Amaan Shaikh
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in SAMASTIPUR, India
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March 2026
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| "**Amaan Shaikh** is a multifaceted writer, photographer, and healthcare professional based in **Samastipur, Bihar**. Known by his pen name **Amaan Shaikh**, he has carved a niche for himself as a storyteller who balances the precision of science w..." Read more of this blog post » | |
| "गुनहग़ार(Gunahgar) novel/book Amaan shaikh ke dwara likhi gaya ek upanyas hai jisme faiz aur zoya naami kirdar ka zikr hota isme faiz aisa kirdar hai jo badle ki aag me deen ki raah pe aa jata hai aur zoya ka iktarfa Kahani isi book ke andar likhi..." Read more of this blog post » | |
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Amaan Shaikh: Sahitya aur Kala ke Sangam Par Ek Nayi Pehchan
"Sahitya ki duniya mein har daur mein aise naye sitare ubharte hain jo apni soch se logon ke dilon par chha jaate hain. Aaj hum baat kar rahe hain Amaan Shaikh ki, jo ek pratibhashali lekhak, kavi (poet), aur artist hain. Bihar ke Samastipur se tal..."
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quote
“मोह तो उस पत्तों से लदे पेड़ को है; यदि मोह न होता, तो वह भी उस सूखे पेड़ की तरह अपने पत्तों को त्याग देता। सत्य तो यह है कि जहाँ मोह है, वहाँ प्रेम का वास नहीं; और जहाँ सच्चा प्रेम है, वहाँ त्याग का भाव स्वतः ही निहित है।”
Amaan Shaikh |
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“दोस्तों, यह सच है कि समझाने से लोग नहीं समझते, क्योंकि अगर समझ पाते तो बांसुरी बजाने वाले श्री कृष्ण कभी महाभारत नहीं होने देते। लेकिन फिर भी समझने और समझाने का प्रयास निरंतर जारी रखना चाहिए।
हम सब अपने मान-सम्मान, धन-दौलत का ध्यान रखते हैं। रखना भी चाहिये। लेकिन क्या हम उस रामतत्व का ध्यान रखते हैं जो जन्म से ही हमारे अंदर छुपा है? इस रामतत्व को विकसित न कर पाना अज्ञानता है, परंतु उसे अपने हाथों नष्ट करना तो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। कोई बात नही की आप इस जन्म में पुण्य कर्मों के बल को आगे के लिये संचित नही कर पाते हैं, लेकिन ये क्या की संचित जन्मों से संचित पुण्य कर्मों को भी इस जन्म में खत्म कर दें.. ये तो कोई समझदारी की बात नही हुई । इसीलिये हर कदम संभल कर चलना, सावधानी से चलना ही प्रार्थना है। प्रभु से प्रार्थना है कि आप शुभ कर्म करते हुए, अपने रामतत्व का पोषण करते हुए और अपने आराध्य पर विश्वास रखते हुए अपनी दिव्य सम्भावनाओं को जल्दी साकार कर लें। श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।” Rajesh Goyal, राजेश गोयल |
