तुम्हारी औकात क्या है Quotes

Rate this book
Clear rating
तुम्हारी औकात क्या है तुम्हारी औकात क्या है by Piyush Mishra
345 ratings, 4.43 average rating, 61 reviews
तुम्हारी औकात क्या है Quotes Showing 1-26 of 26
“जीवन के उस स्वर्ण-प्रात में
मुक्त-हृदय निर्द्वंद्व भाव से
दीक्षा ली थी पदयात्रा की
सतत तीर्थयात्रा करने की।
जीवन को संध्या में पहुँचा
मन मेरा ये भूल न जाए
दीक्षा के उस मूल मंत्र को
तीर्थ नहीं, है केवल यात्रा
लक्ष्य नहीं, है केवल पथ ही
इसी तीर्थ पथ पर है चलना
इष्ट यही गंतव्य यही है। इन्क़लाब ज़िन्दाबाद।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“डर चला जाएगा। हैमलेट को ये मामूली-सा ‘जेस्चर’ करने में एक पूरी जिन्दगी लग गई। लगता अब भी मंच की सीिढ़याँ चढ़कर ऊपर ख़ुद परफॉर्म करने में हैमलेट को डर है। वो भी जाएगा। किसी दिन। ख़ुदबख़ुद। आमीन!”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“डर। आता है। जोर से आता है। भरभरा के आता है। कोई इससे बचा हुआ नहीं है। डर आता है और लग जाता है। कारण? हमें पता नहीं। पता होना चाहिए। अपने डर को व्यक्त कर दो किसी के सामने। बेशर्म होकर।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“तुम मुझे बहुत याद आए। मगर तुम्हें भूलना उतना ही ज़रूरी था। स्मृति पास से बहुत कष्ट देती है।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“मगर स्मृति को जितना दूर से देखा जाए वो उतनी ही अच्छी लगती है।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“सम्बन्धों की व्याख्या नहीं करनी चाहिए। इससे उनकी महत्ता ख़त्म हो जाती है।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“औरत का दिल रहस्य का भंडार होता है। उसमें झाँककर देखोगे तो समन्दर की गहराई मिलेगी। मुझे तब भी एतराज़ नहीं था और आज भी नहीं है।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“उस हादसे ने उसे समझाया कि ज़िन्दगी उतनी नहीं है जितनी हम अपनी आँखों से देखते हैं। जिसको हम समझ नहीं पाते, उसे हम चमत्कार बोल देते हैं। हम भूल जाते हैं कि चमत्कार भी इसी दुनिया में घटते हैं।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“अब उसे एक आम स्ट्रगलर के तौर पर स्ट्रगल करना था। फ़िल्मों में। साथ में किया गया बीस साल का काम था। संगी-साथी थे, मगर दूर। उसे समझ आ चुका था कि यहाँ सब अपनी-अपनी ज़िन्दगी बनाने आए हैं। सबको अपने काम से सरोकार था। वो उसके साथ बैठके दारू पीते हुए उसके दुखों में रो ज़रूर सकते थे। मगर उसकी मदद करने में असमर्थ थे। उसे अपनी ज़िन्दगी अकेले ही जीनी थी। औरों की तरह।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“उजला ही उजला शहर होगा जिसमें हम तुम बनाएँगे घर।
दोनों रहेंगे कबूतर से...जिसमें होगा ना बाज़ों का डर।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“और वो ड्रामा स्कूल से बाहर था। उसके तीन वर्ष ख़त्म हो चुके थे। सामने ज़िन्दगी खड़ी हुई थी। ख़ूँख़्वार, ख़तरनाक और ख़ूँरेज़ी ज़िन्दगी। लपलपाती हुई। उसे ड्रामा स्कूल की अहमियत अब मालूम हुई। वो अन्दर स्वर्ग में था।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“वो धीरे से बात को समझा। वो मुस्कराया। “मेरे साथ कॉफ़ी पियोगी?” “मेरे साथ सेक्स करोगे?” अब उसने अपनी कुर्ती का ऊपर वाला बटन खोलते हुए कहा। “अरे!” हैमलेट ने उसका हाथ रोका। वो इतने उन्माद में लग रही थी कि कुर्ती वहीं उतार देगी। और उस रात हरजोत के साथ ग्रेटर”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“स्मृतियाँ भी कितनी धोखेबाज़ होती हैं।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“कर्मरत रहो। कर्म ही जीवन है। एक बार किया गया कर्म बिना अपना फल दिये नष्ट नहीं होता।