संतु महाराज की चिलम धू-धू
उस छितरी हुई भीड़ में भी कोई न कोई टकरा जाता था. किताबों का मेला था और मौसम बेढब था. विशाल कमरों में बनी गुमटियाँ सरीखी दुकानें और कागज़ की ख़ुशबू दिलफ़रेब थी. मैं कुछ साल से वहां जाता हूँ. अक्सर वहां होना एक सुख होता है. ऐसा सुख जिसमें भरी-भरी जगह पर तन्हाई साथ चलती रहे. कोई तपाक से मिले, झट हाथ मिलाये, पट मुस्कुराए और ओझल हो जाये. कंधे पर सवार तन्हाई फिर से खाली मैदानों में कानों में बजने वाली सिटी बजाने लगे. मुझे किताबों से प्रेम है. प्रेम से अधिक ये सम्मोहन है. माने मन उनकी ओर भागता रहता है. अगर पागलपन रहे तो किताब दर किताब पढ़ते हुए मेरे दिन-रात गुम होते जाते हैं. जैसे इधर कई दिनों से हर मौके मैं किसी न किसी किताब के पहलू में जा बैठता रहा. बालज़ाक को पढ़ते हुए अचानक कृष्ण बलदेव वैद को पढने लगता. चित्रा दिवाकरुणी के लिखे पन्ने पलटते हुए अचानक देखता कि मेरे हाथ में कैथरीन मेंसफील्ड के अक्षर भरे हुए हैं. इसी बेढब पढ़ाई में नज़र उन किताबों पर जाती जो इस बार मेला से मेरे साथ चली आई. मैं अक्सर किताबें नहीं पढ़ता, मैं लेखकों को पढ़ता हूँ. किताबें पढना ज्ञान अर्जन हो सकता है लेकिन लेखकों को पढ़ना सदा जीवन को पढना है. ज़िन्दगी के मारक कोकटेल की तलछट में सुख डूबा जान पड़ता है. लगता है वहां तक गोता लगा सका तो सलीके से भीग जाऊँगा.
जिन लोगों को प्यार करने की आदत हो वे किताबें नहीं पढ़ सकते. वे किताबों के अव में होते हैं. मेरा लालायित मन जीवन से प्रेम मांगता रहता है. वह हर एक दस्तक से पूछता है- क्या करोगे साबुत ज़िन्दगी का? थोड़ा सा खुद को कहीं बिखेर दो. कोई तुमको चाहता है तो चुन लेगा प्यार से. मैं इसी चुनाव में समय नहीं पाता हूँ कि सलीकेदार पाठक हो सकूँ और कोई ढंग की बात कहूँ.
जाने कैसे कुछ लोग बिना बताये जीवन में प्रवेश कर लेते हैं. जैसे संतोष त्रिवेदी. बिना कुछ कहे-सुने प्रिय हो गए. वे प्रिय ही हो सकते थे. मित्र होना मेरे लिए कष्टकारी है. मित्र होते ही बहुत कुछ होना पड़ता है और प्रिय को आप जहाँ चाहें, जितना चाहें, अपने जीवन में बिना उसकी अनुमति के रख सकते हैं. सबका अपना-अपना आलस है, मेरा कुछ आला दर्ज़े का है. संतोष त्रिवेदी से परिचय के बाद उनसे निजी जीवन से जुड़ी बात सिर्फ एक बार हुई है. जब वे और मैं हमारी बेटियों के दिल्ली विश्वविध्यालय में प्रवेश प्रक्रिया से जुड़े कुछ सवाल जवाब में थे. इसके इतर वे एक सादा व्यंग्यकार हैं. सादा का अर्थ सिर्फ वे दोस्त ठीक समझ पाएंगे, जो ये समझ सकें कि व्यंग्य में किसी आग्रह का अभाव ही सादगी है.
