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“क्या बयां कर पाऊँगा...! कह सका जो मैं नहीं इस इक सदी की रात में अल़्फाज़ टूटे-से हुए गुम इक जु़बां की बात में... बस सब्र ये ही है कि आख़िर तुम तलक तो जाएगी फिर कौन किस को कब कहाँ मैं क्या बता ही पाऊँगा...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“वो काम भला क्या काम हुआ जो मजा नहीं दे व्हिस्की का वो इश्क़ भला क्या इश्क हुआ जिसमें ना मौक़ा सिसकी का... व”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“वो काम भला क्या काम हुआ जो ना अन्दर की ख़्वाहिश हो वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जो पब्लिक की फरमाइश हो... व”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“डर। आता है। जोर से आता है। भरभरा के आता है। कोई इससे बचा हुआ नहीं है। डर आता है और लग जाता है। कारण? हमें पता नहीं। पता होना चाहिए। अपने डर को व्यक्त कर दो किसी के सामने। बेशर्म होकर।”
― तुम्हारी औकात क्या है
― तुम्हारी औकात क्या है
“वो जन्नतों की बात करता हम ये कह देते मियाँ
कि दोज़ख़ों का भी लगे हाथों ना ले लें जायज़ा... ?”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
कि दोज़ख़ों का भी लगे हाथों ना ले लें जायज़ा... ?”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“कर्मरत रहो। कर्म ही जीवन है। एक बार किया गया कर्म बिना अपना फल दिये नष्ट नहीं होता।”
― तुम्हारी औकात क्या है
― तुम्हारी औकात क्या है
“इस दुनिया में दो क़िस्म के लोग होते हैं। इति-इति और नेति-नेति। नेति-नेति वाले भीषण इच्छा शक्ति के मालिक होते हैं। वो एक क्षण में कोई भी चीज़ त्याग सकते हैं। वो नाम हो, वैभव हो या सम्बन्ध। इति-इति वालों के लिए अलग रास्ता निर्धारित होता है। वो इस दुनिया में घुस के प्रत्येक चीज़ का आनन्द लेके, धीमे-धीमे उससे दूर होते जाने के लिए बने हैं।”
― तुम्हारी औकात क्या है
― तुम्हारी औकात क्या है
“ज़िन्दगी में निर्णय का बड़ा तगड़ा महत्त्व होता है। वो बना देते हैं या पूरी तरह नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं।”
― तुम्हारी औकात क्या है
― तुम्हारी औकात क्या है
“उजला ही उजला शहर होगा जिसमें हम तुम बनाएँगे घर।
दोनों रहेंगे कबूतर से...जिसमें होगा ना बाज़ों का डर।”
― तुम्हारी औकात क्या है
दोनों रहेंगे कबूतर से...जिसमें होगा ना बाज़ों का डर।”
― तुम्हारी औकात क्या है
“कुछ पन्ने हैं, जो कभी पलटते नहीं,
कुछ यादें हैं, जो कभी बिखरती नहीं,
फलसफे बहुत हैं, कयामत के दिनों के
पर कुछ शामें है, जो कभी गुज़रती नहीं।
है कुछ वक्त अधूरा महफिलों में
है कुछ जाम बचा, मयखाने का,
हैं कुछ आदतें नशे सी, जो सुधरती नहीं
और अब भी कुछ शामें हैं, जो कभी गुज़रती नहीं।
कुछ बात बगावत की बची है अब भी
कुछ बात कयामत की बची है अब भी,
पर बातें अब ज़ुबां से निकलती नहीं,
और कुछ शामें हैं, जो कभी गुज़रती नहीं।”
― रंग-ए-ख्याल | Rang-e-Khayaal
कुछ यादें हैं, जो कभी बिखरती नहीं,
फलसफे बहुत हैं, कयामत के दिनों के
पर कुछ शामें है, जो कभी गुज़रती नहीं।
है कुछ वक्त अधूरा महफिलों में
है कुछ जाम बचा, मयखाने का,
हैं कुछ आदतें नशे सी, जो सुधरती नहीं
और अब भी कुछ शामें हैं, जो कभी गुज़रती नहीं।
कुछ बात बगावत की बची है अब भी
कुछ बात कयामत की बची है अब भी,
पर बातें अब ज़ुबां से निकलती नहीं,
और कुछ शामें हैं, जो कभी गुज़रती नहीं।”
― रंग-ए-ख्याल | Rang-e-Khayaal
“ये जीवन बस इक दौर सखी
जिससे हर क़ौम गुजरती है
ये झिलमिल आँसू कहीं ना हों
बस ये ही आस उभरती है...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
जिससे हर क़ौम गुजरती है
ये झिलमिल आँसू कहीं ना हों
बस ये ही आस उभरती है...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“और मालूम तुम को कि 'क्यों' क्योंकि वो
‘प्यार नाम' को जाने है
जिस प्यार नाम के लफ़्ज़ से सारे
उतने ही अनजाने हैं... कुछ को वो दिखता क्षीण कीट में
कुछ को मांसल बाँहों में
कुछ वो दिखता पुष्ट उरोजों
