ध्रुवस्वामिनी Quotes
ध्रुवस्वामिनी
by
जयशंकर प्रसाद176 ratings, 4.05 average rating, 9 reviews
ध्रुवस्वामिनी Quotes
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“मेघ-संकुल आकाश की तरह जिसका भविष्य घिरा हो, उसकी बुद्धि को तो बिजली के समान चमकना ही चाहिये।”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“देवि, जीवन विश्व की सम्पत्ति है। प्रमाद से, क्षणिक आवेश से, या दुःख की कठिनाइयों से उसे नष्ट करना ठीक तो नहीं।”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“किंतु, राजनीति का प्रतिशोध, क्या एक नारी को कुचले बिना पूरा नहीं हो सकता?”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“संसार में बहुत-सी बातें बिना अच्छी हुए भी अच्छी लगती हैं और बहुत-सी अच्छी बातें बुरी मालूम पड़ती हैं।”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“अभावमयी लघुता में मनुष्य अपने को महत्वपूर्ण दिखाने का अभिनय न करे तो क्या अच्छा नहीं है?”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“सौभाग्य और दुर्भाग्य मनुष्य की दुर्बलता के नाम हैं। मैं तो पुरुषार्थ को ही सबका नियामक समझता हूँ! पुरुषार्थ ही सौभाग्य को खींच लाता है।”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“प्रश्न स्वयं किसी के सामने नहीं आते। मैं तो समझती हूँ, मनुष्य उन्हें जीवन के लिए उपयोगी समझता है। मकड़ी की तरह लटकने के लिए अपने-आप ही जाला बुनता है।”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“यौवन! तेरी चंचल छाया
इसमें बैठ घूँट भर पी लूँ जो रस तू है लाया
मेरे प्याले में मद बनकर कब तू छली समाया
जीवन-वंशी के छिद्रों में स्वर बनकर लहराया
पल भर रुकने वाले! कह तू पथिक! कहाँ से आया?”
― ध्रुवस्वामिनी
इसमें बैठ घूँट भर पी लूँ जो रस तू है लाया
मेरे प्याले में मद बनकर कब तू छली समाया
जीवन-वंशी के छिद्रों में स्वर बनकर लहराया
पल भर रुकने वाले! कह तू पथिक! कहाँ से आया?”
― ध्रुवस्वामिनी
“जीवन विश्व की सम्पति है। प्रमाद से, क्षणिक आवेश से, या दु:ख की कठिनाइयों से उसे नष्ट करना ठीक तो नहीं।”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“यह कसक अरे आँसू सह जा।
बनकर विनम्र अभिमान मुझे
मेरा अस्तित्व बता, रह जा।
बन प्रेम छलक कोने-कोने
अपनी नीरव गाथा कह जा।
करुणा बन दुखिया वसुधा पर
शीतलता फैलाता बह जा।”
― ध्रुवस्वामिनी
बनकर विनम्र अभिमान मुझे
मेरा अस्तित्व बता, रह जा।
बन प्रेम छलक कोने-कोने
अपनी नीरव गाथा कह जा।
करुणा बन दुखिया वसुधा पर
शीतलता फैलाता बह जा।”
― ध्रुवस्वामिनी
“वीरता जब भागती है, तब उसके पैरों से राजनीतिक छल-छंद की धूल उड़ती है।”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“मेघ-संकुल आकाश की तरह जिसका भविष्य घिरा हो, उसकी बुद्धि को तो बिजली के समान चमकना ही चाहिए।”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“मनुष्य के हृदय में देवता को हटाकर राक्षस कहाँ से घुस आता है?”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“मैंने प्रेम किया था। ध्रुवस्वामिनी : इस घोर अपराध का तुम्हें क्या दंड मिला? कोमा : वही, जो स्त्रियों को प्राय: मिला करता है—निराशा, निष्पीड़न और उपहास!”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“स्त्रियों को धर्म-बंधन में बाँधकर, उनकी सम्मति के बिना आप उनका सब अधिकार छीन लेते हैं, तब क्या धर्म के पास कोई प्रतिकार–कोई संरक्षण नहीं रख छोड़ते, जिससे वे स्त्रियाँ अपनी आपत्ति में अवलंब माँग सकें? क्या भविष्य के सहयोग की कोरी कल्पना से उन्हें आप संतुष्ट रहने की आज्ञा देकर विश्राम ले लेते हैं?”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“धूमकेतु! आकाश का उच्छृंखल पर्यटक! नक्षत्रलोक का अभिशाप!”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“हम लोग अखरोट की छाया में बैठेंगे–झरनों के किनारे, दाख के कुंजों में विश्राम करेंगे। जब नीले आकाश में मेघों के टुकड़े, मान-सरोवर जाने वाले हंसों का अभिनय करेंगे, तब तू अपनी तकली पर ऊन कातती हुई कहानी कहेगी और मैं सुनूँगा।”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“जिसे अपने आँसुओं से सींचा, वही दुलार भरी वल्लरी, मेरे आँख बंद कर चलने में मेरे ही पैरों से उलझ गई है। दे दूँ एक झटका–उसकी हरी-हरी पत्तियाँ कुचल जाएँ और वह छिन्न-भिन्न होकर धूल में लोटने लगें? न, ऐसी कठोर आज्ञा न दो!”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“हम लोगों को लताओं, वृक्षों और चट्टानों से छाया और सहानुभूति मिलेगी।”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“इस भीषण संसार में एक प्रेम करने वाले हृदय को खो देना, सबसे बड़ी हानि है। शकराज! दो प्यार करने वाले हृदयों के बीच स्वर्गीय ज्योति का निवास होता है।”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“स्त्रियों का स्नेह-विश्वास भंग कर देना, कोमलतंतु को तोड़ने से भी सहज है, परंतु सावधान होकर उसके परिणाम को भी सोच लो।”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“तुम्हारी स्नेह-सूचनाओं की सहज प्रसन्नता और मधुर आलापों ने जिस दिन मन के नीरस और नीरव शून्य में संगीत की, वसंत की और मकरंद की सृष्टि की थी, उसी दिन से मैं अनुभूतिमयी बन गई हूँ।”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“पाषाणी के भीतर भी कितने मधुर स्रोत बहते रहते हैं। उनमें मदिरा नहीं, शीतल जल की धारा बहती है।”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“प्रश्न स्वयं किसी के सामने नहीं आते। मैं तो समझती हूँ, मनुष्य उन्हें जीवन के लिए उपयोगी समझता है। मकड़ी की तरह लटकने के लिए अपने-आप ही जाला बुनता है। जीवन का प्राथमिक प्रसन्न उल्लास मनुष्य के भविष्य में मंगल और सौभाग्य को आमंत्रित करता है। उससे उदासीन न होना चाहिए,”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
“प्रणय! प्रेम! जब सामने से आते हुए तीव्र आलोक की तरह आँखों में प्रकाश-पुंज उँडेल देता है, तब सामने की सब वस्तुएँ और भी अस्पष्ट हो जाती हैं।”
― ध्रुवस्वामिनी
― ध्रुवस्वामिनी
