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Piyush Mishra Piyush Mishra > Quotes

 

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“क्या बयां कर पाऊँगा...! कह सका जो मैं नहीं इस इक सदी की रात में अल़्फाज़ टूटे-से हुए गुम इक जु़बां की बात में... बस सब्र ये ही है कि आख़िर तुम तलक तो जाएगी फिर कौन किस को कब कहाँ मैं क्या बता ही पाऊँगा...”
Piyush Mishra, Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“वो काम भला क्या काम हुआ जो मजा नहीं दे व्हिस्की का वो इश्क़ भला क्या इश्क हुआ जिसमें ना मौक़ा सिसकी का... व”
Piyush Mishra, Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“वो काम भला क्या काम हुआ जो ना अन्दर की ख़्वाहिश हो वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जो पब्लिक की फरमाइश हो... व”
Piyush Mishra, Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“वो जन्नतों की बात करता हम ये कह देते मियाँ
कि दोज़ख़ों का भी लगे हाथों ना ले लें जायज़ा... ?”
Piyush Mishra, Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“अकेलेपन से उसे तकलीफ़ नहीं थी...मगर कई बार नींद नहीं आती थी। अकेलापन उसे अच्छा लगता था बशर्ते कि वो बहुत ज़्यादा अकेला ना हो जाए। अकेलेपन से उसे प्यार था...मगर बुरे सपनों की क़ीमत पर नहीं। मगर जो सच वो नहीं जानता था, वो ये था कि अकेलापन ही उसकी ताक़त थी जिसको लेकर वो अपनी माँ की कोख से पैदा हुआ था...अकेलापन ही वो उन्माद था जिसमें नहाकर वो तरो-ताज़ा हो जाया करता था...और अकेलापन ही वो मुक़ाम था जिसकी तरफ़ धीरे-धीरे उसे अग्रसर होते चले जाना था। मगर वो वक़्त आने में अभी बहुत देर थी। और उसका इन्तज़ार...उससे भी भयानक!”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“डर। आता है। जोर से आता है। भरभरा के आता है। कोई इससे बचा हुआ नहीं है। डर आता है और लग जाता है। कारण? हमें पता नहीं। पता होना चाहिए। अपने डर को व्यक्त कर दो किसी के सामने। बेशर्म होकर।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“ज़िन्दा हो हाँ तुम कोई शक नहीं
साँस लेते हुए देखा मैंने भी है
हाथ औ’ पैरों और जिस्म को हरकतें
ख़ूब देते हुए देखा मैंने भी है...
अब भले ही ये करते हुए होंठ तुम
दर्द सहते हुए सख़्त सी लेते हो
अब है इतना भी कम क्या तुम्हारे लिए
ख़ूब अपनी समझ में तो जी लेते हो...”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“डर की कोई ज़ात नहीं होती। डर की कोई पात नहीं होती। डर का कोई धरम नहीं होता। डर को बस आना होता है। डर बस आ जाता है। और डर ‘लग’ जाता है।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“ये जीवन बस इक दौर सखी
जिससे हर क़ौम गुजरती है
ये झिलमिल आँसू कहीं ना हों
बस ये ही आस उभरती है...”
Piyush Mishra, Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“और मालूम तुम को कि 'क्यों' क्योंकि वो
‘प्यार नाम' को जाने है
जिस प्यार नाम के लफ़्ज़  से सारे
उतने ही अनजाने हैं... कुछ को वो दिखता क्षीण कीट में
कुछ को मांसल बाँहों में
कुछ वो दिखता पुष्ट उरोजों
कुछ वो कदली जाँघों में...”
Piyush Mishra, Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“चुम्बन की भाषा लाखों हैं
ये हम पे है कि किसे चुनें”
Piyush Mishra, Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“उन्हें अब इस बात की चिन्ता थी कि आगे क्या होगा। उसने महसूस किया कि उम्र के साथ पिताजी में कुछ सनक सी आ गई है।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“एक पल की मुस्कराहट
एक पल उम्मीद का
बस ये ही कर देता है यारा
फैसला तक़दीर का...”
Piyush Mishra, Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“वो मिटा रहे हैं मेरा वजूद, पर मेरी पहचान अभी बाकी है, जनाजा़ उठा नहीं है अभी, थोड़ी जान अभी बाकी है। गड़ा है सीने में खंजर, तो क्या, सीने में फौलाद अभी बाकी है, रिश्तेदार खिलाफ हैं तो भी कोई गम नहीं साहब,मेरे पास मेरी औलाद अभी बाकी है। गुनाहों के रास्तों में मेरे कदम न गुज़रें, इतना मेरा ईमान अभी बाकी है, मेरी कौम, मेरा मजहब मुझसे छीन लिया तुमने, मेरे अंदर मेरा स्वाभिमान अभी बाकी है। सियासत खेली है, जमाने ने हजारों, सियासत का अंजाम अभी बाकी है, लूटा होगा तुमने भले ही खुदा को, इंसान के अंदर का इंसान अभी बाकी है।”
Piyush Mishra, रंग-ए-ख्याल | Rang-e-Khayaal