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“पात्र का मतलब है बरतन। और नाट्य में पात्र कहते हैं चरित्र को। बरतन में ज़हर भर दो तो वो ज़हर का पात्र हो जाता है। शराब भर दो तो शराब का और दूध भर दो तो दूध का। मगर उसमें से सब फेंक दो तो वो ख़ाली पात्र हो जाता है। न्यूट्रल। बिना किसी चरित्र के। साफ़-सुथरा, सादा-निष्काम। योग में भी ऐसी ही अवस्था का चित्रण किया गया है। जहाँ ध्यान से पहुँचा जा सकता है वहाँ तुम अभिनय से पहुँच सकते हो। अभिनय करने के लिए सिर्फ़ विधि ही नहीं कारण भी चाहिए। अभिनेता निष्पाप, निष्कलंक और अनासक्त होता है जैसे कि योगी। ये ही दिशा पकड़ो।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“उन्हें अब इस बात की चिन्ता थी कि आगे क्या होगा। उसने महसूस किया कि उम्र के साथ पिताजी में कुछ सनक सी आ गई है।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“इस घर में उसका बीस साल का जीवन बीता था। ना जाने कितने हादसे उसने झेले थे। उनकी मार भी। मार की कसक थी, कसक की फिर याद थी और वो याद वहीं की वहीं थी।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“है हम कमाल हैं हम जमाल
दोनों दिलावर बड़े बहादुर
लासानी और बेमिसाल...”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“इस दुनिया में दो क़िस्म के लोग होते हैं। इति-इति और नेति-नेति। नेति-नेति वाले भीषण इच्छा शक्ति के मालिक होते हैं। वो एक क्षण में कोई भी चीज़ त्याग सकते हैं। वो नाम हो, वैभव हो या सम्बन्ध। इति-इति वालों के लिए अलग रास्ता निर्धारित होता है। वो इस दुनिया में घुस के प्रत्येक चीज़ का आनन्द लेके, धीमे-धीमे उससे दूर होते जाने के लिए बने हैं।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“ज़िन्दगी में निर्णय का बड़ा तगड़ा महत्त्व होता है। वो बना देते हैं या पूरी तरह नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“उन दिनों किंगफ़िशर बीयर की बोतल बारह रुपए की आया करती थी। गोल्ड फ़्लेक किंग साइज़ का पैकेट छह रुपए का और निरोध कंडोम पैंतीस पैसे का। (हैमलेट का इन तीनों चीज़ों से अब तक कोई वास्ता नहीं था। बाद में ज़रूरत से ज़्यादा हो गया था।)”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“हर इनडिसिप्लिन में एक डिसिप्लिन होता है। देखने का नज़रिया चाहिए।” विश्नोई बोले थे। “जिसको हम समझते नहीं, उसको चमत्कार बोल देते हैं। आँखें खोलकर देखेंगे तो वही हक़ीक़त होती है।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“ज़िन्दा हो हाँ तुम कोई शक नहीं
साँस लेते हुए देखा मैंने भी है
हाथ औ’ पैरों और जिस्म को हरकतें
ख़ूब देते हुए देखा मैंने भी है...
अब भले ही ये करते हुए होंठ तुम
दर्द सहते हुए सख़्त सी लेते हो
अब है इतना भी कम क्या तुम्हारे लिए
ख़ूब अपनी समझ में तो जी लेते हो...”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“अधिकतर लोगों की ज़िन्दगी में उन्हें वो नहीं मिलता जिसकी उन्हें ज़रूरत होती है। या तो ख़ुद नहीं जानते कि किस चीज़ की उन्हें ज़रूरत होती है। कई लोगों को ये अकस्मात् मिल जाता है मगर उन्हें उसको ढंग से अंगीकार करने में वक़्त लगता”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“डर की कोई ज़ात नहीं होती। डर की कोई पात नहीं होती। डर का कोई धरम नहीं होता। डर को बस आना होता है। डर बस आ जाता है। और डर ‘लग’ जाता है।”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है
“अकेलेपन से उसे तकलीफ़ नहीं थी...मगर कई बार नींद नहीं आती थी। अकेलापन उसे अच्छा लगता था बशर्ते कि वो बहुत ज़्यादा अकेला ना हो जाए। अकेलेपन से उसे प्यार था...मगर बुरे सपनों की क़ीमत पर नहीं। मगर जो सच वो नहीं जानता था, वो ये था कि अकेलापन ही उसकी ताक़त थी जिसको लेकर वो अपनी माँ की कोख से पैदा हुआ था...अकेलापन ही वो उन्माद था जिसमें नहाकर वो तरो-ताज़ा हो जाया करता था...और अकेलापन ही वो मुक़ाम था जिसकी तरफ़ धीरे-धीरे उसे अग्रसर होते चले जाना था। मगर वो वक़्त आने में अभी बहुत देर थी। और उसका इन्तज़ार...उससे भी भयानक!”
Piyush Mishra, तुम्हारी औकात क्या है