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“अंतिम प्रस्थान
खुद की चिता को अब स्वयं आग करते हैं,
चलो इस अंतहीन पीड़ा का अब बहिष्कार करते हैं।
मीरा के उस प्रेम का अब राग करते हैं,
वैराग्य की राह का अब बस जाप करते हैं।
चलो इस बार भी हम सबको माफ़ करते हैं,
विरह के आलाप से खुद को ही साफ़ करते हैं।
चलो अब प्रेम का ही प्रकाश करते हैं,
प्रेम त्याग कर अब खुद का ही त्याग करते हैं।
अपनी अंतहीन पीड़ा का संहार करते हैं,
बैसाखी से अब सागर पार करते हैं।
चिता की अग्नि से अब आखिरी श्रृंगार करते हैं,
चलो हम भी अब खुद को माफ़ करते हैं।”
― गुनहग़ार (Gunahgar): by Amaan Shaikh
खुद की चिता को अब स्वयं आग करते हैं,
चलो इस अंतहीन पीड़ा का अब बहिष्कार करते हैं।
मीरा के उस प्रेम का अब राग करते हैं,
वैराग्य की राह का अब बस जाप करते हैं।
चलो इस बार भी हम सबको माफ़ करते हैं,
विरह के आलाप से खुद को ही साफ़ करते हैं।
चलो अब प्रेम का ही प्रकाश करते हैं,
प्रेम त्याग कर अब खुद का ही त्याग करते हैं।
अपनी अंतहीन पीड़ा का संहार करते हैं,
बैसाखी से अब सागर पार करते हैं।
चिता की अग्नि से अब आखिरी श्रृंगार करते हैं,
चलो हम भी अब खुद को माफ़ करते हैं।”
― गुनहग़ार (Gunahgar): by Amaan Shaikh
“खुद के लिए वक्त निकाल रहा हूँ,
मैं धूप की घाम से भाग रहा हूँ।
चाँद की ठंडक मुझको अच्छी लगती,
इसीलिए अब रातों को भी जाग रहा हूँ।”
― Iktarfa: imperfectly a perfect failure
मैं धूप की घाम से भाग रहा हूँ।
चाँद की ठंडक मुझको अच्छी लगती,
इसीलिए अब रातों को भी जाग रहा हूँ।”
― Iktarfa: imperfectly a perfect failure
“त्याग"
नाराज़ हैं आप मुझसे,
फ़क़त मेरी कहानी नहीं जानोगे?
धूल को किस्मत समझने की भूल की थी मैंने,
अरे हाँ! आप मुझे ताना तो नहीं मारोगे?
नया सीखते-सीखते अब थक गया हूँ,
मैं कहीं वक़्त में ही अटक गया हूँ।
भूल जाता हूँ हमेशा कि सपने टूटेंगे,
भूल जाता हूँ हमेशा कि लोग छूटेंगे।
पत्ते गिर चुके, पतझड़ का मौसम आ चुका था,
अरमानों की कली खिलने में समय था अभी।
त्याग दिया मैंने खुद को ही, सबको त्यागते-त्यागते,
खो गया मेरा वजूद भी, अपनों को माँगते-माँगते।
दुनिया के रंग देखे तो ज्ञात हुआ, कि सात रंग कम पड़ गए,
स्तब्ध होने की क्या बात थी? अकेले रहने का हुनर तो ज़माने को देख सीख लिया था हमने।
चलो! अब अपनी ही चिता को आग देते हैं,
प्रेम त्याग चुके हम, अब खुद को त्याग देते हैं।
अंतिम पीड़ा ही प्रिय पीड़ा थी,
मगर यह समझने में बहुत देर हो चुकी थी।”
―
नाराज़ हैं आप मुझसे,
फ़क़त मेरी कहानी नहीं जानोगे?
धूल को किस्मत समझने की भूल की थी मैंने,
अरे हाँ! आप मुझे ताना तो नहीं मारोगे?