कुछ वो कदली जाँघों में...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
‘प्यार नाम' को जाने है
जिस प्यार नाम के लफ़्ज़ से सारे
उतने ही अनजाने हैं... कुछ को वो दिखता क्षीण कीट में
कुछ को मांसल बाँहों में
कुछ वो दिखता पुष्ट उरोजों
कुछ वो कदली जाँघों में...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“उन्हें अब इस बात की चिन्ता थी कि आगे क्या होगा। उसने महसूस किया कि उम्र के साथ पिताजी में कुछ सनक सी आ गई है।”
― तुम्हारी औकात क्या है
― तुम्हारी औकात क्या है
“एक पल की मुस्कराहट
एक पल उम्मीद का
बस ये ही कर देता है यारा
फैसला तक़दीर का...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
एक पल उम्मीद का
बस ये ही कर देता है यारा
फैसला तक़दीर का...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“वो मिटा रहे हैं मेरा वजूद, पर मेरी पहचान अभी बाकी है, जनाजा़ उठा नहीं है अभी, थोड़ी जान अभी बाकी है। गड़ा है सीने में खंजर, तो क्या, सीने में फौलाद अभी बाकी है, रिश्तेदार खिलाफ हैं तो भी कोई गम नहीं साहब,मेरे पास मेरी औलाद अभी बाकी है। गुनाहों के रास्तों में मेरे कदम न गुज़रें, इतना मेरा ईमान अभी बाकी है, मेरी कौम, मेरा मजहब मुझसे छीन लिया तुमने, मेरे अंदर मेरा स्वाभिमान अभी बाकी है। सियासत खेली है, जमाने ने हजारों, सियासत का अंजाम अभी बाकी है, लूटा होगा तुमने भले ही खुदा को, इंसान के अंदर का इंसान अभी बाकी है।”
― रंग-ए-ख्याल | Rang-e-Khayaal
― रंग-ए-ख्याल | Rang-e-Khayaal
“वो धीरे से बात को समझा। वो मुस्कराया। “मेरे साथ कॉफ़ी पियोगी?” “मेरे साथ सेक्स करोगे?” अब उसने अपनी कुर्ती का ऊपर वाला बटन खोलते हुए कहा। “अरे!” हैमलेट ने उसका हाथ रोका। वो इतने उन्माद में लग रही थी कि कुर्ती वहीं उतार देगी। और उस रात हरजोत के साथ ग्रेटर”
― तुम्हारी औकात क्या है
― तुम्हारी औकात क्या है
“औरत का दिल रहस्य का भंडार होता है। उसमें झाँककर देखोगे तो समन्दर की गहराई मिलेगी। मुझे तब भी एतराज़ नहीं था और आज भी नहीं है।”
― तुम्हारी औकात क्या है
― तुम्हारी औकात क्या है
“डर की कोई ज़ात नहीं होती। डर की कोई पात नहीं होती। डर का कोई धरम नहीं होता। डर को बस आना होता है। डर बस आ जाता है। और डर ‘लग’ जाता है।”
― तुम्हारी औकात क्या है
― तुम्हारी औकात क्या है
“मैं जानूँ था उसके अन्दर
झकझोर समन्दर बहता है
जो लहर थपेड़ों से जूझे
और लहर थपेड़े सहता है...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
झकझोर समन्दर बहता है
जो लहर थपेड़ों से जूझे
और लहर थपेड़े सहता है...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“उस हादसे ने उसे समझाया कि ज़िन्दगी उतनी नहीं है जितनी हम अपनी आँखों से देखते हैं। जिसको हम समझ नहीं पाते, उसे हम चमत्कार बोल देते हैं। हम भूल जाते हैं कि चमत्कार भी इसी दुनिया में घटते हैं।”
― तुम्हारी औकात क्या है
― तुम्हारी औकात क्या है
“वो काम भला क्या काम हुआ
जो कम्प्यूटर पे खट्-खट् हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना चिट्ठी ना ख़त हो...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
जो कम्प्यूटर पे खट्-खट् हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना चिट्ठी ना ख़त हो...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“पात्र का मतलब है बरतन। और नाट्य में पात्र कहते हैं चरित्र को। बरतन में ज़हर भर दो तो वो ज़हर का पात्र हो जाता है। शराब भर दो तो शराब का और दूध भर दो तो दूध का। मगर उसमें से सब फेंक दो तो वो ख़ाली पात्र हो जाता है। न्यूट्रल। बिना किसी चरित्र के। साफ़-सुथरा, सादा-निष्काम। योग में भी ऐसी ही अवस्था का चित्रण किया गया है। जहाँ ध्यान से पहुँचा जा सकता है वहाँ तुम अभिनय से पहुँच सकते हो। अभिनय करने के लिए सिर्फ़ विधि ही नहीं कारण भी चाहिए। अभिनेता निष्पाप, निष्कलंक और अनासक्त होता है जैसे कि योगी। ये ही दिशा पकड़ो।”
― तुम्हारी औकात क्या है
― तुम्हारी औकात क्या है
“थकन भरी आँखों में आई
नींद की वैसी झपकी है...
