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“मैं ही पुरातन पुरुष हूं, सबका नियंता हूं और मुझसे भिन्न कोई नहीं। न कोई मुझसे बड़ा है और न मेरे समान। यह कहकर रूद्र अंतर्ध्यान हो गए और इससे देवता घबरा गए। देवताओं ने उनकी स्तुति की तब प्रसन्न होकर शिवजी पार्वती सहित देवताओं के सामने प्रकट हुए। तब देवताओं ने उनसे पूछा कि हे भगवन्! आप यह बताएं कि आपकी पूजा की विधि क्या है और आप किस प्रकार प्रसन्न होते हैं और आपकी पूजा का अधिकार किस-किसको है। इस पर शिवजी ने पार्वती की ओर देखा और देवताओं को अपना सर्व तेजमय, सर्वगुण संपन्न आठ बांहों वाला तथा चार मुख वाला स्वरुप दिखाया। देवताओं ने उनके तेज को अनुभव किया तथा महादेव को सूर्य और महेश्वरी को चंद्रमा समझकर उन दोनों की आराधना की। इसके बाद सूर्य मंडल में स्थित शिव ने देवताओं को सारा ज्ञान समझाकर स्वयं को अंतर्निहित कर लिया। उस ज्ञान से तीन द्विजाति—ब्राम्हण, क्षत्रिय और वैश्य को पूजा का अधिकार जानकर देवता लोग स्वर्ग को चले गए। इससे यह सिद्ध होता है कि शूद्रों को शिव की पूजा का अधिकार नहीं। बहुत समय के बाद जब वह शस्त्र विलुप्त हो गया तो परमेश्वरी ने चंद्रभक्ति को कहकर उसे पुनः प्रकट कराया और इस शास्त्र को मैंने अगस्त्य और इस दधीचि से जाना। फिर हमसे वसिष्ठ आदि मुनियों ने यह ज्ञान प्राप्त किया। इसी परंपरा में योगाचार्य व्यासजी का अवतार हुआ।”
― Shiv Puran
― Shiv Puran
“तप के तीन प्रकार हैं—सात्त्विक, राजसिक, और तामसिक। निष्काम भाव और हित से किया गया तप सात्त्विक होता है। सात्त्विक के अंतर्गत ही पूजा व्रत, दया, कूप, वापी बनवाना है। इससे संपूर्ण फलों की प्राप्ति होती है।”
― Shiv Puran
― Shiv Puran
“पंचभूत जब गुण ग्रहण करते हैं तो जन्म होता है और जब गुणों का त्याग करते हैं तो मृत्यु होती है। योगी जब अपनी तर्जनियों से अपने दोनों कान बंद करते हैं तो उन्हें एक अग्नि प्रेरित तुंकार शब्द सुनाई देता है यह शब्द सुनकर योगी मृत्यु को जीत लेता है।”
― Shiv Puran
― Shiv Puran
“शिव का रूद्र नाम इसलिए पड़ा कि वे दु:ख-सुख को दूर करने वाले हैं। उन्हें पितामह इसलिए कहा जाता है कि वे मूर्तिमान पिता हैं और उनकी सदा से विष्णु नाम की संज्ञा सर्वव्यापक होने के कारण है। वे सर्वज्ञ हैं और किसी अन्य आत्मा के अधीन नहीं, इसलिए परमात्मा हैं।”
― Shiv Puran
― Shiv Puran
“वायु को भीतर रोकने का नाम प्राणायाम है और यह बहुत शक्तिमान प्रक्रिया है। जब मनुष्य वायु को भीतर रोकता है वह दीपक की तरह बाहर और भीतर प्रकाश करती है। ध्यान में तत्पर योगी परम धाम को पहुंचकर वहां से लौटता नहीं। प्राणायाम का दूसरा रूप एकांत में चंद्रमा अथवा सूर्य से प्रकाशित प्रदेश को निरालस्य होकर भृकुटियों के बीच देखना और हाथ की उंगलियों से नेत्रों को बंद कर पलभर ध्यान में तत्पर रहना है।”
― Shiv Puran
― Shiv Puran
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