नया सीखते-सीखते अब थक गया हूँ,
मैं कहीं वक़्त में ही अटक गया हूँ।
भूल जाता हूँ हमेशा कि सपने टूटेंगे,
भूल जाता हूँ हमेशा कि लोग छूटेंगे।
पत्ते गिर चुके, पतझड़ का मौसम आ चुका था,
अरमानों की कली खिलने में समय था अभी।
त्याग दिया मैंने खुद को ही, सबको त्यागते-त्यागते,
खो गया मेरा वजूद भी, अपनों को माँगते-माँगते।
दुनिया के रंग देखे तो ज्ञात हुआ, कि सात रंग कम पड़ गए,
स्तब्ध होने की क्या बात थी? अकेले रहने का हुनर तो ज़माने को देख सीख लिया था हमने।
चलो! अब अपनी ही चिता को आग देते हैं,
प्रेम त्याग चुके हम, अब खुद को त्याग देते हैं।
अंतिम पीड़ा ही प्रिय पीड़ा थी,
मगर यह समझने में बहुत देर हो चुकी थी।”
―
“अंतिम प्रस्थान
खुद की चिता को अब स्वयं आग करते हैं,
चलो इस अंतहीन पीड़ा का अब बहिष्कार करते हैं।
मीरा के उस प्रेम का अब राग करते हैं,
वैराग्य की राह का अब बस जाप करते हैं।
चलो इस बार भी हम सबको माफ़ करते हैं,
विरह के आलाप से खुद को ही साफ़ करते हैं।
चलो अब प्रेम का ही प्रकाश करते हैं,
प्रेम त्याग कर अब खुद का ही त्याग करते हैं।
अपनी अंतहीन पीड़ा का संहार करते हैं,
बैसाखी से अब सागर पार करते हैं।
चिता की अग्नि से अब आखिरी श्रृंगार करते हैं,
चलो हम भी अब खुद को माफ़ करते हैं।”
― गुनहग़ार (Gunahgar): by Amaan Shaikh
खुद की चिता को अब स्वयं आग करते हैं,
चलो इस अंतहीन पीड़ा का अब बहिष्कार करते हैं।
मीरा के उस प्रेम का अब राग करते हैं,
वैराग्य की राह का अब बस जाप करते हैं।
चलो इस बार भी हम सबको माफ़ करते हैं,
विरह के आलाप से खुद को ही साफ़ करते हैं।
चलो अब प्रेम का ही प्रकाश करते हैं,
प्रेम त्याग कर अब खुद का ही त्याग करते हैं।
अपनी अंतहीन पीड़ा का संहार करते हैं,
बैसाखी से अब सागर पार करते हैं।
चिता की अग्नि से अब आखिरी श्रृंगार करते हैं,
चलो हम भी अब खुद को माफ़ करते हैं।”
― गुनहग़ार (Gunahgar): by Amaan Shaikh
“सफ़र: घर से घाट तक
जीवन को फिर अब हम त्याग करते हैं,
उनके दिए हर श्राप का तिरस्कार करते हैं।
कोई तुमको खोकर भी तुम्हारी यादों को जोतेगा,
कोई हवा को दोष देगा,
कोई तुमको कोसेगा।
वो त्याग के तुम्हें आग लगाएँगे,
चिता के बुझते ही तुम्हारी
सब घर को लौट जाएँगे।
तेरहवीं पे वो लोग फिर वापस आएँगे,
तुम्हारे जाने की कोई खुशियाँ मना रहा होगा,
तो कई लोग मातम मनाएँगे।
त्यागने के बाद ही सुख है।
यादों की संदूक को तुम्हारी अस्थि के साथ
काशी या गंगा ले जाएँगे,
तुम्हारे अपने लोग ही तुम्हें वहाँ बहाएँगे,
तुम्हें गंगा के प्रवाह के हवाले छोड़ जाएँगे।
किसी को घर लौट जाने की बहुत जल्दी होगी,
एक पहर गुज़र चुका होगा,
सब मोह छूट चुका होगा।
ठिकाना अब तुम्हारा
घर से बदलकर घाट हो चुका होगा,
देह तुम्हारा बदल के
अब राख हो चुका होगा।”
―
जीवन को फिर अब हम त्याग करते हैं,
उनके दिए हर श्राप का तिरस्कार करते हैं।
कोई तुमको खोकर भी तुम्हारी यादों को जोतेगा,
कोई हवा को दोष देगा,
कोई तुमको कोसेगा।
वो त्याग के तुम्हें आग लगाएँगे,
चिता के बुझते ही तुम्हारी
सब घर को लौट जाएँगे।
तेरहवीं पे वो लोग फिर वापस आएँगे,
तुम्हारे जाने की कोई खुशियाँ मना रहा होगा,
तो कई लोग मातम मनाएँगे।
त्यागने के बाद ही सुख है।
यादों की संदूक को तुम्हारी अस्थि के साथ
काशी या गंगा ले जाएँगे,
तुम्हारे अपने लोग ही तुम्हें वहाँ बहाएँगे,
तुम्हें गंगा के प्रवाह के हवाले छोड़ जाएँगे।
किसी को घर लौट जाने की बहुत जल्दी होगी,
एक पहर गुज़र चुका होगा,
सब मोह छूट चुका होगा।
ठिकाना अब तुम्हारा
घर से बदलकर घाट हो चुका होगा,
देह तुम्हारा बदल के
अब राख हो चुका होगा।”
―
“त्याग"
नाराज़ हैं आप मुझसे,
फ़क़त मेरी कहानी नहीं जानोगे?
धूल को किस्मत समझने की भूल की थी मैंने,
अरे हाँ! आप मुझे ताना तो नहीं मारोगे?
नया सीखते-सीखते अब थक गया हूँ,
मैं कहीं वक़्त में ही अटक गया हूँ।
भूल जाता हूँ हमेशा कि सपने टूटेंगे,
भूल जाता हूँ हमेशा कि लोग छूटेंगे।
पत्ते गिर चुके, पतझड़ का मौसम आ चुका था,
अरमानों की कली खिलने में समय था अभी।
त्याग दिया मैंने खुद को ही, सबको त्यागते-त्यागते,
खो गया मेरा वजूद भी, अपनों को माँगते-माँगते।
दुनिया के रंग देखे तो ज्ञात हुआ, कि सात रंग कम पड़ गए,
स्तब्ध होने की क्या बात थी? अकेले रहने का हुनर तो ज़माने को देख सीख लिया था हमने।
चलो! अब अपनी ही चिता को आग देते हैं,
प्रेम त्याग चुके हम, अब खुद को त्याग देते हैं।
अंतिम पीड़ा ही प्रिय पीड़ा थी,
मगर यह समझने में बहुत देर हो चुकी थी।”
―
नाराज़ हैं आप मुझसे,
फ़क़त मेरी कहानी नहीं जानोगे?
धूल को किस्मत समझने की भूल की थी मैंने,
अरे हाँ! आप मुझे ताना तो नहीं मारोगे?
नया सीखते-सीखते अब थक गया हूँ,
मैं कहीं वक़्त में ही अटक गया हूँ।
भूल जाता हूँ हमेशा कि सपने टूटेंगे,
भूल जाता हूँ हमेशा कि लोग छूटेंगे।
पत्ते गिर चुके, पतझड़ का मौसम आ चुका था,
अरमानों की कली खिलने में समय था अभी।
त्याग दिया मैंने खुद को ही, सबको त्यागते-त्यागते,
खो गया मेरा वजूद भी, अपनों को माँगते-माँगते।
दुनिया के रंग देखे तो ज्ञात हुआ, कि सात रंग कम पड़ गए,
स्तब्ध होने की क्या बात थी? अकेले रहने का हुनर तो ज़माने को देख सीख लिया था हमने।
चलो! अब अपनी ही चिता को आग देते हैं,
प्रेम त्याग चुके हम, अब खुद को त्याग देते हैं।
अंतिम पीड़ा ही प्रिय पीड़ा थी,
मगर यह समझने में बहुत देर हो चुकी थी।”
―
“soug'
लोग कहते घर के बड़े की ज़िंदगी आसान होती,
मगर वो बड़ा ही जाने, ज़िंदगी उसकी श्मशान होती।
ज़िंदा लाश बना कर उनको छोड़ दिया जाता,
सवाल करने पे उनके ख्वाबों को तोड़ दिया जाता।
शौक की उम्र में वो सोग मनाते हैं,
जीते-जी अपने अरमानों की चिता जलाते हैं।
नाकामयाब होने पर उन्हें छोड़ दिया जाता,
शौक छीन कर उनकी कमर को तोड़ दिया जाता।
बोझ तले वो हर पल मरते रहते हैं,
घर वाले छोटों की वाह-वाही करते रहते हैं।
कम कमाने पे इज़्ज़त छीन ली जाती है,
घर से निकालने की धमकी दी जाती है।
बड़ा होने का अफसोस नहीं, खड़े होने पे रोष है,
बड़ा होना भी शायद किस्मत का दोष है।
कौन कहता है माँ-बाप नहीं बदलते,
कौन कहता है माँ-बाप छल नहीं करते।
कम कमाने पे ताना दिया जाता है,
