“उनकी प्रार्थना से सनक कुमार जी करुणा से भर गए और उन्होंने कहा कि मैना हिमाचल की पत्नी बनकर पार्वती को जन्म देगी और धन्या से जनक के यहां सीता का जन्म होगा और वृषभानु से विवाह करके कलावती राधा को जन्म देगी। अपनी इन पुत्रियों के कारण ही तुम अपना उद्धार करके स्वर्ग में लौट सकोगी।”
― Shiv Puran
― Shiv Puran
“प्राणायाम को सर्वोत्तम सात्त्विक तप कहा गया है।”
― Shiv Puran
― Shiv Puran
“तप के तीन प्रकार हैं—सात्त्विक, राजसिक, और तामसिक। निष्काम भाव और हित से किया गया तप सात्त्विक होता है। सात्त्विक के अंतर्गत ही पूजा व्रत, दया, कूप, वापी बनवाना है। इससे संपूर्ण फलों की प्राप्ति होती है।”
― Shiv Puran
― Shiv Puran
“माता के गर्भ में ही जीव को अपने अनेक जन्मों के स्मरण से सुख-दु:ख होता रहता है और बाहर आने पर भी वह इस दुःख और सुख से भरा होता है और इस संसार में रमण करता है। माता के गर्भ से बाहर आकार वह गर्भ-यंत्र की पीड़ा से तो मुक्त हो जाता हैं लेकिन संसार के मोह में पड़ जाता है। उसकी पूर्व स्मृति नष्ट हो जाती है।”
― Shiv Puran
― Shiv Puran
“साक्षात् महेश्वर ही प्रणव हैं। इस प्रणव के छः प्रकार के अर्थ हैं! मंत्ररूप, मंत्रभाव, प्रपंचा, वेदार्थ, रूप तथा शिष्य के अनुरूप। और ये सब एक महेश्वरी माने जाते हैं। शिवजी की पांच मूर्तियां इसीसे निर्दिष्ट होती हैं जो पंचमुख शिव की होती हैं। यही प्रणव आकाश का अधिपति सदाशिव समष्टि रूप और सर्व सामर्थ्यवान है।ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र और महेश्वर ये चारों भिन्न-भिन्न रूप इसी प्रणव की समष्टि हैं। महेश्वर के सहस्त्र अंश से रूद्र मूर्ति उत्पन्न हुई है और जैसा की अनेक प्रसंगों में बताया गया है यही सृष्टि जन्म के रूप में ब्रह्मा, पालन कर्ता के रूप में विष्णु और विनाश के समय रूद्र होते हैं। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध ये चार विख्यात नाम भी व्यूह रूप ही हैं।”
― Shiv Puran
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