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“Don't know what hurts me more, talking or not talking to him.”
Shivani
“केवल शरीर की व्याधि ही नहीं, मन की व्याधि भी माँ को धीरे-धीरे घुला रही”
Shivani, श्मशान चंपा
“दुर्भाग्य के विष को कंठ ही में घुटक,”
Shivani, श्मशान चंपा
“न सूरत, न शकल, पर फिर भी लापरवाही से उसकी आँचल की स्मरध्वजा-सी फहराने की भंगिमा, परिपाटी से बाँधा गया जूड़ा, जूड़े पर लगा बेल का दक्षिणी गजरा, सुडौल मराल ग्रीवा में काले डोर से बँधी सोने की तबिजिया, छन्दमयी गति और बंकिम स्मित देख कोई भी नहीं कह सकता था”
Shivani, रतिविलाप
“जब पति का हाथ एक बार पत्नी पर उठने लगता है, तो फिर रुकता नहीं । मारने की आदत पड़ जाती है”
Shivani, अतिथि
“समुद्रतट के एकान्त से बढ़कर और कोई एकान्त हो नहीं सकता।”
Shivani, रतिविलाप
“अल्हड़ लुनाई”
Shivani, मधुयामिनी
“मृतवत्सा गाय-सी ही रंभाने को व्याकुल हो उठी थी,”
Shivani, श्मशान चंपा
“आपादमस्तक अलंकृता जया को वह देखती सोचने लगी । क्या चाचा जी ने इस निर्दोष अनजान लड़की को, अपने उद्धत-उद्दंड पुत्र के सजीले पौरुष का चुग्गा बिखेरकर ही सोने के पिंजरे में सिर मारने के लिए बंदिनी बना लिया था ? सुना तो यही था कि लड़की ने स्वयं ही कार्तिक को पसंद कर, अपनी स्वीकृति दी थी। पर बेचारी का क्या दोष? क्या उसने भी यही नहीं किया था ? यही तो इस घर के सुदर्शन राजपुत्रों की खासियत थी ? विष से भरे ऐसे ही एक स्वर्णघट को उसने भी तो स्वेच्छा से तृषार्त अधरों पर सटाया या ।”
Shivani, अतिथि
“काफल के पेड़ पर पहाड़ी चिड़िया जूँहो टहूकती है, ‘जूँहो-जूँहो’ और दूसरी चिड़िया ठीक स्वर से स्वर मिलाकर उत्तर देती हैं—‘भोल, भोल, भोल,”
Shivani, मधुयामिनी
“हाथ बाँधे वे दीन-हीन याचक की मुद्रा में वर के पिता के सम्मुख नतजानु खड़े एक ही बात दोहरा रहे थे, "क्षमा करें”
Shivani, कालिंदी
“सुदूर नैनादेवी के मन्दिर की ठुनकती घंटियाँ, और अंयार की वह अनोखी बयार,”
Shivani, मधुयामिनी
“सतर कंधे, भोला सा चेहरा, लाल टीका और शिथिल कवरी, न चेहरे पर प्रसाधन की भ्रामक भूमिका, न कटीले भ्रूभंग में विलास”
Shivani, अतिथि
“लड़की न हो गई गाय हो गई । जिस कसाई का जी चाहे, दाम चुकाए और ले जाए ।”
Shivani, अतिथि
“जानती है चड़ी,”
Shivani, कालिंदी
“किसी रक्षिता”
Shivani, अतिथि
“आनन्दी रसीले अधरों”
Shivani, अतिथि
“एक पल को उस विकृत हँसी के स्वर ने चंपा को सहमा दिया ।”
Shivani, श्मशान चंपा
“शुभ कार्य में विघ्न डालने वालों का संसार में कभी अभाव नहीं”
Shivani, श्मशान चंपा
“निशीथश्यामल स्निग्ध संथाल किशोरी”
Shivani, श्मशान चंपा
“समुद्र की फेनोज्जल उद्धत तरंगों का औद्धत्य यहाँ सबसे अधिक अनुशासनहीन हो जाता”
Shivani, रतिविलाप
“सुनहली पिरुल घास पर स्केट-सा करती चली जा रही थी। यह था स्वयं प्रकृति का बनाया एस्कलेटर एक कदम रखो और सर्र से नीचे पहुँच जाओ। न जाने कौन-सी अनामा वेगवती नदी थी वह। "पहाड़ की नदियों के नाम नहीं होते री," पूछने पर मामा ने बताया, "बस, गाड़ कहते है। कोई कोसी की गाड़ है, कोई सुवाल की तो कोई अलकनन्दा की।”
Shivani, कालिंदी
“जितना ही उग्र नलिनी का क्रोध होता, उतनी ही शान्त निरुद्वेग रहती थी उसकी दृष्टि और उतना ही संयत रहता था उसका आचरण।”
Shivani, कस्तूरी मृग
“धूमधाम से सत्यनारायण की कथा भी सुनी जा चुकी थी । उज्जैन के महाकाल में महामृत्युंजय का जय तो चल ही रहा था । शहर के प्रसिद्ध तान्त्रिक अघोरानन्द धूनी जमाकर दस दिनों से महायज्ञ करा रहे थे । माधव बाबू की पाँचों अँगुलियों में भाग्यविरोधी कष्टकारी मारक ग्रहों से जूझने विभिन्न रत्नों की अँगुठियाँ जगमगाने लगी थी”
Shivani, अतिथि
“विवेकतुला”
Shivani, अतिथि
“वयःसन्धि की ऊँची-नीची देहरी पर खड़ा उसका किशोर देवर”
Shivani, श्मशान चंपा
“बालसुलभ कौतूहल से तरल दृष्टि”
Shivani, श्मशान चंपा
“वर्षा के मेघ-सी सजल आँखें”
Shivani, अतिथि
“वह नहीं जानता था कि प्रत्येक सांसारिक वस्तु में विधाता अदृश्य प्राइस टैग लगाकर धरे रहता है । मान-सम्मान, प्रेम, मैत्री सब कुछ पाने के लिए, पहले कुछ-न-कुछ देना पड़ता है। इस संसार में बिना पल्ले का खरचे, कुछ जुटता नहीं फिर यह तो वह देश है जहाँ श्मशान घाट में चिता की लकड़ियों का भी मोल-भाव चलता है ।”
Shivani, अतिथि
“ऐसी मृत्युंजयी औषधियाँ जो तुम्हें ढूँढने पर भी तुम्हारी अंग्रेजी डाक्टरी पोथों में नहीं मिलेंगी। सुनेगी? तब सुन-लौह, तुवरक, मल्लातक, बाकुची, गुग्गुल और चित्रक! और फिर माणीभद्र वटक योग का विधान यानी रोगियों को एक-एक पक्ष पर वमन, एक-एक महीने में विरेचन और तीन-तीन दिन पर शिरोविरेचन, फिर छः-छः महीने पर रक्तमोक्षण।”
Shivani, कालिंदी

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