जो रात में पल-पल आती है...
पर मालिक की गाड़ी के तीखे
हॉर्न की चीख़ी पौं-पौं में
इक झटके में भग जाती है...!
वो भरी जवानी की बेवा की
आँख में बैठी हसरत है...
जो बाल खोल
उजली साड़ी में...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
नींद की वैसी झपकी है...
जो रात में पल-पल आती है...
पर मालिक की गाड़ी के तीखे
हॉर्न की चीख़ी पौं-पौं में
इक झटके में भग जाती है...!
वो भरी जवानी की बेवा की
आँख में बैठी हसरत है...
जो बाल खोल
उजली साड़ी में...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“मैं हँस पड़ता जब वो कहते
अभिसार बिना है प्यार नहीं
अभिसार प्यार से हो सकता
पर प्यार बिना अभिसार नहीं...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
अभिसार बिना है प्यार नहीं
अभिसार प्यार से हो सकता
पर प्यार बिना अभिसार नहीं...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
“सम्बन्धों की व्याख्या नहीं करनी चाहिए। इससे उनकी महत्ता ख़त्म हो जाती है।”
― तुम्हारी औकात क्या है
― तुम्हारी औकात क्या है
“और वो ड्रामा स्कूल से बाहर था। उसके तीन वर्ष ख़त्म हो चुके थे। सामने ज़िन्दगी खड़ी हुई थी। ख़ूँख़्वार, ख़तरनाक और ख़ूँरेज़ी ज़िन्दगी। लपलपाती हुई। उसे ड्रामा स्कूल की अहमियत अब मालूम हुई। वो अन्दर स्वर्ग में था।”
― तुम्हारी औकात क्या है
― तुम्हारी औकात क्या है
“जीवन के उस स्वर्ण-प्रात में
मुक्त-हृदय निर्द्वंद्व भाव से
दीक्षा ली थी पदयात्रा की
सतत तीर्थयात्रा करने की।
जीवन को संध्या में पहुँचा
मन मेरा ये भूल न जाए
दीक्षा के उस मूल मंत्र को
तीर्थ नहीं, है केवल यात्रा
लक्ष्य नहीं, है केवल पथ ही
इसी तीर्थ पथ पर है चलना
इष्ट यही गंतव्य यही है। इन्क़लाब ज़िन्दाबाद।”
― तुम्हारी औकात क्या है
मुक्त-हृदय निर्द्वंद्व भाव से
दीक्षा ली थी पदयात्रा की
सतत तीर्थयात्रा करने की।
जीवन को संध्या में पहुँचा
मन मेरा ये भूल न जाए
दीक्षा के उस मूल मंत्र को
तीर्थ नहीं, है केवल यात्रा
लक्ष्य नहीं, है केवल पथ ही
इसी तीर्थ पथ पर है चलना
इष्ट यही गंतव्य यही है। इन्क़लाब ज़िन्दाबाद।”
― तुम्हारी औकात क्या है
“इक भरी जवानी कसक मार के
चुप चुप बैठी रहती है
और खामोशी से 'खा लेना कुछ'
नम आँखों से कहती है...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
चुप चुप बैठी रहती है
और खामोशी से 'खा लेना कुछ'
नम आँखों से कहती है...”
― Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya




