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Amaan Shaikh Quotes

Quotes tagged as "amaan-shaikh" Showing 1-12 of 12
Amaan Shaikh
“सफ़र: घर से घाट तक
जीवन को फिर अब हम त्याग करते हैं,
उनके दिए हर श्राप का तिरस्कार करते हैं।
कोई तुमको खोकर भी तुम्हारी यादों को जोतेगा,
कोई हवा को दोष देगा,
कोई तुमको कोसेगा।
वो त्याग के तुम्हें आग लगाएँगे,
चिता के बुझते ही तुम्हारी
सब घर को लौट जाएँगे।
तेरहवीं पे वो लोग फिर वापस आएँगे,
तुम्हारे जाने की कोई खुशियाँ मना रहा होगा,
तो कई लोग मातम मनाएँगे।
त्यागने के बाद ही सुख है।
यादों की संदूक को तुम्हारी अस्थि के साथ
काशी या गंगा ले जाएँगे,
तुम्हारे अपने लोग ही तुम्हें वहाँ बहाएँगे,
तुम्हें गंगा के प्रवाह के हवाले छोड़ जाएँगे।
किसी को घर लौट जाने की बहुत जल्दी होगी,
एक पहर गुज़र चुका होगा,
सब मोह छूट चुका होगा।
ठिकाना अब तुम्हारा
घर से बदलकर घाट हो चुका होगा,
देह तुम्हारा बदल के
अब राख हो चुका होगा।”
― Amaan Shaikh

Amaan Shaikh
“त्याग"
नाराज़ हैं आप मुझसे,
फ़क़त मेरी कहानी नहीं जानोगे?
धूल को किस्मत समझने की भूल की थी मैंने,
अरे हाँ! आप मुझे ताना तो नहीं मारोगे?

नया सीखते-सीखते अब थक गया हूँ,
मैं कहीं वक़्त में ही अटक गया हूँ।
भूल जाता हूँ हमेशा कि सपने टूटेंगे,
भूल जाता हूँ हमेशा कि लोग छूटेंगे।

पत्ते गिर चुके, पतझड़ का मौसम आ चुका था,
अरमानों की कली खिलने में समय था अभी।

त्याग दिया मैंने खुद को ही, सबको त्यागते-त्यागते,
खो गया मेरा वजूद भी, अपनों को माँगते-माँगते।

दुनिया के रंग देखे तो ज्ञात हुआ, कि सात रंग कम पड़ गए,
स्तब्ध होने की क्या बात थी? अकेले रहने का हुनर तो ज़माने को देख सीख लिया था हमने।

चलो! अब अपनी ही चिता को आग देते हैं,
प्रेम त्याग चुके हम, अब खुद को त्याग देते हैं।

अंतिम पीड़ा ही प्रिय पीड़ा थी,
मगर यह समझने में बहुत देर हो चुकी थी।”
― Amaan Shaikh

Amaan Shaikh
“soug'
लोग कहते घर के बड़े की ज़िंदगी आसान होती,
मगर वो बड़ा ही जाने, ज़िंदगी उसकी श्मशान होती।

ज़िंदा लाश बना कर उनको छोड़ दिया जाता,
सवाल करने पे उनके ख्वाबों को तोड़ दिया जाता।

शौक की उम्र में वो सोग मनाते हैं,
जीते-जी अपने अरमानों की चिता जलाते हैं।

नाकामयाब होने पर उन्हें छोड़ दिया जाता,
शौक छीन कर उनकी कमर को तोड़ दिया जाता।

बोझ तले वो हर पल मरते रहते हैं,
घर वाले छोटों की वाह-वाही करते रहते हैं।

कम कमाने पे इज़्ज़त छीन ली जाती है,
घर से निकालने की धमकी दी जाती है।

बड़ा होने का अफसोस नहीं, खड़े होने पे रोष है,
बड़ा होना भी शायद किस्मत का दोष है।

कौन कहता है माँ-बाप नहीं बदलते,
कौन कहता है माँ-बाप छल नहीं करते।
कम कमाने पे ताना दिया जाता है,
छोटों की प्लेट भरी, बड़ों को बस दाना दिया जाता है।”
― Amaan Shaikh, Iktarfa: imperfectly a perfect failure

Amaan Shaikh
“औलाद"
अच्छी औलाद बनने के लिए, खुद को दफ़नाना होता है,
ज़िंदा होकर भी बस एक 'ज़िंदा लाश' बन जाना होता है।
अपनी चिता को खुद, अपने ही हाथों से आग लगाना होता है।
छोड़कर अपने सभी सपने, उनके सपनों की खातिर मर जाना होता है,

सवाल करने पे हर बार, हमें ही नकार दिया जाता है।
जीते-जी हमारे ही ख्वाबों को, बेरहमी से मार दिया जाता है

