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“न सूरत, न शकल, पर फिर भी लापरवाही से उसकी आँचल की स्मरध्वजा-सी फहराने की भंगिमा, परिपाटी से बाँधा गया जूड़ा, जूड़े पर लगा बेल का दक्षिणी गजरा, सुडौल मराल ग्रीवा में काले डोर से बँधी सोने की तबिजिया, छन्दमयी गति और बंकिम स्मित देख कोई भी नहीं कह सकता था”
― रतिविलाप
― रतिविलाप
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