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Vinod Kumar Shukla Vinod Kumar Shukla > Quotes

 

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“रघुवर प्रसाद का आकाश देखना रघुवर प्रसाद का चिठ्ठी लिखना होगा। चंद्रमा सोनसी के लिए लिखा हुआ संबोधन होगा। तारो की लिपि होगी जिसे तत्काल सोनसी पढ़ लेगी। रघुवर प्रसाद कसौटी के पत्थर पर लेटकर एक बड़ा आकाश देखेंगे। बड़ा आकाश लंबी चिठ्ठी होगी। सोनसी खिड़की से छोटा आकाश देखेगी तो छोटी चिठ्ठी होगी। आकाश एक दूसरे को लिखी चिठ्ठी होगी।
दरवाजा खोलकर आकाश देख लेते थे, सोनसी की चिठ्ठी है। सोनसी भी देख लेती होगी की रघुवर प्रसाद की चिठ्ठी है। कभी आकाश में बहुत सारे तारे होते। कभी इक्के दुक्के दिखाई देते। इक्के दुक्के तारों का आकाश लिखने का समय नही मिला जैसा या थोड़ी थोड़ी लिखी जा रही चिठ्ठी जैसा था।”
Vinod Kumar Shukla, दीवार में एक खिड़की रहती थी
“प्रेम के सुख में
पलक मूंद लेने का अंधकार है|

- प्रेम की जगह अनिश्चित है”
Vinod Kumar Shukla, सब कुछ होना बचा रहेगा
tags: love
“यह चेतावनी है
कि एक छोटा बच्‍चा है.
यह चेतावनी है
कि चार फूल खिले हैं.
यह चेतावनी है
कि खुशी है
और घड़े में भरा हुआ पानी
पीने के लायक है,
हवा में सॉंस ली जा सकती है.
यह चेतावनी है
कि दुनिया है
बची दुनिया में
मैं बचा हुआ
यह चेतावनी है
मैं बचा हुआ हूं.
किसी होने वाले युद्ध से
जीवित बच निकलकर
मैं अपनी
अहमियत से मरना चाहता हूं
कि मरने के
आखिरी क्षणों तक
अनंतकाल जीने की कामना करूं
कि चार फूल है
और दुनिया है”
Vinod Kumar Shukla, सब कुछ होना बचा रहेगा
“फिर साहब ने मँहगू से गम्भीर होकर कहा, “तुम दोनों कमीज पहनने में सन्तू की सहायता करो।” “जी साहब!” बड़े बाबू तुरन्त बोले। “सर, मैं कमीज नहीं पहनूँगा। बुश्शर्ट तो मैं पहना हूँ।” बोलते-बोलते मेरी जबान लड़खड़ा रही थी। तब तक बड़े बाबू ने मेरा हाथ पकड़ लिया था। मँहगू चौकस होकर मेरे पास आ गया। “सन्तू बाबू का चेहरा कितना लाल हो गया है सर! इनके हाथ-पैर भी काँप रहे हैं। पसीना-पसीना हो रहे हैं।” बड़े बाबू ने कहा। “इसमें परेशानी की क्या बात है?” साहब ने आश्चर्य से कहा। क्या मैं डर रहा था? मेरी हथेलियाँ पसीने से तर हो गई थीं। हाथ-पैर काँप रहे थे। मैं जोर लगाकर कँपकँपाहट को रोकना चाहता था। क्या मैं बच नहीं सकता था? मैंने सड़क की तरफ देखा। केवल इक्का-दुक्का लोग दिख रहे थे। तभी बड़े बाबू ने और मजबूती से मेरा हाथ पकड़ लिया। मुझे तिल्ली के तेल की गंध आई। मँहगू का तेल से चुपड़ा सिर मेरे पास आ गया था। यद्यपि वह मेरे पीछे खड़ा था, पर मैं जानता था कि थोड़ा भी मैं हिलूँगा तो यह सोचकर कि मैं भागनेवाला हँू, वह मुझे पूरी ताकत से जकड़ लेगा। बड़े बाबू ने मेरा हाथ न भी पकड़ा होता तब भी कैंटीन के लड़के की तरह भागने की मुझमें हिम्मत नहीं थी। इसका कारण यह होगा कि मुझमें समझदारी थी। इस समझदारी के कारण मैंने सोच लिया था कि मैं बच नहीं सकता। समझदारी से आत्मसमर्पित-जैसी मेरी स्थिति हो गई थी। अदब और कायदे आदमी को बहुत जल्दी कायर बना देते हैं। ऐसा आदमी झगड़ा नहीं करता। फिर”
Vinod Kumar Shukla, नौकर की कमीज
“बहस करने की महावीर को आदत थी। बल्कि अपनी बात कहने की आदत थी, जो बहस की तरह होती थी।”
Vinod Kumar Shukla, नौकर की कमीज
“एक अच्छा नौकर परिवार में नौकर की तरह शामिल रहता था। जैसे परिवार में कौन है? तो, पति-पत्नी, दो लड़के, एक लड़की और एक नौकर। यह आदर्श परिवार था।”
Vinod Kumar Shukla, नौकर की कमीज
“भीख माँगनेवाले और रईस कोई काम नहीं करते।”
Vinod Kumar Shukla, नौकर की कमीज
“रात के बीतने से जाता हुआ अँधेरा शायद हांथी के आकार में छूट गया था. ज्यों ज्यों सुबह होगी हांथी के आकार का अँधेरा हांथी के आकार की सुबह होकर बाकी सुबह में घुलमिल जाएगा.”
विनोद कुमार शुक्ल
“मालकिन की आदत होती है कि घर में यदि कोई चीज बनती है तो उसमें से थोड़ा नौकरानी को जरूर चखा दिया जाता है। रोजमर्रा की चीजों को चखाने का काम नहीं किया जाता—चाहे वह कितनी भी बढ़िया चीज क्यों न हो। वह देखनेवालों के मन में लालच नहीं पैदा करता। उसे देखने की आदत पड़ जाती है। कोई चीज चखा दी जाती है तो उसकी ललचाई दृष्टि और उस चीज के बीच में एक परदा पड़ जाता है। तब खानेवाला पूरे सन्तोष के साथ पेट भरकर खा सकता है, नहीं तो खाने में मजा नहीं आता।”
Vinod Kumar Shukla, नौकर की कमीज

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