आज खूब तेज़ धूप है. जैसी कल थी. आज की रात खूब ठंडी हो सकती है, जैसी कल थी. दो परखी हुई चीज़ों और स्थितियों से हम अक्सर अनुमान लगाते हैं कि आगे आने वाला क्या हो सकता है. और जहाँ सब मिले हुए हैं वहां आप एक उपहास, हंसी और आनंद को तराशकर बेहतर व्यंग्य में ढलता देख सकते हैं. संतोष त्रिवेदी की इस किताब के बारे में दो लोगों ने बड़ी बारीकी से रौशनी डाली है. बारीकी से मेरा आशय है कि खूबियों पर पैनी निग़ाह रखते हुए ज़रूरतों को आंकना. मैंने पढ़ा नहीं, बस एक सरसरी निग़ाह डाली. किताब के बारे में लिखने वाले ज़रूर ख़ास लोग होंगे और व्यंग्य को गहरे समझते होंगे. मगर मेरे लिए सुख है रचना का पाठ.
इन रचनाओं को पढने में मुझे इसलिए सुख है कि ग्राम्य जीवन की भाषा में रचे बसे चुटीले, लच्छेदार और नमकीन शीर्षक. अपने अनुभवों से परखे हुए हास्य में किसी गहरी अनुभूति को कुछ इस तरह पिरो देना, कि किसी दुःख को हंसी में उड़ा रहे हैं. व्यंग्यकार आलोचना और समालोचना जैसी चीज़ों के फेर में नहीं पड़ता. वह समाज के टूटे-फूटे भांडों पर न कलि करने वाला है, न ठठेरा है, न ताम्बे का टांका देने वाला. असल में वो इन सामाजिक भांडों और मर्तबानों को एक नयी रौशनी में दिखाता है. हम किस तरह निर्धन हो चुके हैं, ये याद दिलाता है.
उधर दिल्ली में मैंने सुना कि पॉकेटमारी के काम में महिलाओं ने काफी अच्छी जगह बना ली है. इसी सुनी गयी बात को संतोष त्रिवेदी के शब्दों में पढना सुखकारी है. दिल चुराने लायक भी न रहा. इसी का एक टुकड़ा है- “अपने बगल में खड़ी जिस बाला को देखकर नई ग़ज़ल के काफिया-रदीफ़ दुरुस्त करने में जुटे थे, ठीक उसी समय उनके खीसे से कड़क माल सरक गया. सबकुछ लुटाने के बाद मालूम हुआ कि वह बाला नहीं बला थी” ये चुटीली भाषा है. हमारी ललचाई निगाहों पर चिकौटी है. हमारी सस्ती दिलफेंक आदतों पर तंज है.
भाई संतोष जी, किताबें पढना, लोगों को देखना, उनकी आत्मा को टटोलना, छोटी चीज़ें पकड़ना और खूब व्यंग्य लिखना. मैं इसके साथ एक दुआ जोड़ता हूँ कि संतु महाराज की चिलम सदा धू-धू जलती रहे.
अयन प्रकाशन पेपरबैक नहीं छापता. इसकी कोई वजह भी उन्होंने मुझे बताई थी मगर रूचि न थी इसलिए याद न रख पाया. उनके बताने में एक अभिमान था. मुझे वह भी अच्छा नहीं लगा. हो सकता है कि ये सब इसलिए हो कि मुझे इससे कम फर्क पड़ता है कि किताब किस तरह छपी है. किताब में क्या छपा है इससे फर्क पड़ता है. हाँ मगर मुझे पेपरबैक किताबें ही अधिक प्रिय हैं. इसी प्रकाशन से मनीषा श्री की किताब आई है. वे अचानक मिली. किताब का ज़िक्र हुआ तो मैंने कहा दिखाइए कहाँ है? ये एक छोटी मुलाकात थी. बस इतनी भर कि आप मिले. ये दो अजनाने लोगों का आकस्मिक मिलना था. इसे सिर्फ कोई किताब ही जोड़ सकती थी. जाने किस कारण ये किताब कुछ रोज़ से मेरे और आभा के बीच घूमती रही. आभा ने शायद इसके पन्ने इसलिए पढ़े होंगे कि ये किताब अलमारी की जगह बिस्तर पर सीधे हाथ पड़ी मिली होगी.
