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जयशंकर प्रसाद जयशंकर प्रसाद > Quotes

 

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“चक्र! ऐसा जीवन तो विडंबना है, जिसके लिये रात-दिन लड़ना पड़े!”
जयशंकर प्रसाद, स्कंदगुप्त
“मृत्यु जब तक कल्पना की वस्तु रहती है, तब तक चाहे उसका जितना प्रत्याख्यान कर लिया जाय; परन्तु यदि वह सामने हो?”
जयशंकर प्रसाद, कंकाल
“मनुष्य, दूसरों को अपने मार्ग पर चलाने के लिए रुक जाता है, और अपना चलना बन्द कर देता है।”
Jaishankar Prasad, चन्द्रगुप्त
“मेघ-संकुल आकाश की तरह जिसका भविष्य घिरा हो, उसकी बुद्धि को तो बिजली के समान चमकना ही चाहिये।”
जयशंकर प्रसाद, ध्रुवस्वामिनी
“देवि, जीवन विश्व की सम्पत्ति है। प्रमाद से, क्षणिक आवेश से, या दुःख की कठिनाइयों से उसे नष्ट करना ठीक तो नहीं।”
जयशंकर प्रसाद, ध्रुवस्वामिनी
“निद्रा भी कैसी प्यारी वस्तु है। घोर दु:ख के समय भी मनुष्य को यही सुख देती है।”
जयशंकर प्रसाद [Jaishankar Prasad], जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां
“विजया! आकाश के सुंदर नक्षत्र आंखों से केवल देखे जाते हैं, वे कुसुम-कोमल हैं कि वज्र-कठोर -- कौन कह सकता है।”
जयशंकर प्रसाद, स्कंदगुप्त
“पारिवारिक सुखों से लिपटा हुआ, प्रणय-कलह देखूँगा; मेरे दायित्व-विहीन जीवन का वह मनोविनोद होगा।”
जयशंकर प्रसाद [Jaishankar Prasad], जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां
“भेंटता अंतिम अरुण आलोक-वैभव-हीन।”
जयशंकर प्रसाद, कामायनी
“नीरवता की गहराई में मग्न अकेले रहते थे।”
जयशंकर प्रसाद, कामायनी
“वे कहानियाँ प्रेम से अतिरंजित थीं, स्नेह से परिलुप्त थीं, आदर से आर्द्र थीं, सबको मिलाकर उनमें एक आत्मीयता थी—हृदय की वेदना थी, आँखों का आँसू था!”
जयशंकर प्रसाद, कंकाल
“प्रेमी”
जयशंकर प्रसाद, कंकाल
“मित्र मान लेने पर मनुष्य उससे शिव के समान आत्म- त्याग, बोधिसत्व के सदृश सर्वस्व समर्पण की जो आशा करता है और उसकी शक्ति की सीमा को प्राय: अतिरंजित देखता है।”
जयशंकर प्रसाद [Jaishankar Prasad], जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां
“तुम कौन ॐ हृदय की परवशता? सारी स्वतंत्रता छीन रही, स्वच्छंद सुमन जो खिले रहे जीवन-वन से ही बीन रही”
जयशंकर प्रसाद, कामायनी
“हृदय का आनंद-कूजन लगा करने रास। गिर रहीं पलकें, झुकी थी नासिका की नोक, भ्रूलता थी कान तक चढती रही बेरोक। स्पर्श करने लगी लज्जा ललित कर्ण कपोल, खिला पुलक कदंब सा था भरा गद्‌गद् बोल।”
जयशंकर प्रसाद, कामायनी
“सुख को सीमित कर अपने में केवल दुख छोडोगे, इतर प्राणियों की पीडा लख अपना मुँह मोडोगे, ये मुद्रित कलियाँ दल में सब सौरभ बंदी कर लें, सरस न हों मकरंद बिंदु से खुल कर, तो ये मर लें —”
जयशंकर प्रसाद, कामायनी