अरमानों का उनके बोझ लिए, हम बस चल रहे होते हैं,
हर वक्त घुट-घुट के कोने में, हम बस रोते हैं।

दुख हमारी अपनी ही एक खोज है,
जिसने हमारे वजूद पर ग्रहण लगा दिया।
हम ढूंढने निकले थे रौशनी की किरण,
मगर अंधेरों ने हमें ही अपना पता बना लिया।”
― Amaan Shaikh, गुनहग़ार

Amaan Shaikh
“खुद के लिए वक्त निकाल रहा हूँ,
मैं धूप की घाम से भाग रहा हूँ।
चाँद की ठंडक मुझको अच्छी लगती,
इसीलिए अब रातों को भी जाग रहा हूँ।”
― Amaan Shaikh, Iktarfa: imperfectly a perfect failure

Amaan Shaikh
“मोह तो उस पत्तों से लदे पेड़ को है; यदि मोह न होता, तो वह भी उस सूखे पेड़ की तरह अपने पत्तों को त्याग देता। सत्य तो यह है कि जहाँ मोह है, वहाँ प्रेम का वास नहीं; और जहाँ सच्चा प्रेम है, वहाँ त्याग का भाव स्वतः ही निहित है।”
― Amaan Shaikh, Iktarfa: imperfectly a perfect failure

Amaan Shaikh
“‎ ‎ ‎ ‎ ‎‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ "”
― Amaan Shaikh, Iktarfa: imperfectly a perfect failure

Amaan Shaikh
“۰ افکار؛۔
Andheroُn ka zauq hai٫ Nafs mera faut hai
Ye khushi pakar mujhe sog de,
Zindagi de magar rog de
Bahti meri kasti٫ dooba de ya chhoḌ de
Gham ka haqdar hoon٫ kab se mai bezaar hoon
Beqadra hun ya Faraz hoon٫ falsafa hun ya mahaz nazmo mohtaaz hun
Musa ki ye basti٫ kaafiron ka thikana hai,
Ghar hai Firoun ka٫ khoon se likha ye afsana hai
Majaroُn ka ye daur aafat ki daleel hai
Andar baithe shaitaan bahar wale fakeer hai
Mufliso'n sa haal hai٫ jeena yahan ajaab hai
Tohmat adari ka ajal hai٫ Munafiq hi afzal hai
Nisbat-e-anjaam hai firkon ke Ghulam hai
Andheri unki nagri٫ khuda se anjaan hai”
― Amaan Shaikh, Iktarfa: imperfectly a perfect failure

Amaan Shaikh
“मुझे गुरबते जुनूब की गोद में सर रख कर इंतकाल करना है,
मुझे इस सारे जहाँ में बवाल करना है।
फिर आस्माँ से सितारों को लाकर ज़मीन पे,
मुझे इस ज़मीं को हलाक करना है...
फिर खुद को तबाह-ओ-बर्बाद करना है।
मुझे गुरबते जुनूब की गोद में सर रख कर इंतकाल करना है,
मुझे इस सारे जहाँ में बवाल करना है।”
― Amaan Shaikh, Iktarfa: imperfectly a perfect failure

Amaan Shaikh
“Doobti ek kasti ka hissa hoon
main bas Iktarfa sa ek qissa hoon —”
― Amaan Shaikh , Iktarfa: imperfectly a perfect failure

Amaan Shaikh
“Faqat har cheez paayi nahin ja sakti,
Wo kabhi yaadon se mitayi nahin ja sakti.
Kaffara-e-mohabbat ka silsila chalu hai shayad,
Gham-e-mehfil mein koi saadgi se thukraya nahin ja sakta
Ilzaam-e-mohabbat ka gunahgaar ban chuka hoon,
Giraft to nahin magar qaid ho gaya hoon.
Aayega ek din jab mohabbat-e-nafs ka janaza niklega,
Mar chuka hoga ek shakhs, kahin uski giraftari ka taqaza niklega.”
― Amaan Shaikh, Iktarfa: imperfectly a perfect failure

Amaan Shaikh
“(क़फ़स और परवाज़)"قفس اور پرواز"
आज़ाद उस परिंदे की नज़र से अगर देख पाते,
तो जान जाते मैं क्या सोचता हूँ...

मुसाफ़िर होते, तो समझ जाते
ख़ुद से भटकना कैसा है...

खिड़की से बाहर, हदों के उस पार अगर तुम देख पाते,
तो शायद समझ जाते मैं क्या सोचता हूँ...

उन परिंदों के तराने सुन पाते,
तो शायद समझ जाते मैं क्या सोचता हूँ...

ज़िंदा होते, तो समझ पाते
आज़ाद होना कैसा है...

कैद होकर भी आज़ादी के गीत गाते,
तो शायद महसूस कर पाते,
मैं क्या सोचता हूँ...

by Amaan Shaikh”
― Amaan Shaikh, Iktarfa: imperfectly a perfect failure