मगर
असल में होता वह झूठ ही है.
दोपहरों के इंतज़ार में अक्सर सच साफ़ दिखाई देता है और रातों की स्याही में उम्मीदें ज्यादा अच्छी लगती हैं. बशर्ते आप ख़ुद को रोने से रोक लें और सोच सकें कल के बारे में.
* * *
जिस रोज़ आप जान लेते हैं कि कोई साध रहा है एक साथ दो तीन रिश्ते. उस रोज़ आप ये बात भी जान लेते हैं कि आप एक कटते हुए पेड़ के नीचे खड़े हैं. मगर आप वहां से हटने की जगह ये सोचते रहते हैं कि किस तरफ गिरेगा.
* * *
Published on December 21, 2015 08:49
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