“कंगाल को सोने से नहला दिया; पर उसका कोई तत्काल फल न हुआ—मैं समझता हूँ वह सुखी न हो सकी। सोने की परिभाषा कदाचित् सबके लिए भिन्न-भिन्न हो! कवि कहते हैं—सेवेरे की किरणें सुनहली हैं, राजनीति-विशारद्—सुन्दर राज्य को, सुनहला शासन कहते हैं। प्रणयी यौवन में सुनहरा पानी देखते हैं, और माता अपने बच्चे के सुनहले बालों के गुच्छों पर सोना लुटा देती है। यह कठोर, निर्दय, प्राणहारी पीला सोना ही तो सोना नहीं है।”
जयशंकर प्रसाद, कंकाल
“और हँसता था अतिथि मनु का पकडकर हाथ, चले दोनों स्वप्न-पथ में, स्नेह-संबल साथ।”
जयशंकर प्रसाद, कामायनी
“सब”
जयशंकर प्रसाद, कंकाल
“किन्तु न आया वह परदेसी-युग छिप गया प्रतीक्षा में,”
जयशंकर प्रसाद, कामायनी
“प्रकृति के यौवन का श्रृंगार करेंगे कभी न बासी फूल,”
जयशंकर प्रसाद, कामायनी
“महाराज! न्यायधिकरण पिता-सम्बोधन से पक्षपाती हो जायगा।”
जयशंकर प्रसाद, चन्द्रगुप्त
“मसृण, गांधार देश के नील रोम वाले मेषों के चर्म, ढँक रहे थे उसका वपु कांत बन रहा था वह कोमल वर्म। नील परिधान बीच सुकुमार खुल रहा मृदुल अधखुला अंग, खिला हो ज्यों बिजली का फूल मेघवन बीच गुलाबी रंग। आह वह मुखॐपश्चिम के व्योम बीच जब घिरते हों घन श्याम, अरुण रवि-मंडल उनको भेद दिखाई देता हो छविधाम।”
जयशंकर प्रसाद, कामायनी
“एक यवनिका हटी, पवन से प्रेरित मायापट जैसी। और आवरण -मुक्त प्रकृति थी हरी-भरी फिर भी वैसी।”
जयशंकर प्रसाद, कामायनी
“कार्नेलियया : नहीं चन्द्रगुप्त मुझे इस देश में जन्मभूमि के समान स्नेह होता जा रहा है। यहाँ के श्यामल-कुंज, घने जंगल सरिताओं की माला पहने हुए शैल-श्रेणी, हरी-भरी वर्षा, गर्मी की चाँदनी, शीत-काल की धूप, और भोले कृषक तथा सरला कृषक-बालिकाएँ, बाल्यकाल की सुनी हुई कहानियों की जीवित प्रतिमाएँ है। यह स्वप्नो का देश, यह त्याग और ज्ञान का पालना, यह प्रेमकी रंगभूमि—भारतभूमि क्या भुलायी जा सकती है? कदापि नहीं। अन्य देश मनुष्यों की जन्म-भूमि है; यह भारत मानवता की जन्मभूमि है।”
जयशंकर प्रसाद, चन्द्रगुप्त
“कुटिल कुंतल से बनाती कालमाया जाल— नीलिमा से नयन की रचती तमिस्रा माल। नींद—सी दुर्भेद्य तम की, फेंकती यह दृष्टि, स्वप्न—सी है बिखर जाती हँसी की चल-सृष्टि। हुई केंद्रीभूत—सी है साधना की स्फूर्त्ति, दृढ-सकल सुकुमारता में रम्य नारी-मूर्त्ति।”
जयशंकर प्रसाद, कामायनी
“अरी व्याधि की सूत्र-धारिणी -अरी आधि, मधुमय अभिशापॐ”
जयशंकर प्रसाद, कामायनी
“उसकी रहस्यपूर्ण उदासीन मुखकान्ति विजय के अध्ययन की वस्तु बन रही थी।”
जयशंकर प्रसाद, कंकाल
“वर्त्तमान जीवन के सुख से योग जहाँ होता है,”
जयशंकर प्रसाद, कामायनी
“कोहनूर का सीसफूल गजमुक्ताओं की एकावली बिना अधूरा है,”
जयशंकर प्रसाद, कंकाल

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तितली तितली
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