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विकास 'अंजान'
विकास 'अंजान' is on page 38 of 99
मन में एक बात उठी और गिरी, उठी और गिरी। बार-बार गिराया गया, लेकिन फिर फिर वह उठ आती है।
Sep 23, 2020 07:09PM Add a comment
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विकास 'अंजान'
विकास 'अंजान' is on page 19 of 99
"तुम इसका क्या करोगी?"
"कुछ भी करें!"
"आखिर क्या?"
"फाड़ दूँगी!"
"अरे, नहीं, नहीं!"
किताब को दोनों हाथों में पकड़कर लड़की ने कहा-
"देखो, यह फाड़ी, यह! फाड़ूँ?"
"फाड़ती हूँ!"
"नहीं, देखो, नहीं!"
लड़की ने देखा मास्टर साहब से यह नहीं होता कि उससे किताब छीन लें। यही तो वह चाहती है। उसने कहा, "मैं तो फाड़ती हूँ।"
मास्टरजी ने देखा, लड़की के हाथ जैसे सचमुच किताब के साथ जोर कर रहे हैं। वह उसकी तरफ झपटे।
Sep 23, 2020 05:47PM Add a comment
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