मनीषा कहती हैं- “ये नये ढंग की किताब है. इसमें कवितायेँ हैं किन्तु सब कविताओं से पहले उनकी अनुभूतियों और रचना के आधार के बारे में लिखा गया है. ये एक डायरी कही जा सकती मगर असल में डायरी से अधिक है. इसमें ज़िन्दगी के वे पल हैं जो हर पाठक को कहीं न कहीं इस तरह छू जायेंगे कि जैसे ये उन्होंने खुद जीया है” इस बात के बाद एक दो तस्वीरें संतोष त्रिवेदी और मनीषा के साथ ली और हम विदा हो गए थे. मैंने डायरी कभी-कभी लिखी. ये इतना अनियत आयोजन था कि इसके होने पर भी संदेह है कि ये लिखना, कभी था भी या नहीं. मैंने सलीके से डायरी तब लिखनी शुरू की जब ब्लोगर आया. अपने ब्लॉग पर डायरी लिखना परमानन्द है.
मैं मनीषा श्री को पढ़ते हुए एक सरल लेखक को पाता हूँ. एक ऐसा लेखक जिसने अपने बचपन से अब तक की कहानी में अपने भीतर और बाहर के व्यक्ति को अलग रंग रूप में नहीं रखा. ये सादगी और साफ़गोई दुर्लभ है.
इस छद्म साहित्य संसार में बड़े नाम, छोटे नाम, परिचित नाम, अपरिचित नाम, डूबे हुए नाम और उभरते हुए नाम उन मसखरों के दिए विशेषण हैं, जो नाकाम थे और नाकाम रहेंगे. कुछ लोगों को कवितायेँ पसंद नहीं आती, कुछ को कहानियों में कुछ नहीं दीखता, लेकिन मेरी आत्मा लोगों के गहरे दुखों और उथले सुखों को चीन्हती रहती है. मैं बेहिसाब तो नहीं मगर खूब पढ़ता हूँ. कभी आप बिना किसी आग्रह के कुछ पढेंगे तो कोई नयी बात पाएंगे. इसी तरह आप मनीषा श्री को पढ़ते हुए मैंने कुछ पाया जो मुझे छूकर गुज़र गया. मैं दो हज़ार आठ की मंदी के बारे में पढ़ता हूँ. उन्नीस सौ उनतीस के बाद की सबसे भयानक मंदी. एक लड़की जो देश के प्रतिष्ठित संस्थान में इस आशा में दाखिल होती है कि उसे पढ़ाई के बाद वह रचनात्मक और सुखकारी संसार मिल जायेगा, जो हर किसी का ख़्वाब हो सकता है. अचानक मंदी के शैतान की आग उगलती जीभ से दुनियावी कारोबार राख़ के ढेर में बदलता जाता है. केम्पस प्लेसमेंट के लिए कोई आता हुआ नहीं दीखता. मनीषा श्री के इस बयान में भले साहित्यिक पुट न हो, सम्मोहनकारी शब्दावली न हो, मगर ज़िन्दगी की गहरी टीस ज़रूर है. अनेक कवितायेँ जिन सच्ची कहानियों को लिए हुए हैं, वे पारिवारिक रिश्तों, छोटी लड़की की बड़ी समझ, ज़िम्मेदारी, समर्पण और किसी के लिए कुछ करने की चाहना की अनुभूतियों से भरी हैं.
शुभकामनाएं मनीषा श्री लिखते जाना.
दोपहर किताबों के संसार में बीत जाये इससे बड़ा सुख क्या होगा. मैं कुछ कहानियां और पढ़ता हूँ. एक लड़की की लिखी कहानी के अद्भुत प्लाट के बारे में सोचता हूँ. मुझे अरेबियन नाइट्स की याद आती है. जब कभी वह लड़की इस कहानी को पूरा करेगी मैं आपको ज़रूर बताऊंगा. फिलहाल एक ही काम है, उसकी कहानी का इंतज़ार करना.
[Picture courtesy :Flickr.com]
Published on February 04, 2016 03:05
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