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Amaan Shaikh

“सफ़र: घर से घाट तक
जीवन को फिर अब हम त्याग करते हैं,
उनके दिए हर श्राप का तिरस्कार करते हैं।
कोई तुमको खोकर भी तुम्हारी यादों को जोतेगा,
कोई हवा को दोष देगा,
कोई तुमको कोसेगा।
वो त्याग के तुम्हें आग लगाएँगे,
चिता के बुझते ही तुम्हारी
सब घर को लौट जाएँगे।
तेरहवीं पे वो लोग फिर वापस आएँगे,
तुम्हारे जाने की कोई खुशियाँ मना रहा होगा,
तो कई लोग मातम मनाएँगे।
त्यागने के बाद ही सुख है।
यादों की संदूक को तुम्हारी अस्थि के साथ
काशी या गंगा ले जाएँगे,
तुम्हारे अपने लोग ही तुम्हें वहाँ बहाएँगे,
तुम्हें गंगा के प्रवाह के हवाले छोड़ जाएँगे।
किसी को घर लौट जाने की बहुत जल्दी होगी,
एक पहर गुज़र चुका होगा,
सब मोह छूट चुका होगा।
ठिकाना अब तुम्हारा
घर से बदलकर घाट हो चुका होगा,
देह तुम्हारा बदल के
अब राख हो चुका होगा।”

― Amaan Shaikh
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