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जयशंकर प्रसाद
“मेघ-संकुल आकाश की तरह जिसका भविष्य घिरा हो, उसकी बुद्धि को तो बिजली के समान चमकना ही चाहिये।”
जयशंकर प्रसाद, ध्रुवस्वामिनी

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