छोटों की प्लेट भरी, बड़ों को बस दाना दिया जाता है।”
― Iktarfa: imperfectly a perfect failure
लोग कहते घर के बड़े की ज़िंदगी आसान होती,
मगर वो बड़ा ही जाने, ज़िंदगी उसकी श्मशान होती।
ज़िंदा लाश बना कर उनको छोड़ दिया जाता,
सवाल करने पे उनके ख्वाबों को तोड़ दिया जाता।
शौक की उम्र में वो सोग मनाते हैं,
जीते-जी अपने अरमानों की चिता जलाते हैं।
नाकामयाब होने पर उन्हें छोड़ दिया जाता,
शौक छीन कर उनकी कमर को तोड़ दिया जाता।
बोझ तले वो हर पल मरते रहते हैं,
घर वाले छोटों की वाह-वाही करते रहते हैं।
कम कमाने पे इज़्ज़त छीन ली जाती है,
घर से निकालने की धमकी दी जाती है।
बड़ा होने का अफसोस नहीं, खड़े होने पे रोष है,
बड़ा होना भी शायद किस्मत का दोष है।
कौन कहता है माँ-बाप नहीं बदलते,
कौन कहता है माँ-बाप छल नहीं करते।
कम कमाने पे ताना दिया जाता है,
छोटों की प्लेट भरी, बड़ों को बस दाना दिया जाता है।”
― Iktarfa: imperfectly a perfect failure
“औलाद"
अच्छी औलाद बनने के लिए, खुद को दफ़नाना होता है,
ज़िंदा होकर भी बस एक 'ज़िंदा लाश' बन जाना होता है।
अपनी चिता को खुद, अपने ही हाथों से आग लगाना होता है।
छोड़कर अपने सभी सपने, उनके सपनों की खातिर मर जाना होता है,
सवाल करने पे हर बार, हमें ही नकार दिया जाता है।
जीते-जी हमारे ही ख्वाबों को, बेरहमी से मार दिया जाता है
अरमानों का उनके बोझ लिए, हम बस चल रहे होते हैं,
हर वक्त घुट-घुट के कोने में, हम बस रोते हैं।
दुख हमारी अपनी ही एक खोज है,
जिसने हमारे वजूद पर ग्रहण लगा दिया।
हम ढूंढने निकले थे रौशनी की किरण,
मगर अंधेरों ने हमें ही अपना पता बना लिया।”
― गुनहग़ार
अच्छी औलाद बनने के लिए, खुद को दफ़नाना होता है,
ज़िंदा होकर भी बस एक 'ज़िंदा लाश' बन जाना होता है।
अपनी चिता को खुद, अपने ही हाथों से आग लगाना होता है।
छोड़कर अपने सभी सपने, उनके सपनों की खातिर मर जाना होता है,
सवाल करने पे हर बार, हमें ही नकार दिया जाता है।
जीते-जी हमारे ही ख्वाबों को, बेरहमी से मार दिया जाता है
अरमानों का उनके बोझ लिए, हम बस चल रहे होते हैं,
हर वक्त घुट-घुट के कोने में, हम बस रोते हैं।
दुख हमारी अपनी ही एक खोज है,
जिसने हमारे वजूद पर ग्रहण लगा दिया।
हम ढूंढने निकले थे रौशनी की किरण,
मगर अंधेरों ने हमें ही अपना पता बना लिया।”
― गुनहग़ार
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Amaan
Mar 23, 2026 02:52AM
गुनहग़ार
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