“वो धीरे से बात को समझा। वो मुस्कराया। “मेरे साथ कॉफ़ी पियोगी?” “मेरे साथ सेक्स करोगे?” अब उसने अपनी कुर्ती का ऊपर वाला बटन खोलते हुए कहा। “अरे!” हैमलेट ने उसका हाथ रोका। वो इतने उन्माद में लग रही थी कि कुर्ती वहीं उतार देगी। और उस रात हरजोत के साथ ग्रेटर”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“है हम कमाल हैं हम जमाल
दोनों दिलावर बड़े बहादुर
लासानी और बेमिसाल...”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“कर्मरत रहो। कर्म ही जीवन है। एक बार किया गया कर्म बिना अपना फल दिये नष्ट नहीं होता।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“कुछ पन्ने हैं, जो कभी पलटते नहीं, 
कुछ यादें हैं, जो कभी बिखरती नहीं, 
फलसफे बहुत हैं, कयामत के दिनों के 
पर कुछ शामें है, जो कभी गुज़रती नहीं। 
है कुछ वक्त अधूरा महफिलों में 
है कुछ जाम बचा, मयखाने का, 
हैं कुछ आदतें नशे सी, जो सुधरती नहीं 
और अब भी कुछ शामें हैं, जो कभी गुज़रती नहीं। 
कुछ बात बगावत की बची है अब भी 
कुछ बात कयामत की बची है अब भी, 
पर बातें अब ज़ुबां से निकलती नहीं, 
और कुछ शामें हैं, जो कभी गुज़रती नहीं।”
Piyush Mishra, रंग-ए-ख्याल | Rang-e-Khayaal
“मैं जानूँ था उसके अन्दर
झकझोर समन्दर बहता है
जो लहर थपेड़ों से जूझे
और लहर थपेड़े सहता है...”
Piyush Mishra, Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“उस हादसे ने उसे समझाया कि ज़िन्दगी उतनी नहीं है जितनी हम अपनी आँखों से देखते हैं। जिसको हम समझ नहीं पाते, उसे हम चमत्कार बोल देते हैं। हम भूल जाते हैं कि चमत्कार भी इसी दुनिया में घटते हैं।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“वो काम भला क्या काम हुआ
जो कम्प्यूटर पे खट्-खट् हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना चिट्‌ठी ना ख़त हो...”
Piyush Mishra, Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“पात्र का मतलब है बरतन। और नाट्य में पात्र कहते हैं चरित्र को। बरतन में ज़हर भर दो तो वो ज़हर का पात्र हो जाता है। शराब भर दो तो शराब का और दूध भर दो तो दूध का। मगर उसमें से सब फेंक दो तो वो ख़ाली पात्र हो जाता है। न्यूट्रल। बिना किसी चरित्र के। साफ़-सुथरा, सादा-निष्काम। योग में भी ऐसी ही अवस्था का चित्रण किया गया है। जहाँ ध्यान से पहुँचा जा सकता है वहाँ तुम अभिनय से पहुँच सकते हो। अभिनय करने के लिए सिर्फ़ विधि ही नहीं कारण भी चाहिए। अभिनेता निष्पाप, निष्कलंक और अनासक्त होता है जैसे कि योगी। ये ही दिशा पकड़ो।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“थकन भरी आँखों में आई
नींद की वैसी झपकी है...
जो रात में पल-पल आती है...
पर मालिक की गाड़ी के तीखे
हॉर्न की चीख़ी पौं-पौं में
इक झटके में भग जाती है...!
वो भरी जवानी की बेवा की
आँख में बैठी हसरत है...
जो बाल खोल
उजली साड़ी में...”
Piyush Mishra, Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“मैं हँस पड़ता जब वो कहते
अभिसार बिना है प्यार नहीं
अभिसार प्यार से हो सकता
पर प्यार बिना अभिसार नहीं...”
Piyush Mishra, Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“और वो ड्रामा स्कूल से बाहर था। उसके तीन वर्ष ख़त्म हो चुके थे। सामने ज़िन्दगी खड़ी हुई थी। ख़ूँख़्वार, ख़तरनाक और ख़ूँरेज़ी ज़िन्दगी। लपलपाती हुई। उसे ड्रामा स्कूल की अहमियत अब मालूम हुई। वो अन्दर स्वर्ग में था।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“जीवन के उस स्वर्ण-प्रात में
मुक्त-हृदय निर्द्वंद्व भाव से
दीक्षा ली थी पदयात्रा की
सतत तीर्थयात्रा करने की।
जीवन को संध्या में पहुँचा
मन मेरा ये भूल न जाए
दीक्षा के उस मूल मंत्र को
तीर्थ नहीं, है केवल यात्रा
लक्ष्य नहीं, है केवल पथ ही
इसी तीर्थ पथ पर है चलना
इष्ट यही गंतव्य यही है। इन्क़लाब ज़िन्दाबाद।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“आदत जिसको समझे हो
वो मर्ज कभी बन जाएगा”
Piyush Mishra, Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“इक भरी जवानी कसक मार के
चुप चुप बैठी रहती है
और खामोशी से 'खा लेना कुछ'
नम आँखों से कहती है...”
Piyush Mishra, Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“सम्बन्धों की व्याख्या नहीं करनी चाहिए। इससे उनकी महत्ता ख़त्म हो जाती है।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“औरत का दिल रहस्य का भंडार होता है। उसमें झाँककर देखोगे तो समन्दर की गहराई मिलेगी। मुझे तब भी एतराज़ नहीं था और आज भी नहीं है।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है

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